Thursday 03 December 2020 12:17 PM IST : By Rashmi Kao

बेवफाई का वायरस

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लॉकडाउन में रिश्तों के बीच बढ़ी नजदीकियों और आपसी प्यार का खूब शोर मचा। हर रिश्ते को एक-दूसरे की जरूरत का अहसास हुआ। स्त्री-पुरुष दोनों ने जीवन की अनिश्चितता को बहुत करीब से देखा व जाना... जिंदगी की आधी-अधूरी, कोरी व खोखली पड़ चुकी भावनाओं ने फिर से सांस लेना सीखा। लेकिन कई घरों की चारदीवारी के अंदर कुछ एेसा भी घटा, जो दूर से खुशहाल नजर आती मैरिड लाइफ पर किसी खतरनाक वायरस अटैक से कम नहीं था। यह दांपत्य में बेवफाई का वायरस निकला, जिसने शादीशुदा रिश्ते के चेहरे पर पड़े धोखे के ‘मास्क’ को नोंच फेंका, जिसने वैवाहिक रिश्ते में ईमानदारी के लिए जरूरी परपुरुष या परस्त्री से रखी जानेवाली ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ की धज्जियां उड़ा दीं। रिश्ते के साफ-सुथरे ‘सैनिटाइज्ड इमोशंस’ में बेईमानी का वायरस जम कर बैठा नजर आया।

मैं मनगढ़ंत कहानी नहीं सुना रही। इस वायरस अटैक की आंखों देखी सचाई बता रही हूं। स्कूल टीचर अलका को वर्क फ्रॉम होम के चलते अपने स्टूडेंट्स के लिए ‘वॉइस नोट’ भेजना था, जिसे वह अपने फोन से नहीं भेज पा रही थी। अपने मोबाइल में कोई तकनीकी अड़चन आने की वजह से उसने अपने हसबैंड से उसका मोबाइल फोन मांगा। पति ने अपना फोन अनलॉक करके पत्नी को थमा दिया। अलका ने अपनी ऑनलाइन क्लास के बच्चों को पति के फोन से वॉइस नोट भेजा। इसी सबके बीच गलती से उससे कोई दूसरा वॉइस मैसेज खुल गया। उस मैसेज को सुनने के बाद वह अपने आपको रोक ना सकी और उसकी उंगलियां पति के मोबाइल फोन पर तेजी से हरकत करने लगीं। अलका के सामने फिर जिस सचाई से परदा हटा, वह दर्दनाक थी। इन मैसेजेस का खुलना अलका की जिंदगी में बम फटने जैसा साबित हुआ और बेवफाई की आग में सब कुछ जल कर खाक हो गया। अलका का कहना है कि उसके पति का 2 साल से अफेअर चल रहा है, जो इस लॉकडाउन की बदौलत ही सामने आया। अलका इस महिला को नाम से जानती है और यह स्त्री पति-पत्नी दोनों की कॉमन फ्रेंड है।

कोई भी शादी सीधे सपाट रास्तों पर सुपर फास्ट स्पीड से रेस लगाती नहीं चलती। हर शादी का ग्राफ अलग होता है। रिश्ता भावनाओं की उठापटक झेलता हुआ किसी गुमराह हुए दिल के ईसीजी जैसा लगता है। लॉकडाउन के दिनों में एेसी कई सचाइयां देखने और सुनने को मिली हैं, लेकिन साथ ही मुझे देखने को मिली है इन औरतों की हिम्मत, जिसने मेरी इस सोच को मजबूत बनाया कि सच में औरत बदल चुकी है। अलका को जितना रोना था, शायद वह जीभर कर रो चुकी थी और उसके बाद मेरे सामने बैठी थी। उसका कहना था कि वह रोज-रोज ऑन-ऑफ होते रिलेशनशिप में जीने को तैयार नहीं। भावनाओं का सागर गहरा होता है। उसमें रोज डूबना और बाहर निकलना कन्फ्यूजन पैदा करता है। कुछ पता नहीं चलता और महसूस बहुत कुछ होता रहता है। हवाभरे गुब्बारे सा रिश्ता सिर्फ उड़ता है। पीछे रखा एक कदम दो कदम आगे ले जाता है। फीलिंग के नाम पर सवाल-जवाब होते हैं। साथ ही बेटे की बदचलनी का जब मां-बाप भी साथ दें, तो रिश्ता और भी दुखदायी बन जाता है। अलका का कहना था कि उसने कभी भी पैसे और ज्वेलरी को ले कर पति पर शक नहीं किया। लेकिन इस धोखे में वह ये सब भी गंवा चुकी है। रहने को उसके पास सिर्फ एक घर है, जो उसे उसके मां-बाप की तरफ से तोहफे में मिला है।

मेरा अलका से सवाल था, ‘‘अब आगे के लिए क्या सोचा है?’’ और वह अपने जवाब के साथ तैयार थी, ‘‘दो इंसान एक रिश्ते की डोर में बंधते हैं और साथ चलने का फैसला करते हैं। लेकिन जब यह डोर कुछ वक्त के बाद रस्सी बन जाती है, तो गला घुटता महसूस होता है। शादी में ईमानदारी ना रहे, तो शादी मरने लगती है। और मैं मैरिड लाइफ को किसी लाश की तरह ढोने को तैयार नहीं। शादी स्वर्ग में तय जरूर होती है, पर धरती पर आ कर अगर नरक बन जाए, तो उससे बाहर निकलना ही बेहतर है। मैंने शादी यह दिन देखने के लिए नहीं की थी। आदमी बीवी के ‘लेटेस्ट अपडेटेड वर्जन’ की चाह रखना चाहे, तो रख सकता है, पर औरत को भी अपना रास्ता चुनने का हक होना चाहिए।’’

अलका को परिवार के कुछ लोग समझौते और ‘वेट एंड वॉच’ का मशविरा दे रहे हैं। पर अलका का कहना है कि उसके पास वक्त नहीं कि वह टूटी-बिखरी शादी पर आंसू बहाए या सिर पकड़ कर बैठे। शादी के ‘बर्न आउट’ होने के बाद उसने अपने घर आते सभी रास्ते पति के लिए बंद कर दिए हैं। अलका का तर्क है कि समझौते जिंदगी की खूबसूरती की गारंटी नहीं देेते। एेसा कैसे हो सकता है कि एक साथ छोड़ कर चलता-चलता आगे निकल जाए और दूसरा इंतजार में खड़ा रह जाए... या उसके लौटने का इंतजार करे। हाथ छुड़ा कर जानेवाले की पीछे छूटे साथी की तरफ कोई जिम्मेदारी नहीं। क्या इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना हरकत को वाजिब ठहराया जा सकता है? और इस सबके बीच से गुजरता अलका का 7 साल का बेटा भी है। अलका का कहना है कि वह सब कुछ जानता भी है और समझता भी है। उसने बड़ी समझदारी से बेटे को पास बिठा कर समझाया है कि उसके पापा आजकल किसी काम की वजह से बाहर रहेंगे। जब उसका मन पापा से मिलने को करेगा, तो वह पापा को फोन करके उनसे मिल सकता है। ताज्जुब इस बात का है कि आज का यह बच्चा भावनाओं के मामले में ज्यादा मजबूत है। आजकल के बच्चे भी पेरेंट्स के बदलते रिश्तों को समझते और सहजता से लेते हैं। और उन्हें दूर होते रिश्तों का अफसोस भी कम होता है। वक्त ने उनके दिल और दिमाग को मजबूती दी है। उनकी सोच वक्त के साथ अपनी जरूरतों को देखते हुए प्रैक्टिकल होने लगी है। वे अपना फायदा भले ना देखें, पर मजबूत पेरेंट को ही चुनते हैं। क्योंकि वे इमोशनल सिक्योरिटी को अहमियत देते हैं। वह पेरेंट जिसके साथ उसे डर कम लगे, जो उसे सेफ महसूस कराए और जो उसकी खुशियों का ध्यान रखेे। सात साल का बचपन मुझे रातोंरात मैच्योर लगने लगा, जब उसने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘मैं ममा के साथ ही रहूंगा।’’ उसकी बात पर मुस्कराना मेरी मजबूरी थी। मैं एक बच्चे के बचपन को पीछे छूटता देख रही थी।

सोसाइटी बदल रही है। अच्छे-बुरे की परिभाषाएं भी बदल रही हैं, पर गद्दारी तो गद्दारी ही कहलाएगी। दो नावों में सवार व्यक्ति इमोशनली, फिजिकली और फाइनेंशियली किसी को लूटता रहे, यह कहां तक सही है? अगर कुछ देना नहीं चाहते, तो छीनाझपटी किसलिए? शादी में ईमानदारी तभी तक जिंदा रह सकती है, जब तक पति-पत्नी आपस में बात करना नहीं छोड़ते। कहने को तो यह कहा जाता है कि नसीब वाले ही साथ चलते हैं, पर नसीब को भी रिश्ते की नींव पर टिके सच की जरूरत पड़ती है। किसी आंख बंद करके चलते राही को रास्ता सुझाना आसान है, पर आंखें खोल कर गुमराह होते रिश्ते को राह पर लाना मुश्किल होता है। क्योंकि पति-पत्नी का रिश्ता एक-दूसरे की चौकीदारी नहीं मांगता। उसे ‘सेल्फ कंट्रोल’ और ‘सेल्फ डिसिप्लिन’ की दरकार होती है।

‘न्यू नॉर्मल’ कोविड-19 की दी हुई नयी सोच है। जिंदगी बदली, जीने के अंदाज बदले, सोच बदली फिर सड़ रही शादी को घसीटने का क्या तुक बनता है। स्त्री की ‘इमोशनल इम्युनिटी’ का बढ़ना जरूरी है। उसकी ‘इमोशनल पावर’ ने मुंह खोलना और सचाइयों को हिम्मत के साथ स्वीकारना, झेलना और जूझ कर उनसे ऊपर उठना सीख लिया है। अपने आपको कमजोर आंकने वाले माइंड सेट से बाहर निकालने का वक्त अब आ गया है और अलका ने अपनी जिंदगी में झांकने के बाद नया रास्ता पकड़ने का फैसला किया है।