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मां जी की तेरहवीं बीत जाने के बाद पूरा घर सूना हो गया था। सारे मेहमान वापस चले गए थे। एक सन्नाटा सा पसर गया था पूरे घर में। दिनचर्या तो यथावत ही थी, पर तृप्ति को लग रहा था जैसे कोई काम ही नहीं रह गया है। मां जी अपने साथ उसके सारे काम भी ले कर चली गयी थीं। थोड़ी देर ऐसे ही खामोश रही तृप्ति ! फिर खुद को समझाने लगी ! अरे, घर से एक सामान भी कम हो जाए तो वह जगह खाली लगने लगती है, यहां तो एक जीता-जागता इंसान चला गया तो घर खाली लगेगा ही। खुद को दूसरे कामों में उलझाने की नाकाम कोशिश करती रही। मन फिर भी नहीं लग रहा था, एक बेचैनी सी महसूस हो रही थी। तभी मोबाइल बज उठा ! अनु का नंबर दिखते ही उसे लगा, जैसे मन मांगी मुराद मिल गयी। एक वही तो थी, जिससे वह मन की सारी बातें कर सकती थी।

‘‘मां जी की याद आ रही है तृप्ति?’’ बड़े प्यार से पूछा अनु ने।

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‘‘हां याद क्या, एक अजीब सा सन्नाटा लग रहा है भीतर यार ! पता नहीं क्यों? जो भी हुआ उसकी तो उम्मीद ही थी। डॉक्टर ने तो बहुत पहले ही कह दिया था और हम सब ऐसा चाह भी रहे थे। तुमने देखा था ना मां जी कितने कष्ट में थीं। सभी चाह रहे थे उन्हें मुक्ति मिल जाए। पर मुझे इतनी बेचैनी क्यों हो रही है?’’ टूटी हुई आवाज में जवाब दिया तृप्ति ने।

‘‘सब ठीक हो जाएगा तृप्ति ! तुमने तो उनकी कितनी सेवा की है अंतिम दिनों में।’’

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‘‘हां, पर हमेशा मुझे ऐसा लगा जैसे उनके होंठ तो चुप रहते, पर आंखें बहुत कुछ कहना चाहती थीं।’’

‘‘ऐसा होता है तृप्ति। जाने वाला अपने साथ कितनी ही अनकही बातें अपने साथ ले कर जाता है। जो बात वह किसी से कह नहीं पाया हो, वह तो उसके साथ ही चली जाती है ना।’’

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धक्क से रह गया तृप्ति का दिल। ‘‘अनु, तो क्या जो मैंने उनके साथ किया, वह बात भी उनके अंदर रही होगी ! उन्होंने तो किसी से नहीं कहा तो क्या वह भी उनके साथ चली गयी। मुझे बहुत घबराहट हो रही है।’’

‘‘खुद को दोषी मानना बंद कर, तृप्ति। तुमने कुछ नही किया है। खुद को संभाल। और फिर से वापस अपनी जिंदगी पटरी पर ला। मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता। अपने आपको अन्य कामों में लगा। अपनी जिंदगी वापस जी। जो हो गया सो हो गया। वैसे भी 3 सालों से तू उनकी सेवा कर रही थी। खुद को तो भूल ही गयी थी। ऐसा करते हैं शाम 5 बजे कॉफी हाउस में मिलते हैं, तब तक मैं भी अपने सारे काम निपटा देती हूं। चल अब फोन रखती हूं ! ज्यादा परेशान ना हो।’’

‘‘थैंक यू अनु ! हर बार मुझे समझाने के लिए और सही राह दिखाने के लिए।’’

‘‘अरे ओ मैडम ! दोस्ती में नो थैंक्स! भूल गयीं? चल मिलते हैं,’’ कह कर अनु ने फोन रख दिया।

अभी तो सिर्फ 12 बजे हैं और कोई काम भी नहीं है। थोड़ा आराम ही कर लेती हूं, वैसे भी इधर काफी थक गयी। खुद के लिए समय ही नहीं मिला। सोच कर तृप्ति बिस्तर पर लेट गयी। आंखें बंद करते ही मां जी का चेहरा आंखों के सामने आने लगा तथा साथ ही अनु की बातें भी। जाने वाला अपने साथ अनकही बातें भी साथ ले जाता है, तो क्या जो जिंदा हैं, उनके अंदर अनकही बातें नहीं होतीं? कितनी ही बातें ऐसी हैं, जो हम किसी से कह नहीं पाते, तो वे बातें तो हमारे अंदर भी हैं। फिर...?इन सारी बातों को सोचते तृप्ति अतीत में खो गयी।

तृप्ति 20 बरस की ही थी, जब वह ब्याह कर इस घर में आ गयी थी। सपने देखने के दिन थे। मन हकीकत से कोसों दूर था। एक शादी में अजय के घर वालों ने तृप्ति को देख लिया था और शादी का प्रस्ताव भेज दिया था। पापा ने बहुत ही सहजता से पूछा था, ‘‘बेटा, क्या जवाब दूं?’’

‘‘पर पापा, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती, मैं आगे पढ़ना चाहती हूं।’’

‘‘हां बेटा वो तो है, पर घर-परिवार, लड़का सब अच्छा है। बाद में ऐसा रिश्ता ना मिला तो? फिर मैं कहां जाऊंगा खोजने? उन लोगों ने तुम्हें पसंद किया है, यह तो हमारी खुशकिस्मती है, जो घर बैठे रिश्ता मिल रहा है।’’

पापा को गंभीर देख तृप्ति ने कहा, ‘‘पापा, आप को ठीक लग रहा हो तो कर दीजिए।’’

पापा को खुश देख कर कर यह बात अंदर ही रह गयी कि एक बार किसी से मिल कर कैसे पता चल सकता है कि सब ठीक है, पर कह ना सकी।

शादी की तैयारियां जोर-शोर से हो रही थीं। तृप्ति के मन में भी अनेक ख्वाहिशें थी। हंसता हुआ ससुराल, प्यार करने वाला पति। उसकी बातों को महत्व देता घर। घर में दो देवर, एक प्यारी सी ननद। सब के साथ वह कितना खुश रहेगी। हंसते-खेलते पूरी जिंदगी कट जाएगी।

और वह दिन भी आ गया, जब तृप्ति दुलहन बन कर तैयार हुई। पापा के चेहरे पर संतुष्टि का भाव, मां भी खुश और दोनों बहनें भी चहक रही थीं। सारे सपने और अरमानों को संजोए तृप्ति शादी की सारी रस्में निभा रही थी। भाभियों के मजाक और सहेलियों की चुहलबाजियों ने और रंग भर दिया। विदा के क्षणों में फफक कर रो पड़ी। पल भर में ही वह घर पराया हो गया। बहुत अरमानों से ससुराल की दहलीज के अंदर पैर रखा। सारे रस्मों-रिवाजों में दिन कट गया। रात को उसको कमरे में ले जाया गया।

‘‘भाभी, यह आपका और भैया का कमरा है। आपका सामान भेज रही हूं। आप कोई हल्की साड़ी पहन लीजिए। इन भारी साडि़यों में आप कंफर्टेबल नहीं हो रही होंगी ना,’’ ननद रितु ने कहा।

‘‘हां !’’ बस धीरे बोल पायी तृप्ति। नजरें घुमा कर चारों ओर देखा। कमरे में एक डबल बेड, ड्रेसिंग टेबल और एक अलमारी थी। सजावट तो कहीं थी ही नहीं। उसने तो सपने देखे थे- फूलों से सजा महकता कमरा होगा, पर यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं। आंखों में आंसू छलक आए। पहली बार सपने हकीकत से टकराए थे। खैर, खुद को संभाला और लाल रंग की हल्की साड़ी पहन ली। चेहरे को साफ कर, हल्का सा मेकअप किया और मुस्करा उठी ! आखिर पिया मिलन का वक्त आ रहा था। प्रतीक्षा करते हुए दो घंटे बीत गए। नींद से आंखें बोझिल होने लगी, तब जा कर अजय कमरे में आए। आते ही बोले, ‘‘सॉरी ! वो घर में बहुत मेहमान हैं ना, तो सब के सोने का इंतजाम कर रहा था। जब सब सो गए, तब धीरे से आया हूं।’’

‘‘सारा इंतजाम आप कर रहे थे?’’

‘‘तो और कौन करेगा? मैं बड़ा हूं तो मुझे ही करना चाहिए ना। भाई अभी छोटे हैं, उन्हें उतनी समझ नहीं है ना। और पापा करते तो अच्छा नहीं लगता। सबके सामने कमरे में आने में अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिए सब सोने चले गए तब आया। अच्छा चलो बाहर गार्डन में चल कर बातें करते हैं ! हमारी आवाज बाहर जाएगी ना, सब बाहर ही बरामदे में सो रहे हैं।’’

‘‘पर इतनी ठंड में?’’ धीरे से बोली तृप्ति।

‘‘तुम शाल ओढ़ लो ना,’’ कह कर कमरे से बाहर निकल गए अजय। धीरे-धीरे तृप्ति भी बाहर आ गयी। टहलते हुए बातें करने लगे अजय, ‘‘सुनो ! मैं घर का बड़ा हूं तो मेरी जिम्मेदारियां भी ज्यादा हैं, मैं तुमसे यही उम्मीद करता हूं कि तुम मेरा साथ देना। मेरे माता-पिता की बात सुनना और उन्हें खुश रखना। मेरे छोटे भाई-बहन का खयाल उसी तरह रखना, जैसे तुम अपने भाई-बहनों का रखती हो। मुझे पूरे परिवार की खुशी चाहिए।’’

तृप्ति चुपचाप सारी बातें सुनती रही और अजय अपनी सारी इच्छाएं तृप्ति के ऊपर डालते रहे। अपनी पत्नी के सौंदर्य को एक पल भी निहारा नहीं। प्यार के दो शब्द कहीं नहीं थे। पहले मिलन का अहसास कोसों दूर था। अजय कहते रहे और तृप्ति सुनती रही। थोड़ी देर बाद तृप्ति ने कहा, ‘‘अंदर चलते हैं, मुझे ठंड लग रही है।’’ दोनों अंदर आए।

‘‘ऐसा करो तुम सो जाओ, सुबह जल्दी उठना होगा ना। मैं भाई के साथ सोने जा रहा हूं,’’ कह कर कमरे से बाहर निकल गए अजय। तृप्ति अजय की सारी इच्छाओं को ओढ़ कर बिस्तर पर लेट गयी। सुहागरात जैसे सपनों का महल टूट गया था। थक कर चूर थी, इसलिए तुरंत ही सो गयी।

दरवाजे पर खटखट की आवाज से नींद खुली। दरवाजे पर मां जी खड़ी थीं, ‘‘जाओ, जा कर नहा लो। मैंने गरम पानी रख दिया है। सारे मेहमानों के जागने के पहले तैयार हो जाओ।’’

‘‘जी ठीक है,’’ कह कर तृप्ति ने घड़ी की ओर देखा तो सुबह के 5 बज रहे थे। इतनी ठंड में इतनी सुबह? हे भगवान! फिर चुपचाप बाथरूम की ओर चल पड़ी।

तृप्ति की पहली रसोई थी। मायके में तो सभी उसके बनाए खाने की तारीफ करते थे। जो रिश्तेदार आते, वे भी तृप्ति के खाने की तारीफ करते। तृप्ति नहा-धो कर किचन की ओर बढ़ी। मां जी ने कहा, ‘‘तृप्ति, नाश्ते में हलवा बना लो ! घर में सबको पसंद है।’’

तृप्ति ने बड़े प्यार से हलवा बनाया और सबको परोस दिया। तभी बाबू जी ने कहा, ‘‘बेटा, हलवा तो अच्छा बना है, पर तुम खाना बनाना अपनी सास से सीख लो, बहुत अच्छा खाना बनाती हैं।’’

मुंह उतर गया तृप्ति का। बोली, ‘‘ठीक है बाबू जी।’’ फिर तो तृप्ति हर चीज मां जी से पूछ कर बनाने लगी। कभी चीजें सही बनतीं, कभी नहीं। खाना जरा भी खराब होता तो सब मुंह बनाने लगते। तृप्ति खुद को ससुराल के ढांचे में ढालने की कोशिश में लग गयी। एक महीना बीत गया। इस एक महीने में तृप्ति पूरी तरह बदल गयी। सुबह पांच बजे उठ कर नहाना, फिर सबके लिए नाश्ता बनाना। खाने की तैयारी करना। सबका समय पर हर काम करना।
बीस बरस की अल्हड़ सी तृप्ति कब एक जिम्मेदार गृहिणी बन गयी, पता ही नहीं चला। पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया तृप्ति का। घर का कोई भी फैसला वह नहीं ले सकती, यहां तक कि उसके दहेज में आया हुआ सामान भी कहां रखा जाएगा, यह भी सास और देवर तय करते। पापा ने जो इतने शौक से सारा सामान दिया था, उस पर भी उसका हक नहीं था। बहुत उम्मीद से अजय की ओर देखती तो उन्हें हमेशा मौन देखती। मन मसोस कर रह जाती। अजय को भी प्यार सिर्फ रात बिस्तर पर ही आता। जब कभी जबान खोल कर अजय से कहती तो वे तृप्ति को ही समझाते, ‘‘मैं घर का बड़ा हूं। मुझे सबको ले कर चलना है और तुम भी इन छोटी-छोटी बातों में मत उलझा करो।’’ एक दिन तो हद ही हो गयी, जब उसकी फेवरिट घड़ी पहन कर उसकी ननद कॉलेज चली गयी। तृप्ति को बहुत बुरा लगा।

‘‘आपने मेरी घड़ी क्यों पहनी?’’ कड़े शब्दों में पूछ लिया तृप्ति ने। फिर तो पूरा घर ही उसके पीछे पड़ गया। ‘‘अरे भाभी, आपकी घड़ी यों ही पड़ी रहती है। मैं पहन कर चली गयी तो क्या हुआ?’’

देवर ने भी कहा, ‘‘भाभी, हम नहीं जानते थे आपके अंदर इतना अपना और पराया है।’’

मां जी ने कहा, ‘‘देखो बहू, ऐसी ही बातों से घर में फूट पड़ती है।’’

बाबू जी भी उसे ही समझाने लगे, “तुम घर में बड़ी हो, तुम्हें सबको साथ ले कर चलना चाहिए।’’

तृप्ति का मन भारी हो चला था। शाम को अजय के आते ही सबने इस बात को जाने कैसे कहा कि अजय कमरे में आते ही बोले, ‘‘तृप्ति, जो हुआ सो हुआ, ध्यान रखना आगे से ऐसा ना हो।’’

तृप्ति हैरानी से अजय को देखती रह गयी। एक बार मुझसे मेरे मन का हाल पूछा भी नहीं। रात तृप्ति की रुलाई फूट पड़ी। जी भर कर रोयी। सोचने लगी यह कैसी जिंदगी है। पापा के घर में बिलकुल राजकुमारी जैसी थी। दिखने में जितनी सुंदर, गुण में भी उतनी ही आगे थी। शायद ही कोई ऐसा काम था, जो तृप्ति ना करती हो। सिलाई-कढ़ाई, पेंटिंग-बागवानी सभी शौक उसे थे। रिश्तेदार कहते, ‘बहुत भाग्यशाली होगा वह घर, जहां तृप्ति जाएगी।’ पापा के घर तृप्ति जो चाहती, वह होता।

पर शादी के बाद तो सब कुछ बदल गया। इस घर में उसकी बातों का कोई महत्व नहीं था। सारे फैसले सब खुद ही कर लेते थे। उसकी इच्छा, अरमान कुछ मायने नहीं रखते थे। वह बस सबको खाना बना कर खिलाने वाली और जिम्मेदारियां निभाने वाली एक औरत बन कर रह गयी। समय के साथ दो बच्चे भी हो गए, पर तृप्ति की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। अब तो उसे अपने बारे में सोचने का भी समय नहीं मिलता। तृप्ति खुद को अपनी परिस्थिति में ढाल चुकी थी।

पांच वर्ष बीत गए। ननद की शादी हो रही थी। तृप्ति के जिम्मे बस घर में आए हुए मेहमानों की आवभगत थी, उसे ही वह कर रही थी। बाकी सब तो घरवाले ही कर रहे थे। तृप्ति चुप ही रहती थी। तभी बुआ सास ने तारीफ कर दी,‘‘ तृप्ति कितने मन से सबका खयाल रख रही है ना, वो भी बिना कुछ कहे, वरना आजकल की बहुएं तो काम ही नहीं करना चाहतीं। सारा समय तो खुद को सजाने-संवारने में ही लगाती हैं। तृप्ति सादे ढंग से तैयार होती है, फिर भी कितनी सुंदर लगती है।’’

सुनते ही ननद रितु चिढ़ उठी, ‘‘बुआ, शादी में ना दुलहन की तारीफ की जाती है, आइए मैं आपको अपनी साड़ियां दिखाऊं।’’

सभी साड़ियां देखने लगे। तभी मामी सास ने पूछा, ‘‘तृप्ति, तुमने कैसी साड़ी ली? दिखाओ।’’

‘‘मेरे पास तो कितनी साड़ियां हैं मामी, इसलिए मैंने नहीं ली,’’ तृप्ति ने सहज ढंग से कहा।

तभी मां जी ने बात संभाली, ‘‘अरे तृप्ति भी इन्हीं में से कोई पहन लेगी, जो उसे पसंद होगा, वह कोई हमलोगों से अलग थोड़े ही है।’’

‘‘हां तृप्ति, इन्हीं में से कोई ले लो,’’ बुआ ने कहा। तृप्ति ने रानी कलर की शिफॉन की साड़ी उठा ली। तभी रितु ने कहा, ‘‘नहीं भाभी, यह मेरी फेवरेट साड़ी है, आप कोई और ले लीजिए, और आपको क्या जरूरत है? आपके पास तो कितनी साड़ियां हैं, आप भी ना, सबकी बातों में आ जाती हैं।’’ तृप्ति साड़ी वहीं रख कर चली गयी। जाते-जाते मां जी की आवाज उसके कानों में पड़ी, ‘‘अब जिसकी शादी है, उसकी पसंद तो मानूं ना।’’

तृप्ति का मन हो रहा था कि चीख कर कहे, ‘जिस भाभी की घड़ी पहन कर सालों कॉलेज गयी, उसे ही आज एक साड़ी के लिए सबके सामने जलील कर दिया।’ और मां जी पर भी बहुत गुस्सा आ रहा था, अब परिवार में फूट नहीं पड़ रही? पर वह ऐसा ना कर सकी। चुपचाप अपने कमरे में जा कर रो कर खुद को शांत करती रही। शादी के समारोह में भी साधारण ही उपस्थिति रखी अपनी।

समय अपनी रफ्तार से चलता रहा, पर तृप्ति की जिंदगी जैसी थी वैसी ही रही। तीन वर्ष और बीत गए।

अब देवर की शादी की तैयारियां चल रही थीं। घर में सभी खुश थे। अजय ने यों ही एक दिन प्यार से कहा, ‘‘चलो अब घर में एक और बहू आ जाएगी, तुम्हारी जिम्मेदारियां कुछ कम हो जाएंगी।’’

‘‘हां देखती हूं,’’ कहा तृप्ति ने।

शादी अच्छे से संपन्न हो गयी। सारे मेहमान चले गए थे। पूरा घर बिखरा पड़ा था। थोड़ा आराम कर लूं फिर सब समेटूंगी, सोच कर तृप्ति लेटने चली गयी, थकावट की वजह से नींद आ गयी। सो कर उठी तो देखा देवर-देवरानी शादी में आए सारे सामान रख रहे थे। देवरानी के मायके से आए सारे सामान देवर अपने कमरे में रख रहे थे।

‘‘भैया, यह टीवी लिविंग रूम में रख दीजिए ना, कमरे में क्यों रख रहे हैं? पहले वाली टीवी मेरी शादी के समय की है, पुरानी हो गयी है।’’

‘‘अरे नहीं भाभी ! वहां तो पहले से है ही, इसे मैं अपने कमरे में रखूंगा, जिससे हमलोग रात में भी टीवी देख सकें। बाबू जी तो सिर्फ समाचार लगा कर बैठ जाते हैं। हमलोग अपना कार्यक्रम देख ही नहीं पाते।’’

‘‘अरे ! मेरी शादी का तो कोई भी सामान मेरे कमरे में नहीं रखने दिया? सारा सामान आपकी जहां मर्जी थी, वहां रख दिया। अपनी शादी हुई तो सारा अपने कमरे में?’’

‘‘भाभी, आप चाहती क्या हैं? हर बात को आप ऐसे क्यों लेती हैं? यह भी नहीं सोचतीं कि नयी देवरानी आपके बारे में क्या सोचेगी?’’

‘‘क्या गलत कह रही हूं? एक सामान ही तो रखने के लिए कह रही हूं।’’

तभी मां जी आ गयीं, ‘‘तृप्ति, रखने दो ना उसे जहां रख रहा है, क्यों हर बात पर शुरू हो जाती हो तुम। उसी की शादी का सामान है।’’

‘‘मां जी, मेरी शादी के समय आपको यह बात समझ नहीं आयी थी?’’ पहली बार विरोध किया था तृप्ति ने। फिर चुपचाप अपने कमरे में चली गयी। अजय जब कमरे में आए तो तृप्ति को देखते ही बोले, ‘‘क्या है तृप्ति, क्यों ऐसा करती हो कि लोग तुम्हें गलत बोलें।’’

‘‘आज नहीं अजय ! आज नहीं। जब मेरे साथ कुछ गलत होता है तो आपको दिखायी नहीं पड़ता और जब मैं बोलती हूं तो आप मुझे समझाने आ जाते हैं,’’ पहली बार तृप्ति का दुख गुस्सा बन कर निकला था, जिसे देख कर अजय चुप रह गए।

तृप्ति की जिम्मेदारियों में कोई कमी नहीं आयी थी। जब भी घर का कार्य करना होता, तब देवरानी सास-ससुर की सेवा कर रही होती। घर के सारे काम तृप्ति अकेले कर रही होती थी। अजय सब कुछ देखते, पर चुप ही रहते थे। मां जी भी देवरानी के साथ ही होती थीं, इसलिए तृप्ति बिना कुछ कहे अपना फर्ज निभाए जा रही थी।
एक साल और बीत गया। अब छोटे देवर की शादी की चर्चा शुरू हुई। छोटे देवर ने अपनी मनपसंद लड़की से शादी की और दूसरे शहर में रहने को चला गया। घर की जिम्मेदारियों से वह पूरी तरह आजाद था। दूसरे ही साल दूसरे देवर का भी तबादला दूसरे शहर में हो गया और वह भी अपनी पत्नी को ले कर चला गया। अब घर में तृप्ति, अजय, मां जी और बाबू जी रहे गए।

कुछ समय और बीत गया। बाबू जी रिटायर हो गए। ज्यादातर समय घर पर ही रहते थे। तृप्ति के दोनों बच्चे पढ़ाई करने के लिए हॉस्टल चले गए। मां-बाबू जी की जिम्मेदारी तृप्ति पर आ गयी। तृप्ति पहले की भांति घर संभालती, मां-बाबू जी का खयाल रखती और अपनी जिंदगी जी रही थी ! तभी अचानक एक दिन बाबू जी को हार्ट अटैक आया और वे चल बसे।

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उनके जाने के बाद मां जी बिलकुल अकेली हो गयीं। अब वे ज्यादातर समय चुप रहतीं। अजय अपने कामों में व्यस्त रहते। अब तृप्ति को अपने मन की करने की पूरी आजादी थी। तृप्ति अब अपने मन से सारे काम करती ! मां जी से कोई चीज पूछना भी जरूरी नहीं समझती थी। वह जब भी मां जी को देखती तो उसे वो सारी अनकही बातें याद आ जातीं, जो वह मां जी से कहना चाहती थी ! छोटी-छोटी बातों का दुख, जो मन के एक कोने में दबा कर रखा था, समय के साथ सख्त हो चला था। उसका दुख अब गुस्से में परिवर्तित हो गया था। परिस्थितियां अब तृप्ति के अनुकूल थीं, जिसे वह अब मां जी की उपेक्षा कर निकाल रही थी।

अजय के ऑफिस जाने के बाद मां जी कभी कोई चीज बनाने को कहतीं तो तृप्ति कहती, ‘‘अब जो बना है वह खा लीजिए, अब मैं आपके लिए इतनी मेहनत नहीं करूंगी।’’ मां जी चुप हो जातीं।

अब तृप्ति के पास काफी समय होता। वह अपना सारा समय अपने शौक को पूरा करने में लगाने लगी। तृप्ति जो शौक पूरे नहीं कर पायी थी, अब करने लगी। घूमने जाती। पेंटिंग बनाती। बागवानी करती और दोस्तों से मिलने जाती। मां जी घर में अकेली पड़ी रहतीं।

मां जी में भी जाने क्या परिवर्तन आ गया था ! अब वे तृप्ति से कुछ भी नहीं कहतीं। उनके होंठ हमेशा खामोश ही रहते। अजय से भी कोई शिकायत नहीं करतीं।

उस दिन तो तृप्ति और भी खुश हुई, जब उसे पता चला कि उसकी बचपन की दोस्त अनु इस शहर में रहने आ गयी है। एक सप्ताह बाद अनु उससे मिलने उसके घर आयी। तृप्ति ने तरह-तरह के पकवान बनाए और जी भर कर खातिरदारी की। मां जी अपने कमरे में चुपचाप पड़ी थीं।

अनु ने कहा, ‘‘अरे, मां जी को भी तो कुछ दे दो।’’

तृप्ति ने कहा, ‘‘अरे जाने दो, वे यह सब नहीं खातीं।’’

उनकी उपेक्षा देख कर अनु हैरान हो गयी। मां जी घर में अवांछित सामान की तरह पड़ी रहतीं।

तृप्ति सोचती, अब तो मैं अपने मन से जी पा रही हूं, जब मां जी का समय था, तब उन्होंने मुझे कुछ नहीं समझा। हमेशा मुझे दबा कर रखा। इन्होंने कभी मेरी कदर नहीं की। ये जो कहती रहीं मैं करती रही। अब मेरा समय आया है, अब मैं अपनी मर्जी से रहूंगी। आखिर मैं कब अपनी जिंदगी जिऊंगी।
तृप्ति दिनोंदिन और कठोर होती चली गयी। वह मां जी को ताने देती, ‘‘देखा मां जी, आपके और दो बेटे और बहुएं हैं, पर किसी ने आपको ले जाने की बात नहीं कही। बाबू जी के बाद किसी ने आपकी जिम्मेदारी नहीं ली। अरे वो तो मैं हूं, जो आपके साथ निभा रही हूं। आपने मेरे साथ क्या-क्या नहीं किया, फिर भी।’’ मां जी चुपचाप तृप्ति को देखती रहतीं और कुछ नहीं बोलतीं।

एक दिन तो हद ही हो गयी। अनु और 3-4 सहेलियां और थीं, सभी ड्रॉइंग रूम में बैठ कर कर हंसी-मजाक कर रही थीं। तरह-तरह के नाश्ते प्लेट में लगे थे ! तभी मां जी कमरे में आ गयीं और बोलीं, ‘‘तृप्ति, मुझे भी कुछ खाने के लिए दे दो। भूख लगी है।’’

‘‘अरे ! अभी तो मैं मैंने आपको नाश्ता दिया था, थोड़ी देर भी आप सबर नहीं करती हैं। देख नहीं रहीं हमलोग बातें कर रहे हैं। खाली हो जाऊंगी तो बना दूंगी कुछ खाने के लिए। आप जाइए, जा कर अपने कमरे में बैठिए।’’

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सारी सहेलियां एकाएक चुप हो गयीं। अनु ने बात संभाली और एक प्लेट में थोड़ा खाना ले कर मां जी के कमरे में आयी। अनु को देखते ही मां जी ने कहा, ‘‘बेटा, क्या करूं मुझे दवा खानी है। और भूख भी लग रही है इसलिए चली गयी, नहीं तो मैं कभी नहीं जाती।’’

अनु ने मां जी को ढांढ़स बंधाया और कहा, ‘‘कोई बात नहीं आप नाश्ता करिए। तृप्ति थोड़ा बिजी है ना इसलिए।’’

सबके जाने के बाद अनु ने तृप्ति से कहा, ‘‘तृप्ति, यह तू क्या कर रही है? इतना खराब व्यवहार मां जी के साथ क्यों कर रही है? तुम तो ऐसी नहीं थीं।’’

तृप्ति ने कहा, ‘‘तुम नहीं जानती, इन्होंने मेरे साथ क्या किया है। मैं बहुत सालों तक बर्दाश्त करती आयी हूं। अब और नहीं होता यार। जब इनका समय था, इन्होंने मुझे कुछ नहीं समझा। आज जो मैं उनके साथ कर रही हूं, वही डिजर्व करती हैं ये।’’

‘‘मैं नहीं जानती कि पीछे क्या हुआ? पर आज मैं मां जी की आंखों में तुम्हारे लिए प्यार देखती हूं, ममता देखती हूं।’’

‘‘यह तुम्हारा वहम है अनु ! मां जी ऐसी बिलकुल नहीं हैं, वह तो उन्हें कोई अपने साथ नहीं रख रहा, इसलिए वे मेरे साथ अच्छे से रह रही हैं,’’ तृप्ति ने कहा।

‘‘देख, उन्होंने जो किया, वह उनका स्वभाव था। तू जो कर रही है, यह तो तुम्हारा स्वभाव बिलकुल नहीं है। फिर क्यों ऐसा कर रही है? अगर वे चाहतीं तो अजय से तुम्हारी शिकायत कर सकती थीं, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। तू खुद सोच कि यह तो उनके लिए आसान था, पर ऐसा क्यों नहीं कर रहीं। वे तुझे प्यार करती हैं, कहीं ना कहीं तुम्हारी भलाई चाहती हैं, इसलिए ऐसा करती रही होंगी। और तू तो ऐसी नहीं थी मेरी दोस्त ! तू जो आज कर रही है क्या वह सही है? अरे, तेरा तो नाम ही तृप्ति है, फिर तू किसी को अतृप्त कैसे कर सकती है?’’ कह कर अनु चली गयी।

अनु के जाने के बाद तृप्ति सोचने लगी, ‘हां मैंने तो यह ध्यान ही नहीं दिया कि मां जी ने अजय से भी कुछ कहा क्यों नहीं। सबके फोन भी आते हैं, पर वे किसी से भी शिकायत क्यों नहीं करतीं? वे मेरी मनमानी क्यों सह रही हैं?’ तृप्ति को लगा जैसे अंदर कुछ दरक गया हो। वह सोचने लगी, मां जी तो सिर्फ मुझसे खाने की उम्मीद करती हैं, बाकी सारे काम तो वे खुद कर लेती हैं, तो क्या मैं उन्हें खाना भी समय से नहीं दे पा रही हूं? जिनके आगे मैं जिंदगी भर झुकी रही, उसे ही अपनी ताकत दिखा रही हूं, वह भी तब, जब वे कमजोर और लाचार हो गयीं। तृप्ति का मन उसे धिक्कारने लगा। अनु ने ठीक कहा, यह मेरा स्वभाव नहीं है। मैं ऐसा नहीं कर सकती। तृप्ति के अंतर्मन ने उसे झकझोर दिया। मां जी की जिंदगी भी जाने कितने दिन की है, मैं ऐसा नहीं कर सकती। मां जी के कमरे में गयी तो देखा मां जी सो रही थीं। तृप्ति जा कर वॉशिंग मशीन में कपड़े धोने लगी।

थोड़ी देर बाद देखा तो मां जी अब भी सो रही थीं। तृप्ति भी जा कर लेट गयी और कब नींद आ गयी, पता ही नहीं चला। अचानक तेज आवाज से नींद खुली। तृप्ति हड़बड़ा कर उठी और चारों तरफ देखने लगी कि क्या हुआ। भाग कर गयी तो देखा मां जी अपने कमरे में नहीं थीं। बाथरूम में गयी तो देखा मां जी वहां गिरी पड़ी थीं। तृप्ति के तो होश ही उड़ गए, उसने किसी तरह सहारा दे कर मां जी को उठाना चाहा, पर वे उठ नहीं पा रही थीं। किसी तरह उसने मां जी को उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। फिर जल्दी से अजय को फोन किया, ‘‘अजय, जल्दी आइए मां जी गिर गयी हैं।’’

डॉक्टर ने बताया कूल्हे की हड्डी टूट गयी है, पैर में प्लास्टर चढ़ गया, अब मां जी का सारा काम बिस्तर पर ही होने लगा। अजय बार-बार पूछते कि मां आप गिरीं कैसे? पर मां जी चुप रहतीं, कुछ नहीं बोलतीं ! पर यह सच तो सिर्फ तृप्ति जानती थी कि कपड़े धोने के बाद साबुन का पानी बाथरूम में फैला रह गया, जिस पर फिसल कर मां जी गिर पड़ीं। मां जी चाहतीं तो यह बात अजय को बता सकती थीं, पर वे चुप ही रहीं, किसी से कुछ भी नहीं कहा। अब मां जी का सारा काम तृप्ति के ऊपर पड़ गया और तृप्ति भी अपराध बोध से दबी सारा काम करती चली जा रही थी। मां जी की आंखों में एक अजीब सा सूनापन था, होंठों पर अजीब सी खामोशी थी। जाने उनके अंदर क्या चल रहा था, वे किसी से कुछ भी नहीं कहतीं, बस चुपचाप बिस्तर पर अपना समय काट रही थीं। धीरे-धीरे मां जी की स्थिति और बिगड़ती ही चली गयी। डॉक्टर ने कह दिया था कि इनका ठीक होना शायद ही संभव हो, क्योंकि इन्होंने जीने की इच्छा खत्म कर ली है। तृप्ति बार-बार मिन्नतें करती, ‘‘मां जी, आप ठीक हो जाइए, सब ठीक हो जाएगा,’’ पर मां जी जवाब में सिर्फ उसे देखती रहतीं और कुछ भी नहीं कहती थीं।

तीन साल बीत गए। तृप्ति ने जी जान लगा कर उनकी सेवा की। पर दुनिया से जाना एक सत्य है। मां जी भी चल बसीं।

मां जी के क्रियाकर्म में देवर, देवरानी, ननद तथा अन्य रिश्तेदार आए थे। सभी तृप्ति की तारीफ कर रहे थे। सभी कह रहे थे, ‘‘आपने तो मां जी की पूरी जिंदगी सेवा की है। वे बहुत खुशकिस्मत थीं, जो आप जैसी बहू उन्हें मिलीं।’’

ननद रितु ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘भाभी, मैं तो बेटी हो कर भी कुछ नहीं कर सकी। पर आपने जो मेरी मां के लिए किया है, उसके लिए मैं हमेशा आपका अहसान मानूंगी। वैसे भी मां मुझसे कहती थीं, मेरे बाद तृप्ति ही तेरी मां होगी, उससे ही तेरा मायका होगा। इसलिए अपनी भाभी को हमेशा सम्मान और प्यार देना। भाभी, आज से आप मेरी मां हैं,’’ कह कर लिपट गयी रितु। तृप्ति का मन हुआ जी भर रोए, पर वह चुपचाप अांसू बहा रही थी।

‘‘भाभी, कल मैं भी जाऊंगा। छुट्टी खत्म हो गयी ना,’’ छोटे देवर ने कहा, ‘‘आपने हमेशा मुझे मां जैसा प्यार दिया है। मां ने कहा था तृप्ति से पूछ कर ही सब कार्य करना। मैंने अपने सारे संस्कार उसे ही सिखाए हैं। तू तो घर से बाहर ही रहा। तुझे तो कुछ पता भी नहीं। मां ने अपनी जगह आपको दी है, इसलिए आप अपना हाथ मेरे सिर पर हमेशा रखिएगा।’’

तभी बड़े देवर और देवरानी आ गए। कहा, ‘‘भाभी, अब आप ही घर की मालकिन हैं। ये फैसला हमारा नहीं मां का है। मां ने कहा था- मेरे बाद तृप्ति ही इस घर की बड़ी है, साथ ही साथ जिम्मेदार भी है। इसलिए मेरे बाद तुम सब उसका ही कहना मानना। उससे ही सब पूछना। मुझे पूरा विश्वास है, वह तुम सबको संभाल कर रखेगी। उसने अपना हर फर्ज अच्छे से निभाया है, आगे भी करेगी। इसलिए आज से आप ही मां की जगह पर हैं।’’

तृप्ति फूट-फूट कर रो पड़ी। मन ही मन कहने लगी, ‘मैंने आपके साथ कितना गलत किया मां जी। आप मुझे इतना प्यार करती थीं, यह तो मैं जान ही नहीं पायी।’ तृप्ति की बेचैनी और बढ़ गयी यह सोच कर कि अंतिम दिनों में तो उन्होंने उससे कुछ कहना ही बंद कर दिया था। बाकी सबसे तो कुछ ना कुछ कहा ही, फिर मुझसे कुछ क्यों नहीं। उनकी खामोश आंखों में क्या था, जो वह पढ़ ना सकी।

तभी तृप्ति को खयाल आया कि 4 बजने वाले हैं। सोचा चलूं थोड़ा काम निपटा कर अनु से मिल आती हूं।

शाम 5 बजे कॉफी हाउस में तृप्ति अनु से कह रही थी, ‘‘मां जी अपने साथ क्या अनकहा ले गयी होंगी यार। मैं तो उनकी आंखों को पढ़ भी नहीं पायी।’’

तृप्ति ने कहा, ‘‘जीवन में आगे बढ़ दोस्त। तेरा बहू का रोल खत्म हो गया। अब और भी जिम्मेदारियां हैं। रह गयी मां जी की बात ! तो उन्हें तुमसे कोई शिकायत होती तो किसी से तो कहतीं? हो सकता है तुम्हारे साथ जो उन्होंने किया, उसका प्रायश्चित उनकी आंखों में हो। इंसान अपने अंत समय में सब ठीक करना चहता है। इसलिए इस बात को यहीं खत्म कर दे, क्योंकि कोई नहीं जानता जाने वाला अपने साथ क्या अनकहा ले कर गया। अब जीवन में आगे बढ़ते हैं। और सुन, बहुत समय के बाद अजय के साथ अकेले रहने का मौका मिला है इसे बर्बाद मत कर,’’ हंसते हुए कहा अनु ने।

एक घंटे बाद दोनों दोस्त हंसते हुए विदा ले कर अपने-अपने रास्ते बढ़ चलीं।

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