सुकून के गलीचे पर फिर से नागफनी उगने लग गए हैं। कितने जतन करके सब कुछ ठीक किया था। भीतर के मंथन का जहर पीने के लिए शिव को नहीं साधा, बस कंठ को अवरुद्ध कर लिया था। ऐसा नहीं कि आत्ममंथन से अमृत नहीं निकला था। उसके लिए खुद ही मोहनी बनी और अपने परिवार को तृप्त किया। अठारह साल बाद तुम्हारे मैसेज का आना मेरे जीवन के ठहरे जल में हलचल पैदा कर गया। इतनी जरा सी तो यादें थीं तुम्हारी अगर गिनने बैठ जाऊं तो बमुश्किल चार या पांच का जोड़-तोड़ बैठेगा। उसकी टीस इतनी भरी पड़ी है यह आज पता चला।
कच्ची उम्र में जब सब सहेलियां संभल-संभल कर चलते हुए प्रेम को खुशफुसा कर बतियाती थीं, मैं तब प्रेम को चुटकी काटते हुए ठहाके लगा कर सबकी आंख की किरकिरी बन जाती थी। हम सहेलियों के झुंड में सुचित्रा को हाथ देखने की कला आती थी। अपने पिता पंडित जसराज शास्त्री के साथ बैठ कर उसने यह विद्या सीखी थी। अगर हस्तरेखा का उसे बहुत ज्ञान नहीं था तो उसकी सारी बातें कोरी गल्प भी नहीं होती थीं। उसकी गणना में कुछ तो सत्य रहता था। हम सब अपने खाली पीरियड में उसके आसपास जमा हो जाते और अपनी हथेली आगे कर देते। वह सबके बारे में अच्छा-बुरा बताती रहती, किंतु हम सबको एक ही चाह रहती कि वह हमारे प्रेम के बारे में बताए कि वह कितना सफल या असफल रहेगा। सुचित्रा भी सबके दिल की पोल खोल देती तो कोई सखी लाल तो कोई पीली हो जाती। कोई-कोई तो लड़ ही बैठती कि उसका तो कोई भी चक्कर नहीं चल रहा है फिर वह उसे ख्वाहमख्वाह ही बदनाम कर रही है। वक्त को आज पलट कर देखती हूं तो लगता है मेरे बारे में सुचित्रा सच ही कहा करती थी कि मेरे एक नहीं कई अफेअर होंगे।
चालीस के पायदान पर कदम रखते हुए जब 22वें साल के झरोखे में झांक कर देखती हूं तो वह बहुत ही चुलबुला दिखता है। उस वक्त यह दिल हर रोबीले और गोरे-चिट्टे के लिए धड़क उठता था। कभी दिल कहता इसके साथ जीवन की गांठ जुड़ जाए तो कितना अच्छा हो तो कभी कोई दूसरा दिल को गुदगुदा जाता। उसी नाजुक दौर में तुमसे भी मुलाकात हुई थी। मन ही मन तुम्हारे साथ सपनों को कई पंख दिए थे। यह अलग बात कि पहली मुलाकात में तुम मुझे बहुत घमंडी से लगे थे। तुम मेरी सबसे अजीज दोस्त रोजी के कजिन थे। क्रिश्चियन परिवार से ताल्लुक रखने की वजह से रोजी के घर पर थोड़ा खुलापन ज्यादा था। हमारे घर पर संस्कारों की मूलभूत सख्ती थी। रोजी ने ही मुझे तुमसे मिलवाया था, “ये मेरे कजिन रॉबिन हैं। मर्चेंट नेवी में हैं।”
औपचारिक नमस्ते करके मैं बैठ गयी। तुम रोजी को कुछ तसवीरें दिखा रहे थे। एक तसवीर की तरफ मैंने हाथ बढ़ाया ही था कि तुम बोल उठे, “सॉरी, ये पर्सनल फोटोज हैं, इन्हें आप नहीं देख सकतीं।”
शर्मिंदगी से मैं जड़ हो गयी। मेरे आगे-पीछे इतने लोग चक्कर लगाते थे। यह पहला इंसान था, जिसने मुझसे इतनी रूडली बिहेव किया था। मैं रोजी से इजाजत ले कर चली आयी। साथ ले आयी एक चुभन।
दूसरे दिन रोजी ने कॉलेज चलने से भी मना कर दिया। दुखी मैं अकेले ही गयी। थोड़ी ही देर में कॉलेज बंद कर दिया गया, क्योंकि प्रबंधक की माता जी का देहांत हो गया था। वापस चली ही थी कि रास्ते में रोजी अपनी मम्मी और कजिन के साथ मिल गयी। वह मुझे देख कर बेहद खुश हुई और बोली, “हम फिल्म जा रहे हैं। तुम भी चलो।”
मैं कल से ही आहत थी। सीधा मना कर दिया। तभी रॉबिन ने कहा, “चलिए ना, मुझे अच्छा लगेगा।”
‘मुझे अच्छा लगेगा’ सुन कर सारा गुस्सा हवा हो गया। थोड़ी सी नानुकुर के बाद मैं चल पड़ी। घर की दहशत भी थी, फिर भी चली गयी। मेरे और तुम्हारे बीच वाली सीट पर रोजी बैठी थी। तुमने सीट के पीछे से अपना हाथ मेरे बालों में फिराया तो मैं सिहर उठी। उस अंधेरे हॉल में भी तुम्हारी चमकती आंखें मुझे अपने चेहरे पर टिकी नजर आ गयीं। आज भी याद करती हूं तो मन में गिटार से बज उठते हैं। उस फिल्म के बाद तुमने रोजी से कहा कि मैं बहुत डिफरेंट हूं। मुझे नहीं पता क्या लगा तुमको।
फिर तुम चले गए। कहीं बाहर किसी और देश में। तुम्हें ले कर रोजी मुझे अकसर छेड़ने लगी, कहती कि तुम मुझे पसंद करते हो। अपनी खुशी को छुपाते हुए मैं उसकी बात को हंसी में उड़ा देती। अकेले में ना जाने कितनी दूर तक तुम्हारा पीछा करती और जीवन में गुलाबी रंग भरती रहती।
साल बदलने लगे और मेरा इश्क भी बदलने लगा। दो साल हो गए थे तुम आए नहीं थे। वह एक मुलाकात मेरे जेहन से धुंधली होने लगी थी। इसी बीच कुंदन ने मेरे दिल की धड़कन को बढ़ाना शुरू किया। वह मेरी ही कॉलोनी में रहता था। रोज की मुलाकातों का स्पंदन एक अलग ही नशा दे रहा था कि तुम फिर आ गए और मैं फिर तुम्हारी तरफ मुड़ गयी। इस बार हमारी मुलाकात पिछली बार से कहीं ज्यादा मोहक रही। दो दिन बाद ही तुम चले गए। फिर कई महीनों बाद तुमने मेरे जन्मदिन पर एक कार्ड भेजा, जिसके लिए मैंने भी थैंक्स का कार्ड ही भेज दिया था। वक्त के उस बहाव में यह हमारी आखिरी मुलाकात थी, जोकि ग्रीटिंग्स कार्ड के रूप में हुई थी। उसके बाद कॉलेज में कोई और तो कहीं कोई और बहुत सारे साथी बने, जिसके लिए दिल ने कुछ गुनगुनाया, किंतु वक्त के साथ समझ आ गया कि यह प्यार नहीं है। आकर्षण के बदलते रंग हैं, जो सात फेरे में नहीं बंध सकते।
जिंदगी ने करवट बदली और मेरे हाथ पीले हो गए। जीवन नैया सुमधुर रस में बहने लगी। पति के रूप में नवीन बहुत अच्छे मिले, बस वे रोमांटिक बिलकुल भी नहीं हैं। वे सब रंगीनियत, जो मुझे प्यार के लिए जरूरी लगतीं, नवीन को सब बेवजह के चोंचले लगते। सुचित्रा की भविष्यवाणी ने फिर रंग दिखाया। इस बार मेरी जिंदगी में शुभांकर आया।
शुभांकर बड़ा ही सजीले व्यक्तित्व का मालिक था। वह हमारे घर किराएदार बन कर आया था। उसे एक्टिंग का बहुत शौक था। कई नाटकों में काम कर चुका था। उसके नाटक की वीडियो देखते हुए ना जाने कब दिल ने उससे राब्ता कर लिया। दिनभर उसके इंतजार में बैचैनी बनी रहती। बंद आंखों में उसके रोमांटिक ड्रामे चलते रहते। नवीन में शुभांकर का अक्स तलाशती रहती। अजीब सी दुविधा में जिंदगी उलझ रही थी। तभी शुभांकर को टीवी सीरियल में एक रोल मिला और वह मुंबई चला गया। जाते वक्त उसने बस इतना कहा, “काश, आप मेरी हीरोइन बन पातीं।”
खैर मुझे उसके जाने का दुख नहीं था। ऐसा लग रहा था, जैसे कोई खाई जो मेरे आसपास बन रही थी, उसमें गिरने से पहले ही मैं संभल गयी। शायद यह बढ़ती उम्र का तकाजा था। नवीन की सादगी में सुकून का बीज बोने लगी।
सब कुछ बिखरने से पहले संभला ही था कि तुम फिर आ गए। तुम्हारा एक मैसेज कि तुमने मुझे बड़ी शिद्दत से ढूंढ़ा है और तुम मुझसे बात करना चाहते हो। तुम्हारे इस मैसेज ने मेरे पिछले सुर के तार छेड़ दिए। तुम्हारे भेजे नंबर पर फोन किया तो कुछ भी तुममें पहचाना सा नहीं लगा। तुम्हारा गुरूर वाला लहजा बदल चुका था। पूरी बातचीत के दौरान चाह कर भी तुमको घमंडी नहीं कह पायी। तुमने बहुत सुलझी हुई बातें कीं। मुझे लगा इस अधूरी दोस्ती को अब मुकम्मल कर ही लेना चाहिए। कहीं ना कहीं ईश्वर की कोई मर्जी होगी, तभी तो मैं जब भी कहीं खुद को तलाशने की कोशिश करती हूं कि तुम आ जाते हो।
मेरी चाल एक बार फिर बदल गयी। आंख खुलने के साथ ही तुम्हारी याद मुस्करा उठती। नींद से मुंदतीं पलकों पर तुम्हारे ही स्वप्न सजे होते। दिल करता बस तुमसे बातें करती रहूं। मंदिर के दीये की लौ में भी तुम ही मुस्करा उठते, लेकिन तुम में अब बहुत कुछ बदला हुआ था। तुम मुझे भी समझाने लगे कि अब हमारी दुनिया बस हमारी नहीं है। उसमें कई और दुनिया भी समाहित हैं। तुमको सुनती, तुम्हारे मैसेज पढ़ती तो यही सोचती कि तुम ठीक ही कह रहे हो। एक दिन तुम्हारा मैसेज आया कि तुम मेरे ही शहर में हो। मैंने एक मुलाकात की फरमाइश रख दी। तुमने कहा कि यह संभव नहीं है, क्योंकि तुम्हारी पत्नी भी साथ है। उसे यह पसंद नहीं आएगा। मैंने कहा भी कि उसके साथ ही मिलते हैं। तुमने साफ मना कर दिया। दिल उतना ही दुखी हुआ, जितना कि तुमसे पहली मुलाकात में दुखी हुआ था।
किंतु ईश्वर को ना जाने क्या मंजूर था। तुमसे मिलने की खुशी इस तरह दहशत में बदल जाएगी, नहीं जानती थी।
उस शाम मैं और नवीन मॉल में शॉपिंग कर रहे थे कि मुझे एक पहचाने चेहरे ने आवाज दी। एक मिनट में ही मैं उसे पहचान गयी, वह सुचित्रा थी। हम दोनों खुशी से गले लग गए। मैंने उसे नवीन से मिलवाया और उसने मुझे तुमसे मिलाया, “ये हैं मेरे प्राणनाथ रॉबिन !”
मुझे सकते में खड़ा देख वह बोली, “मुझे इनसे इश्क होने तक खबर नहीं थी कि ये महाशय हमारी दोस्त रोजी के कजिन हैं।”
मैंने शब्दों को लगभग चबाते हुए कहा, “रोजी के घर इनसे मिल चुकी हूं।”
उसने हंसते हुए कहा, “देख, तुझसे मिलवा तो रही हूं, किंतु तेरे ग्रह-नक्षत्र से मैं अच्छी तरह से वाकिफ हूं।”
उसकी इस बात से मैं भीतर तक दहल गयी। कुछ वक्त उनके साथ बिता कर मैं और नवीन वापस आ गए। देर रात तक मेरी आंखों में नींद नहीं थी। सुचित्रा और राॅबिन को एक साथ देख कर ना खुशी हुई थी, ना ही कोई दुख हुआ था। करवट बदल कर देखा तो नवीन सुख की नींद सो रहे थे। उनके चेहरे पर सच्चे साथी का सुकून तैर रहा था। उठी और खुद को शीशे में निहारने लगी। एक तृष्णा खुद के मुख पर दिखायी दी। अपनी हथेली को गौर से देखा। उस पर खिंची रेखाओं को रगड़ते हुए मुठ्ठी बंद करके खुद से वादा किया कि जीवन में नित नवीन मरीचिका में भटकने से कहीं ज्यादा सच्चा है नवीन का साथ। इसी के साथ मैंने रॉबिन के नंबर को ब्लॉक कर दिया, ताकि एक और बार तुम फिर से ना आ जाओ।