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आम की गुठलियां अब फेंकें नहीं, इकठ्ठा कर भेजें जसमीत सिंह अरोड़ा को। क्योंकि ये लगाते हैं पेड़ों के लंगर। क्या आप भी इस गुठली मिशन का हिस्सा बनना चाहेंगे?

आपने मुहावरा तो सुना ही होगा ‘आम खाओ, गुठली मत गिनो?’ लेकिन अब गुठलियां गिनने की जरूरत है, क्योंकि अब आम की गुठलियों का इंतजार कर रहे हैं गुठली मैन। जी हां, मिलिए कोलकाता में बसे जसमीत सिंह अरोड़ा से, जो गुठली मैन के नाम से जाने जाते हैं।

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गुठली मैन नाम कैसे पड़ा

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पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर जसमीत सिंह अरोड़ा लंबे समय से। किसानों के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने किसानों की दशा को सुधारने का बीड़ा उठाया। उन्होंने सबसे पहले मुख्य बातों पर गौर किया। उन्होंने देखा शहर तो शहर, गांव-देहात के बच्चे भी अपने पर्यावरण को ले कर बहुत सजग नहीं हैं। ऐसे में पर्यावरण की सजगता का बीज बोना निहायत ही जरूरी है। जसमीत को आम में पर्यावरण का उज्ज्वल भविष्य दिखायी देने लगा। उन्होंने आम की गुठलियों को इकट्ठा कर पौध बनाना शुरू किया। गुठलियां इकट्ठा करने के दौरान लोगों ने उन्हें पागल सरदार कहना शुरू कर दिया, पर वे लगातार पर्यावरण संरक्षण का काम करते रहे।

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कैसे शुरू हुआ गुठली मिशन

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हम विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले कृषि प्रधान देश हैं। जसमीत सिंह कहते हैं, ‘‘किसान वही पेड़ लगाना चाहते हैं, जो उन्हें मुनाफा दे। वे जामुन, अमरूद, नीम का पेड़ भी नहीं लगाएंगे। उनको यह नहीं मालूम है कि प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए कौन से पेड़ लगाने जरूरी हैं। मुझे लगा कि किसानाें के अलावा मैं स्कूल के बच्चों को यह शिक्षा दे दूं कि कैसे पेड़ लगाने है? क्यों लगाने हैं और कैसे इनकी देखभाल करनी है? जब मैंने बच्चों को कहा कि आम के बागान खत्म हो रहे हैं, तो बच्चे आम के पेड़ लगाने के लिए फौरन तैयार हो गए। इस तरह 2016-17 में गुठली मिशन शुरू हुआ।

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क्या है पेड़ों का लंगर

पूरे भारत में अब ऐसी कोई जगह नहीं, जहां से जसमीत के पास गुठलियां नहीं आयीं। अब तक उन्हें 21 लाख आम की गुठलियां मिली हैं। वे ट्री लंगर के अंतर्गत पौधे वितरण करते हैं। ये पौधे फ्री में बांटे जाते हैं। अभी तक जसमीत 8 लाख पौध वितरण कर चुके हैं।

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अब जसमीत सिंह को सोशल मीडिया, स्कूल के बच्चों और मिलिट्री का साथ मिल गया। रेडियो व टीवी चैनल्स, सिख रेजिमेंट और राजपूताना राइफल ने उन्हें कॉल करके पर्यावरण पर चर्चा करने के लिए बुलाया।

जसमीत कहते हैं अब लगता है कि मुझे लाइक माइंडेड लोग मिलें, जो कहें कि हमारे पास ‘लैंड बैंक’ हैं और हम आपके साथ जुड़ना चाहते हैं। मैं वहां लोकल नर्सरी बनाऊंगा। लोकल किसान को लोकल वेराइटी के आम दूंगा, जिससे स्वच्छ हवा और शुद्ध वातावरण मिले।

नेचुरल एसी का पेड़ आम

दरअसल, आम एक ऐसा पेड़ है, जो नेचुरल एसी का काम करता है। अगर आप आम के पेड़ के नीचे खड़े होंगे तो और सामान्य जगह की तुलना में 3-4 डिग्री तापमान कम लगेगा। इसकी जड़, छाल, पत्ते, गुठली से ले कर आम तक अपने आपमें मल्टी विटामिन युक्त है, जो पेट के कई रोग पीरियड्स, चर्म रोग को भी ठीक करता है। सारा साल यह ग्रीन रहता है। इसमें कभी पतझड़ ही नहीं आता है। दरअसल, आम अपने आपमें बहुत बड़ा एक्सपोर्ट मटीरियल है। अचार, चॉकलेट, कैंडी जूस सब एक्सपोर्ट होता है। मैंगो प्रोडक्ट की काफी फैक्ट्रीज हैं। जसमीत कहते हैं, ‘‘पूरे भारत में मुझे करीब 100 नर्सरियां बनानी हैं, जहां मैं नेचुरल फार्मिंग के बारे में ट्रेनिंग दूं। इससे ज्यादा से ज्यादा आम के पेड़ लगें।’’

जसमीत सिंह चाहते हैं कि स्कूलों में बोर्ड परीक्षा में यह प्रावधान ला दिया जाए कि 3-5 नंबर बच्चों को पेड़ लगाने पर मिलेंगे। इससे
पूरे भारत का बच्चा पर्यावरण से जुड़ेगा। अधिक से अधिक पेड़ लगेंगे। पॉल्यूशन और गरमी भारत की समस्या है। इसका समाधान भी हमें ही करना है। पर्यावरण के प्रति सजगता तो आदत में होना चाहिए। खास तौर पर सावन में पेड़ लगाने चाहिए। वे कहते हैं कि किसी भी सफलता के पीछे आपके साथी का हाथ जरूर होता है। उनकी पत्नी अंजू अरोड़ा भी हमेशा उनका साथ देने को तत्पर रहती हैं।

पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए सबसे पहले मां-बाप को ही बच्चों को बताना होगा कि प्रॉपर्टी और मुचुअल फंड की तरह पृथ्वी भी आपको मिली है। रुपए-पैसों के अलावा इस धरती की रखवाली भी करनी होगी। यह सजगता बचपन से ही उनके व्यवहार में होनी चाहिए। अच्छी मिट्टी, स्वच्छ हवा की ओर झुकाव होगा, तभी पर्यावरण में सुधार आएगा।

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