साल 1974 में नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन की वह सुबह आम दिनों की ही तरह थी। लेकिन उस दिन वहां जो हुआ, वह 10 सालों तक खबरों में बना रहा। एक महिला अपने दो बच्चों, कुछ नौकरों, पालतू कुत्तों और बहुत से साजोसामान के साथ नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के वीआईपी वेटिंग हॉल में पहुंच गयी। उसने अपना नाम बेगम विलायत महल बताया। वे खुद को अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह की बहू बताती थीं और साथ ही मांग की कि वे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से मिलना चाहती हैं। बेगम विलायत महल की मांग थी कि उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त की गयी लगभग 80 करोड़ की जायदाद वापस की जाए और जब तक उनकी मांग पूरी नहीं होती, तब तक वे यहीं रेलवे स्टेशन पर डेरा डाले रहेंगी।
लगभग 10 सालों तक बेगम विलायत महल अपने दो बच्चों के साथ शाही अंदाज में वीआईपी वेटिंग रूम के एक हिस्से में रहीं और आखिर में सरकार द्वारा उन्हें रहने के लिए मालचा महल दिया गया। वह महल लगभग खंडहर था, लेकिन वेटिंग रूम से अच्छा था। वहां जाने के बाद किसी ने उस परिवार की सुध नहीं ली और कुछ सालों बाद डिप्रेशन की शिकार हो कर बेगम विलायत महल ने हीरे के टुकड़े निगल कर आत्महत्या कर ली। उसके कुछ सालों बाद बेगम की बेटी सकीना और फिर बेटा प्रिंस साइरस गुमनामी में ही दुनिया को अलविदा कह गए।
द रिबेल प्रिंसेस
आजादी से पहले भोपाल के नवाब थे हमिदुल्लाह खान, जिनकी सबसे बड़ी बेटी का नाम था आबिदा सुल्तान। यह वही नवाबजादी थी, जिसका जीवन दर्द, बहादुरी और बगावत की अनूठी मिसाल बना रहा। आबिदा सुल्तान को उनकी दादी ने पाला-पोसा और 12 वर्ष की उम्र में कुरवई के नवाब मोहम्मद सरवर अली खान से निकाह कर दिया। यही निकाह आबिदा के जीवन में रुसवाई और तनहाई ले कर आया। यह वह आबिदा थी, जो रोल्सरॉयस गाड़ी चलाती थी, पोलाे खेलती, बाल छोटे रखती थी और और बाघों का शिकार किया करती थी। शादी उसके लिए बंधन साबित हुई और शौहर के साथ वैवाहिक संबंध दर्दनाक बने। 9 साल बाद आबिदा पति का घर छोड़ कर अपने घर वापस आ गयी। ऐसा कहा जाता है कि बेटे शहरयार खान की कस्टडी को ले कर दोनों के बीच काफी लड़ाई-झगड़ा हुआ और फिर एक दिन गुस्से में बंदूक ले कर आबिदा अपने शौहर के सामने पहुंच गयी। यह कह कर कि यदि इस बंदूक से उसने उसे गोली नहीं मारी, तो वह उसे गोली मार देगी। आबिदा को पिता की मौत के बाद उत्तराधिकारी घोषित किया गया। लेकिन उसके बाद भी आबिदा के जीवन के मसले खत्म नहीं हुए। विभाजन के समय हिंदू-मुस्लिम दंगों से आहत हो कर वे पाकिस्तान चली गयीं, जिसकी वजह से सरकार ने आबिदा की जगह उनकी बहन साजिदा सुल्तान को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।