कोविड के बाद बहुतों की जिंदगी बदली, विद्यावती की लाइफ में भी टर्निंग पॉइंट आया।दिव्यांग होने के बाद भी वे कैसे बनीं नेशनल लेवल की स्विमर, जानिए उन्हीं से उनकी बातें-
हम में से ज्यादातर स्विमिंग करने की इच्छा तो रखते हैं, पर स्विमिंग करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। हम आपकी मुलाकात करा रहे हैं बीकानेर की विद्यावती से, जो दिव्यांग होने के बाद भी ना सिर्फ स्विमिंग करने का हौसला रखती हैं, बल्कि स्टेट लेवल से नेशनल लेवल तक भी स्विमिंग कंपीटिशन में भी भाग लेती और मेडल जीतती हैं। उनके चेहरे पर जीवन से शिकायत नहीं है और ना ही खुद को ले कर कोई बेचारगी का भाव है।
पानी से कैसे हुआ प्यार
विद्यावती मूल रूप से बिहार के छोटे से गांव की रहने वाली हैं। उनके जीवन में गांव की छोटी-छोटी नहरों का बहुत योगदान है। इन्हीं नहरों ने उनकी आंखों को सपने और कल्पनाओं को उड़ान दी। व्हील चेअर में होने के बाद भी विद्यावती को नहर में छपाक से कूदने का मन करता था। वे चहकते हुए कहती हैं, ‘‘पानी मुझे रिलैक्स करता है। कभी बेचैन होती हूं, तो उदास होने की जगह मैं पानी में उतरना पसंद करती हूं। पानी मेरे जहन में ऐसा रच-बस गया है कि जब तक मैं पानी में अपने हाथों से तिलती की तरह पंख ना फैलाऊं, मुझे शांति नहीं मिलती। लोग जब बहुत दुखी होते हैं, तो जो उन्हें खुशी देता है, वह काम नहीं करते हैं। पर मैं ठीक विपरीत हूं। मैं जब कभी लो फील करती हूं, तो पानी में जाती हूं। सब उदासी दूर हो जाती है।’’
लाइफ का टर्निंग पॉइंट
विद्यावती के जीवन में टर्निंग पॉइंट कोविड के दिनों में आया। दरअसल, कोविड में लोगों के पास समय ही समय था। विद्या ने कई किताबें पढ़ीं। फिर लगा कि अपना मनपसंद काम करना चाहिए। उन्होंने अपने दिल को टटोला कि आखिर उनकी मनपसंद चीज क्या है। स्विमिंग में बटरफ्लाई स्ट्रोक उन्हें काफी आकर्षित करता है। वे पानी में बिना सांस के 30 सेकेंड तक रह सकती हैं। वैसे वे रोज 1-2 घंटे तक स्विमिंग करती हैं।वे लोगों को ज्यादा ऑब्जर्व करती हैं। उन्हें लोगों को देखना और सुनना पसंद है। वे क्या सोचते हैं, क्या करते हैं। इतना ही नहीं, वे लिखने-पढ़ने का भी शौक रखती हैं। स्विमिंग के शौक को उन्होंने अपने आपको डिस्ट्रेस करने का जरिया बनाया।
प्रेरणा कैसे मिली
एक साल की उम्र में जब विद्या पोलियो की शिकार हुईं, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वे एक दिन नेशनल चैंपियन बनेंगी। पर फौजी पिता की इस बिटिया ने हर मुश्किल को हराया और साबित किया कि डर के आगे जीत है। अंधेरी रात के बाद सुबह का सूरज जरूर निकलता है। माता-पिता के अलावा विद्यावती के 3 भाई-बहन भी हैं। उन्हें अपने परिवार में सभी का सपोर्ट मिला। वे बताती हैं कि उन्हें अपने बचपन से ही उत्साह और जोश का माहौल मिला। वे कहती हैं, ‘‘दिल में अगर मैंने कोई काम करने की ठान ली, तो वह जरूर हो कर ही रहेगा। स्विमिंग कोच विजय शर्मा जी ने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया और मुझे स्विमिंग में तरह-तरह के स्ट्रोक्स की ट्रेनिंग दी। लोग एक महीने में स्विमिंग सीखते हैं। मैंने 20 दिन में तैरना शुरू कर दिया था। मुझे पानी से डर नहीं लगता और ना ही विचार आते हैं कि मैं डूब जाऊंगी।’’
विद्यावती की मां, नानी और घर में सभी सदस्य तैरना जानते हैं। जिस तरह सबको लगता है उनकी मम्मी सबसे अलग हैं, वैसे ही विद्यावती को भी लगता है उनकी मम्मी सबसे अलग हैं। वे कभी विद्यावती को किसी काम के लिए नहीं रोकतीं और ना कभी कहती हैं, ‘आप ऐसा नहीं कर सकते।’ हां, उनको शुरू-शुरू में चिंता जरूर हुई कि विद्यावती का पैर नहीं चलता, ऐसे में उससे तैराकी कैसे होगी? पर विद्यावती एक-दो दिन स्विमिंग के लिए गयीं, फिर एक हफ्ते के बाद उन्होंने मां से कहा, ‘‘मैंने तैरना सीख लिया है।’’
कौन से जीते खिताब
पोलियो जैसी बीमारी के कारण विद्यावती अपने पैरों का इस्तेमाल नहीं कर पातीं। इसके बावजूद उन्होंने जयपुर में आयोजित 8वीं राजस्थान पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में बेहतरीन प्रदर्शन कर गोल्ड मेडल जीता। व्हील चेअर पर होने के बाद भी उन्होंने स्विमिंग पूल में अपनी कुशलता से सभी को चौंका दिया। उनके इस पैशन और मेहनत की वजह से उन्होंने 50 और 100 मीटर ब्रेस्ट स्ट्रोक में दो गोल्ड और 100 मीटर बैक स्ट्रोक में सिल्वर मेडल हासिल किया। गत नवंबर में हैदराबाद में आयोजित 25वीं नेशनल पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया। वर्तमान में विद्यावती राजस्थान राज्य विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड में जूनियर अकाउंटेंट के रूप में कार्यरत हैं।
स्विमिंग में जुड़ी इच्छाएं
1999 से विद्यावती बीकानेर में हैं। स्पोर्ट्स कोटा में उन्होंने नौकरी नहीं की। डबल एमकॉम और सीए फाइनल करने के बाद वे इस मुकाम तक पहुंचीं। 2022 में उन्होंने स्विमिंग करना सीखा। वे कहती हैं, ‘‘स्विमिंग सीखने के लिए मुझे जिमिंग से बॉडी स्ट्रॉन्ग करने की जरूरत थी। ज्यादातर ब्रेस्ट स्ट्रोक में मेरी बॉडी रिस्पॉन्ड करती है। बैक स्ट्रोक में लोअर बैक पर प्रेशर पड़ता है। इसके लिए बैक स्ट्रॉन्ग होनी चाहिए। मैं रेगुलर आधे घंटे जिमिंग करती हूं, जिससे बॉडी स्विमिंग में अच्छा रिस्पांड कर सके। फ्री स्टाइल मैं नहीं कर पाती। बटरफ्लाई स्ट्रोक करने का मेरा सपना है। इसमें पूरी बॉडी पर जोर पड़ता है। एक दिन कर पाऊंगी, ये मेरा इरादा पक्का है।’’
महिलाएं भी आगे आएं
काफी महिलाएं अपने आपको इग्नोर कर देती हैं। अगर वे खुश रहेंगी, तो परिवार खुश रहेगा। किसी भी परिवार की बेहतरी में उसकी महिला का महत्वपूर्ण योगदान है। पर सबको खुश रखने के चक्कर में वह खुद को इग्नोर कर देती है। और जैसे ही उसका खुद से लिंक टूट जाता है, परिवार में भी सब उसको इग्नोर करना शुरू कर देते हैं। समय निकल जाता है। महिला अपने बुढ़ापे में खुद से कहती है, ‘मैंने इतना कुछ किया, पर मुझे तो कुछ नहीं मिला।’ विद्यावती कहती हैं, ‘‘आप सबके लिए करो, लेकिन अपने लिए भी जियो। सबकी नैया पार लगाते लगाते खुद ही डूब जाने को मैं अच्छा नहीं मानती हूं।’’ सच मानें तो परिवार वालों को चाहिए कि अपने घर की बेटियों को आर्थिक और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाएं। महिलाओं को अपने विचारों में बदलाव लाने की जरूरत है।