खानपान को ले कर हाल के दिनों में लोग बहुत जागरूक हुए हैं, लेकिन इस जागरूकता का प्रभाव अगर हमारी भोजन की थाली पर ना पड़े तो सब बेकार है। खराब खानपान की वजह से भारतीयों में बीमारियों का खतरा लगभग 56 फीसदी तक बढ़ रहा है। सही जीवनशैली और डाइट अपना कर लाइफस्टाइल डिजीज से काफी हद तक बचा जा सकता है और असमय होने वाली मौतों के आंकड़े कम किए जा सकते हैं।
हाल ही में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (एनआईएन) हैदराबाद ने भारतीयों के लिए खानपान संबंधी कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी भारतीयों की जीवनशैली सुस्त होती जा रही है, जबकि उनकी थाली में प्रोसेस्ड फूड बढ़ रहा है। साथ ही शुगर, फैट और सॉल्ट की मात्रा बढ़ रही है। इससे शरीर में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी हो रही है और मोटापा घेर रहा है। सेहत की राह में सबसे बड़ा बैरियर मोटापा है। हालांकि जीवनशैली और भोजन में किए जाने वाले छोटे-छोटे बदलावों से भी बड़ा फर्क पड़ सकता है।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय अभी अनाज का सेवन अधिक कर रहे हैं, जबकि उन्हें दालों, अंडों, सब्जियों और फलों का सेवन ज्यादा करना चाहिए। अभी थाली में लगभग 60-70 फीसदी हिस्सा अनाज परोसा जा रहा है, जबकि इसे 50 प्रतिशत से कम किया जाना चाहिए। दूसरी ओर दालों, सब्जियों या अंडों का हिस्सा दुगना करना चाहिए। गाइडलाइंस के मुताबिक हमें प्लांट बेस्ड डाइट अपनाने की जरूरत है, लेकिन सही मात्रा में (मसलन हफ्ते में 500 ग्राम या प्रतिदिन लगभग 70 ग्राम तक) मीट बेस्ड प्रोटीन भी लेना चाहिए। दूध-दही का सेवन भी उचित मात्रा में करना चाहिए। खासतौर पर बच्चों व बुजुर्गों को दूध का सेवन जरूर करना चाहिए। अगर मोटापे, हाइपरटेंशन, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज और डाइबिटीज जैसी बीमारियों से बचे रहना चाहते हैं तो अपनी थाली को संतुलित और सेहतमंद बनाना होगा।
एक संतुलित थाली में 45 प्रतिशत कैलोरी अनाज और मोटे अनाज से आए, 15 प्रतिशत कैलोरी दालों, बीन्स या मांस से और बाकी कैलोरीज सब्जियों, फलों और दूध से मिलनी चाहिए।
एक और बात जो एनआइएन की ओर से जारी हुई है, वह यह है कि फूड लेबल्स पर दी गयी जानकारी को ठीक से पढ़ना चाहिए। इसके अलावा प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करें। इंस्टेंट या फ्रोजन फूड को कट करें। जीवनशैली में सक्रियता और व्यायाम को प्रमुख जगह दें। प्रेगनेंट और बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली स्त्रियों को अपने खानपान का विशेष ध्यान रखना चाहिए, शिशु को कम से कम 6 महीने तक पूरी तरह ब्रेस्टफीडिंग कराने की जरूरत है, जबकि इसे शिशु के 2 वर्ष या अधिक होने पर भी जारी रखा जा सकता है। प्रेगनेंसी में किसी भी तरह के आयुर्वेदिक सप्लीमेंट्स लेने की जरूरत नहीं है, ना ही शिशु को शहद चटाने की कोई आवश्यकता है।
इन गाइडलाइंस में एक अहम हिदायत मसल्स बनाने और जिम जाने की शौकीन युवा पीढ़ी के लिए भी है कि प्रोटीन सप्लीमेंट्स लेना बंद करें। ऐसा करने से शरीर को कई तरह के नुकसान हो सकते हैं। जैसे, बोन मिनरल लॉस और किडनी में खराबी।
इन गाइडलाइंस के आने से कुछ समय पहले ही एक और अध्ययन में कहा गया था, खासतौर पर नॉर्थ इंडियन थाली सेहत के लिए हानिकारक है। उत्तरी भारत के खानपान की बात करते ही हमारे मुंह में पानी आने लगता है। छोले-भटूरे, बटर चिकन, मक्खन से भरे आलू-गोभी के परांठे... सब याद आने लगते हैं। द जॉर्ज इंस्टिट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ इंडिया और पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च द्वारा कराए गए एक अध्ययन में कहा गया कि सोडियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस और प्रोटीन का सेहत में बड़ा योगदान है और इनकी कमी से कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। ज्यादा नमक और कम पोटैशियम लेने से हाइपरटेंशन, कार्डियोवैस्क्युलर और क्रोनिक किडनी डिजीज हो सकती हैं।
चूंकि भारत के हर हिस्से में अलग किस्म का खानपान है, इसलिए यह जानना जरूरी है कि उनके भोजन में पौष्टिक तत्वों की पर्याप्त मात्रा है या नहीं। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि किडनी से जुड़ी गंभीर समस्याओं में मरीज को हालांकि पोटैशियम और प्रोटीन की कम मात्रा लेने को कहा जाता है, लेकिन स्वस्थ लोगों में इसकी कमी से फटीग और मसल्स लॉस जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। भारतीय नमकीन पदार्थों का सेवन अत्यधिक करते हैं,
जिसे कम करना चाहिए। कुकिंग के तरीकों में बदलाव की जरूरत है। हाई हीट कुकिंग और फ्राइंग के बजाय ग्रिलिंग, बेकिंग, ऑइल लेस कुकिंग, स्टीमिंग आदि को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि खाद्य पदार्थों में पौष्टिकता बची रह सके। पोटैशियम की कमी ना हो, इसके लिए मौसमी फल, सब्जियां, सलाद और डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन करना चाहिए।
कुकिंग मेथड्स के अलावा खाना पकाने के बरतनों पर भी ध्यान देना जरूरी है। आजकल लोग नॉनस्टिक पैन का इस्तेमाल अधिक कर रहे हैं, जबकि इसमें हीट लेवल को ध्यान में रखना होता है। इसके अलावा अगर इनकी कोटिंग निकल जाए तो इन्हें इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। खट्टे पदार्थों जैसे चटनी, सांभर आदि के लिए आयरन, एल्युमीनियम, ब्रास या कॉपर के बरतन ना इस्तेमाल करें। मिट्टी या सिरैमिक कुकवेअर सबसे सुरक्षित माने जाते हैं, जो ईको-फ्रेंडली तो हैं ही, इनमें तेल कम लगता है और न्यूट्रिशन भी बरकरार रहता है। स्टेनलेस स्टील और ग्रेनाइट स्टोन के बरतन भी अन्य के मुकाबले सुरक्षित माने जाते हैं।
एक बात गौर करने लायक यह है कि इन दिनों सॉल्ट और शुगर के कई विकल्प बाजार में उपलब्ध हैं, जो लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। इस रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि ना तो कोई गुड या हेल्दी शुगर होता है और ना ही पिंक या ब्लैक सॉल्ट की गुणवत्ता वाइट सॉल्ट से अधिक होती है। आप चाहे चीनी खाएं, गुड़ या शहद लें, सभी में पर्याप्त मीठा है। कोई भी दूसरे विकल्पों से बेहतर नहीं है। अगर कोई पूरी तरह चीनी नहीं छोड़ पाता तो दिन भर में 20-25 ग्राम तक चीनी का सेवन कर सकता है, इससे अधिक नहीं। इसी तरह घी, पाम ऑइल या कोकोनट ऑइल में सैचुरेटेड फैट्स होते हैं और इनकी मात्रा सीमित रखी जानी चाहिए।
सौ बातों की एक बात
जब हम कहते हैं कि हमारी थाली में न्यूट्रिशन इतना कम क्यों होता जा रहा है तो इसकी एक बड़ी वजह यह है कि दालों, सब्जियों, डेयरी और मीट प्रोडक्ट्स की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। कुछ समय पहले आयी एक रिपोर्ट वॉट इंडिया ईट में कहा गया कि भारतीय, खासतौर पर ग्रामीण लोग कार्ब का ज्यादा सेवन कर रहे हैं और प्रोटीन की मात्रा उनके खाने में बहुत कम है। पुराने जमाने में कहावत थी - दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। लेकिन आज के समय में दालें थाली से गायब हो रही हैं। लगभग हर दाल की कीमत 200 रुपए पार कर रही है। शाकाहारी लोग प्रोटीन के लिए मुख्य रूप से दालों पर निर्भर करते हैं। जब मध्यवर्ग ही इसमें कटौती करने लगा है तो निम्न वर्ग की थाली में दाल कैसे पहुंचे। सब्जियों-फलों की कीमतें भी आसमान छू रही हैं। जरूरी पोषण सबको मिले, इसके लिए चीजें सबकी पहुंच में होनी भी जरूरी हैं।