मिसेज मुखर्जी ने प्रेम विवाह किया था। विवशता का प्रेम और जबर्दस्ती का विवाह। बीते 3 बरसों में उनके पास प्रेम के बस अवशेष बचे हुए हैं और विवाह... हां, विवाह तो शेष बचा ही है, क्योंकि विवाह तो वे चाह कर भी नहीं तोड़ सकतीं। इज्जत, सामाजिकता, ममता उनके बंधन हैं। ...और फिर कोई कारण भी तो नहीं है विवाह तोड़ने का। फिलहाल जो कुछ भी शेष है, वह काफी कुछ टूटा-फूटा है। ऐसा क्यों और कैसे हुआ, मिसेज मुखर्जी स्वयं ही नहीं जान सकीं। वे बस स्मृतियों के तिनकों को चुनती रहती हैं।
उन दिनों मिसेज मुखर्जी ‘गीतू’ के नाम से पहचानी जाती थीं। गीतू उम्र की उस दहलीज पर खड़ी थी, जहां से सारी दुनिया ही सुहानी लगती है। आईने में अपनी सूरत देखना उसे भाता था। अपने लंबे, घने बालों में वह बड़े दुलार से कंघी करती थी। कुल मिला कर देखा जाए तो गीतू कोई अप्रतिम सुंदरी तो नहीं थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक भोली मोहकता थी, आकर्षण था। गोल चेहरा, नुकीली ठोड़ी, बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें, कुछ-कुछ आपस में जुड़ती हुई भौंहें। हां, रंग जरूर सांवला था, लेकिन दबा नहीं, खिलता हुआ। हंसती तो चावल के दाने जैसी सुघड़ दंतपंक्ति बेहद सुंदर दिखती। लचीली, आकर्षक देहयष्टि। जब बीए में गीतू के डिस्टिंक्शन मार्क्स आए, तब एकदम से हर कोई उसे पहचानने लगा। और तो और एमए प्रीवियस की इंट्रोडक्शन पार्टी में उसे ‘ब्यूटी विद ब्रेन’ का टाइटल भी मिल गया। लेकिन उन्हीं दिनों किसी ने गीतू का छोटा सा दिल भी छीन लिया। था एक लड़का तुषार, जिसकी गहरी निगाहें लगातार उसे देखा करतीं। प्यार से, अनुराग से, भावातिरेक से। लंबा, सांवला तुषार कविताएं लिखता था। प्रेम की, विरह की, मिलन की। कहानियां ऐसी लिखता था, जो मन को छू जाएं। उसकी एकाध कहानियां साहित्यिक और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई थीं। बहुत सी साहित्यिक गोष्ठियों से उसका बुलावा भी आने लगा था। उसकी वेशभूषा बाकायदा लेखकों जैसी हुआ करती थी।
गीतू को तुषार का साथ अच्छा लगने लगा था। यूनिवर्सिटी जाने का हर दिन तुषार के साथ रहने का दिन होता। हर दिन उनका प्रेम प्रगाढ़ होता जा रहा था। दिन उड़ते जा रहे थे, बहते जा रहे थे। मीठे, मधुर, प्रेम में डूबे हुए दिन। गीतू जब तुषार की आंखों में देखती तो उसे महसूस होता कि तुषार की निगाहों से एक अलग सा प्रकाश फूट रहा है। उसके शब्दों में जादू होता और गीतू उस जादू में खो जाती।
ऐसे ही एक दिन गीतू ने घर में बताया कि वह तुषार से ब्याह करना चाहती है। घर में तब कोई तूफान नहीं मचा। बस पापा-मम्मी ने एक बार तुषार से मिल लेना चाहा।
उस दिन तुषार घर आया तो कुरता-पाजामा ही पहने हुए था। प्यासा के गुरुदत्त जैसा लगा गीतू को। वह मुस्करा उठी थी। हां, कंधे पर एक झोला टाइप बैग टंगा था, जिसमें उसकी कुछ साहित्यिक निधि रखी हुई थी। शायद वह गीतू के पापा को कुछ-कुछ सुना कर इंप्रेस करना चाहता होगा। लेकिन पापा की नजरों को देख कर लगा कि उन्होंने पहली ही दृष्टि में तुषार को फेल कर दिया था। उनका पहला सवाल था, “ तुम्हारे फ्यूचर प्लान्स क्या हैं, बरखुरदार। किसी कॉम्पिटीशन वगैरह में बैठने का इरादा रखते हो क्या?’’
“मुझे अपनी पहचान एक लेखक और कवि के रूप में चाहिए, सर। एक सफल लेखक। कॉम्पिटीशन वगैरह मेरे जैसों के लिए नहीं है। सब अफसर हो जाएंगे तो बाकी काम कौन करेगा?’’
“लेकिन बिना किसी फाइनेंशियल सिक्योरिटी के तुम्हारे साथ गीतू की शादी कैसे हो सकती है?’’
“थोड़ा समय दीजिए, सर। इस फील्ड में सफल होने में टाइम लगता है। मुझे खुद पर भरोसा है।’’ तुषार का आत्मविश्वास देख कर गीतू निहाल थी। तुषार बहुत कुछ कहता रहा, लेकिन गीतू ने नोटिस किया कि मम्मी और पापा दोनों ही ऊब रहे हैं। उनके चेहरों पर तुषार के लिए घोर उपेक्षा थी। पापा की बातचीत में एक रूखापन था। साफ जाहिर था कि उन्हें तुषार पसंद नहीं आया। मम्मी ने भी अपनी राय दी कि इतने हल्के से जिंदगी लेने वाले कभी सफल नहीं हो सकते। यह लड़का जीवन में कभी कुछ नहीं बन सकेगा, यह मेरा अनुभव कहता है। उन्हें तुषार नेता टाइप का लगा... और इस तरह के लड़के उनको नहीं पसंद आते। गीतू को रुलाई आ गयी। मनुहार, जिद, धमकी और आंसुओं के बावजूद गीतू मम्मी-पापा से अपनी जिद नहीं मनवा सकी। किसी ने उसकी सूजी आंखें नहीं देखीं, उसका रोता हुआ मन नहीं देखा। मम्मी-पापा व्यावहारिक थे। बस तुरत-फुरत उसके लिए लड़का देखा जाने लगा। बड़े प्यार दुलार से गीतू की पढ़ाई बंद करवा दी गयी। जिस लड़के से गीतू का विवाह तय हुआ, वह एक बड़ा अफसर था। छोटे कद का अनाकर्षक, सांवला व्यक्ति। विवाह होने में अभी 3 महीने थे और इन्हीं 3 महीनों में गीतू ने रवींद्र से मिल कर उससे प्रेम करने की कोशिश की। सफल हुई या नहीं- यह तो वह भी नहीं जानती। लेकिन विवाह हो गया। और इस तरह वह गीतू से मिसेज मुखर्जी बन गयी।
आज तीन बरस बाद वह एक बच्ची की मां है। घर-गृहस्थी वाली घरेलू औरत। सुंदर और आकर्षक। हां, नौकरी-वौकरी नहीं करती वह। उसे जरूरत भी नहीं है नौकरी करने की। पति जो क्लास वन अफसर है। इन तीन बरसों में गीतू जान चुकी है कि विवाह करने से ही प्रेम नहीं उपजता। साथ सो लेने से भी प्रेम नहीं हो जाता। कोशिश करने से भी प्रेम नहीं होता। प्रेम तो अनायास हो जाता है, सायास नहीं। वैसे ही जैसे उसे तुषार से हुआ था। रवींद्र के साथ दिन-रात बिताते हुए उसने जाना कि रवींद्र को आत्मप्रशंसा की भूख है। उसे पता है कि वह अनाकर्षक है और अपनी इस अनाकर्षकता को वह अपने बड़बोलेपन से ढक देना चाहता है। गीतू जैसी सुंदरी को दबा देने की चाहत उसके मन में जब-तब उठ आती है और वह अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों को गिनाने लग जाता है। गीतू को पता है कि उसे अब रवींद्र के साथ ही निभाना है, उसने निभाना सीख भी लिया है। तब भी अकसर लगता है कि काश बीते दिन लौट आएं।
नौकरी में प्रमोशन के साथ ही रवींद्र को नियमित पीने की लत लग गयी है। उसके बहुत से सरकारी मातहत उसके लिए शराब का इंतजाम कर देते हैं। गीतू को शराब से सख्त नफरत थी। लेकिन जो उसके सामने बैठ कर रोज पीता है, उससे कैसे नफरत कर सकती है। वह तो उसका पति है। उस समय गीतू को लगता है कि वह उसका पति नहीं, कोई अजनबी है। उसने कभी नहीं बताया अपने मम्मी-पापा को कि रवींद्र ने एक दिन शराब के लिए बहस करते-करते उसके गाल पर तड़ाक से एक तमाचा जड़ दिया था। फिर तो गीतू बात करते हुए अतिरिक्त सावधान रहती। ज्यादा उलझती नहीं थी रवींद्र से।
नशे में बार-बार रवींद्र उसे अपनी डिग्रियां दिखाता, अपने मेडल्स दिखाता। अब तो गीतू को ये सब रामनाम जैसा रट गया था कि रवींद्र ने दसवीं में अपने पूरे जिले में टॉप किया था। बारहवीं में 90 प्रतिशत अंक आए थे। पहले प्रयास में आईआईटी क्रैक किया था उसने। फिर पहली बार में सिविल सर्विसेज में सलेक्शन। उसके अधिकतर कलीग्स की पत्नियां डॉक्टर, इंजीनियर या ब्यूरोक्रेट्स हैं, जबकि गीतू का तो एमए भी पूरा नहीं हुआ। शुरू-शुरू में गीतू कुछ समझती नहीं थी। लेकिन समय के साथ समझने लगी कि यह सब उसे जान कर सुनाया जाता है। लेकिन कब तक? यह सब क्या उसे आजीवन सुनते रहना होगा? गीतू सब कुछ कर सकती थी, लेकिन रवींद्र ने उसे कभी कुछ करने नहीं दिया। गीतू को एक छुईमुई गुड़िया ही बना रहने दिया उसने और गीतू दबती गयी, दबती गयी। गीतू जान चुकी है कि रवींद्र को बस खुद से प्यार है। सुंदरी गीतू उसके लिए मात्र एक ट्रॉफी है, हर आयोजन में साथ रहने के लिए। पैसा है, रुतबा है और गीतू के अधरों पर निरंतर बनी रहने वाली एक नकली मुस्कान भी है। सोसाइटी में दोनों की जोड़ी आदर्श मानी जाती है। क्या जीने के लिए इतना पर्याप्त है? गीतू खुल कर सांस लेना चाहती है, मगर उसे लगता है वह सोने के पिंजरे में कैद है। कोई दरवाजा नहीं, कोई खिड़की नहीं।
उसका दिल कहता है कि अगर उसने तुषार को चुना होता तो शायद उसके जीवन में इतनी घुटन नहीं होती। दूसरी तरफ उसका दिमाग कहता है रवींद्र के साथ उसका भविष्य सुरक्षित है। जीवन सहज-सुगम रहे, इसके आर्थिक सुरक्षा का संबल आवश्यक है, लेकिन उसका क्या, जो तुषार के पास छूट गया और रवींद्र से जुड़ा ही नहीं। वह याद करती रही- तुषार के चेहरे की कोमलता, उसकी काव्यात्मक भाषा, गीतू की उंगलियों पर उसकी छुअन। नहीं पता कि तुषार अब कहां होगा? नहीं पता कि रवींद्र को चुन कर उसने सही किया या गलत? नहीं पता कि कल को उसकी अपनी बेटी भी जीवनसाथी के रूप में किसी को चुनेगी या ऐसे ही किसी दोराहे पर खड़ी होगी तो गीतू क्या कहेगी, क्या करेगी? दिल और दिमाग की इस कशमकश में गीतू लगातार उलझती रहती है। यह कशमकश कब तक चलेगी- नहीं पता। लेकिन जब भी किसी पुरवा हवा का झोंका आता है तो उसे भ्रम होता है, तुषार ने उसे छुआ है। जब भी कोई बिरहा गाता है, उसे लगता है तुषार ने उसे पुकारा है। और जब भी वह चुपचाप अकेली बैठती है, उसे भ्रम होता है कि तुषार ने उसके दरवाजे पर दस्तक दी है शायद। वह दौड़ कर दरवाजा खोलती है, लेकिन वहां कोई नहीं होता।