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जमाना कितनी तेजी से बदल रहा है, इस बारे में आजकल के पेरेंट्स से पूछना चाहिए, जो अपने बच्चों की सोच, रिलेशनशिप स्टेटस को देख कर दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। पिछले दिनों कुछ ऐसी घटनाएं भी हुई हैं, जिनमें बच्चों की हरकतें इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि आजकल बच्चे कितनी छोटी उम्र से मैच्योर हो रहे हैं। पिछले दिनों दिल्ली की एक घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। एक 6 साल की बच्ची के साथ गैंग रेप जैसा वीभत्स काम किया गया। और इस अपराध में लिप्त थे 10-15 साल के कुछ पड़ोसी लड़के ! वहीं एक दूसरी घटना में कॉलेज में पढ़ने वाले लड़का और लड़की मेट्रो में इस कदर बहके कि चलती मेट्रो में ही मर्यादा की सारी सीमाएं पार कर गए। इन घटनाओं में जिन युवाओं की बात हो रही है, उनमें से कोई भी 20 साल की उम्र से ज्यादा का नहीं है। रंजना दिल्ली में रहती है। उसके बेटे की उम्र 18 वर्ष है, जो एक कॉलेज मेें पढ़ता है। वह बताता है कि कॉलेज के गर्ल्स वाॅशरूम में अकसर प्रेगनेंसी किट्स पायी जाती हैं, जिनमें से अधिकतर पॉजिटिव पायी जाती हैं। यही नहीं, स्कूल में भी बच्चे सेक्स करते हुए पकड़े जाते हैं। साफ है कि जिस तरह से अर्ली प्यूबर्टी अब कोई बीमारी नहीं बल्कि समाज का बदलता हुआ चेहरा है, उसी तरह बच्चों का कम उम्र में सेक्सुअली एक्टिव होना भी अब कोई टैबू नहीं, बल्कि उनमें आए हारमोनल बदलावों की डिमांड है। हां, इसमें रिस्क फैक्टर यह है कि बच्चे इस बदलाव से जुड़े हुए रिस्क नहीं समझ पाते। लड़कियां प्रेगनेंट होने पर सस्ते डॉक्टरों या ओवर द काउंटर दवाओं के फेर में पड़ती हैं और लड़के इमोशनली स्ट्रेस्ड होते हैं या फिर कई बार ब्लैकमेलिंग के शिकार भी हो जाते हैं।

इन सब केसेज को देखते हुए अब यह जरूरी हो गया है कि पेरेंट्स सेक्स के मुद्दे पर बच्चों से खुल कर बात करें, जिसमें वे उन्हें अब सेक्स करने की सही उम्र, अनसेफ सेक्स के खतरे और जोखिम भी समझाएं। इस बारे में मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट राधिका गाड का कहना है, ‘‘आज जब बच्चे अर्ली प्यूबर्टी से गुजर रहे हैं, तो ऐसे में यह और भी जरूरी हो जाता है। बच्चों से सेक्स से जुड़ी बातचीत 4-5 साल की उम्र से शुरू कर देनी चाहिए। बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से जानकारी देनी चाहिए। उन्हें उनके शरीर के बारे में बताएं, प्राइवेट पार्ट रूल के बारे में बताएं और यह भी अगर किसी का छूना या व्यवहार उन्हें पसंद ना आए तो वे इस बारे में पेरेंट्स से बात करें।’’

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बातचीत में क्या शामिल हो

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सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कई बार बच्चे बहुत से काम पीयर प्रेशर में करते हैं। जैसे कि सब दोस्तों के बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड हैं और सिर्फ एक ही का नहीं है, तो ऐसे में उस बच्चे को दोस्त रोस्ट करेंगे या उसे कई ऐसे नामों से बुलाएंगे, जिसमें वह बेइज्जती महसूस करेगा। ऐसी स्थिति में बच्चा प्रेशर फील करता है और फिर वह अपने लिए पार्टनर ढूंढ़ने लगता है। अब स्थिति यह है कि पेेरेंट्स बच्चों की इस फीलिंग को बेकार या बेमानी समझ कर खारिज नहीं कर सकते, क्योंकि इसका बुरा असर उसकी मानसिक स्थिति पर पड़ेगा और वह डिप्रेशन में भी जा सकता है। बच्चे में विदड्राअल सिम्प्टम्स भी आ सकते हैं। यह पेरेंट्स के लिए भी किसी शॉक से कम नहीं होता। अगर आप भी छोटे या बड़े किसी भी उम्र के बच्चों के माता-पिता हैं तो कुछ बातें आपको भी ध्यान में रखने की जरूरत है-

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- सबसे पहले तो आप यह ना सोचें कि हमारे घर का माहौल ऐसा नहीं है, इसलिए हमारे बच्चे ऐसा कोई काम कर ही नहीं सकते। या फिर हम तो बहुत धार्मिक और संस्कारी हैं, इसलिए बच्चे भी ऐसे ही बनेंगे। सेक्स कोई गलत या खराब चीज नहीं है और इसके प्रति आकर्षण सहज बात है, इसलिए धार्मिक माहौल होना, घर में खुलापन ना होना इस बात की गारंटी नहीं है कि बच्चों में इसके लिए आकर्षण नहीं होगा।

- 4 साल की उम्र से बच्चों को प्राइवेट पार्ट, गुड टच बैड टच की जानकारी दें और 8 साल की उम्र से यह बताना शुरू करें कि शरीर में बदलाव आना सामान्य है। प्यूबर्टी के बारे में बच्चों से बात करना शुरू करें।

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- 10-11 साल की उम्र से बच्चे अपोजिट सेक्स के प्रति आकर्षित होना शुरू हो जाते हैं। किसिंग, टचिंग के बारे में बच्चों से बात करना शुरू करें। यह ना तो बहुत ज्यादा दोस्ताना हो कि बच्चे को लगे कि शायद यह कोई मजे का काम है, जो उन्हें भी ट्राई करना चाहिए और ना ही ऐसे हो कि वे यह सोचने लगें कि पता नहीं मम्मी-पापा इतना गुस्सा क्यों कर रहे हैं, फिर वे इसे आपसे छुपा कर करने की कोशिश करेंगे। साइकोलॉजिस्ट राधिका गाड का कहना है कि ‘‘पेरेंट्स सेक्स से जुड़ी बातचीत को आम बातचीत को हिस्सा बनाएं। अगर वे इससे जुड़े कोई सवाल पूछते हैं या किसी दोस्त के बारे में बताते हैं, तो हाइपर हो कर रिएक्ट ना करें बल्कि ठंडे दिमाग से उनकी पूरी बात सुनें और तब समझाएं कि हर चीज की एक उम्र होती है और अनसेफ सेक्स से वे बीमार पड़ सकते हैं।’’

- खासकर लड़कों को लड़कियों के कंसेंट का आदर करना और लड़कियों को यह सिखाना जरूरी है अनसेफ सेक्स और प्रेगनेंसी उनकी हेल्थ के लिए बहुत बड़ा रिस्क है। टीनएज में बच्चों को पर्सनल हाइजीन और कॉन्ट्रासेप्शन के बारे में जानकारी देनी शुरू कर देनी चाहिए।

- पोर्न साइट्स, सेक्स चैट और अश्लील स्नैप भेजने के क्या नुकसान हैं, इस बारे में बच्चों को खुल कर बताना चाहिए। ये चीजें आजकल बच्चों में बहुत पॉपुलर हैं, लेकिन इनका गलत इस्तेमाल भी हो सकता है, यह बच्चे नहीं समझ सकते।

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