भारत में हर साल लगभग 25 मिलियन नए बच्चे जन्म लेते हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम बच्चों की ही जन्म के समय स्वास्थ्य जांच की जाती है। इसके वजह से गंभीर पर इलाज योग्य बीमारियों के बारे में पता ही नहीं चल पाता है। ज्यादातर मामलों में अगर बच्चे को कोई समस्या है, तो उसका पता महीनों बाद चलता है, जब बीमारी के लक्षण बढ़ चुके होते हैं और शरीर को नुकसान हो चुका होता है।
इस स्थिति से बचने के लिए नवजात बच्चों की स्क्रीनिंग कराना आवश्यक है। लेकिन हमारे देश में शिशु की हेल्थकेयर में इसे अक्सर नजरंदाज कर दिया जाता है। भारत में जन्म लेने वाले 5 प्रतिशत से भी कम बच्चों की जन्म के समय स्क्रीनिंग की जाती है। अगर समस्याओं का निदान पहले नहीं किया जाए, तो स्थिति गंभीर हो सकती है और बच्चे को दीर्घकालिक बीमारियां, विकलांगता या फिर मृत्यु होने तक का जोखिम हो सकता है।
निदान समय पर न हो, तो बीमारी बढ़ती चली जाती है, जिसके लिए सालों तक इलाज करने की जरूरत पड़ सकती है। इस स्थिति में परिवारों पर बहुत भारी भावनात्मक और वित्तीय बोझ पड़ सकता है। भारतीय आबादी में जन्मजात हाईपोथायरॉयडिज़्म, जी6पीडी डेफिशियंसी और हीमोग्लोबिन से जुड़ी समस्याएं बहुत आम हैं। जहां कई देशों में नवजात बच्चों की स्क्रीनिंग करवाना अनिवार्य होता है, वहीं भारत में इसके लिए एक राष्ट्रीय नीति का अभाव है। बच्चों की स्क्रीनिंग क्यों जरूरी है, इस बारे में जरूरी जानकारी दे रहे हैं मेडजीनोम लैब्स में लैब ऑपरेशंस में एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट एवं सीनियर डाइरेक्टर डॉ. वेंकटस्वामी ईश्वराचारी
नवजात बच्चों की स्क्रीनिंग कैसे की जाती है
स्क्रीनिंग आमतौर से जन्म के बाद 24 से 72 घंटों में की जाती है। शिशु की एड़ी से खून की कुछ बूंदें (कार्ड पर सूखे हुए खून का धब्बा) ली जाती हैं और उन्हें परीक्षण के लिए भेजा जाता है। कभी-कभी विशेष मेटाबोलिक गड़बड़ियों के लिए मूत्र जांच भी की जाती है। यह प्रक्रिया बहुत तेज और सुरक्षित होती।
भारत में आमतौर से कवर की जाने वाली बीमारियां
भारत में उपलब्ध एक्सपैंडेड न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग पैनलों द्वारा 65 से लेकर 100 से अधिक बीमारियों का परीक्षण किया जा सकता है। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण है जन्मजात हाईपोथायरॉयडिज़्म, जो बच्चों में बौद्धिक क्षमता के कम विकास का एक मुख्य कारण है, जिसे रोका जा सकता है। मेटाबोलिज़्म में जन्मजात गड़बड़ी भी जाँच में सामने आ जाती है। जी6पीडी डेफिशियंसी को भी स्क्रीनिंग में शामिल किया जाता है, जो कुछ विशेष क्षेत्रीय और आदिवासी समुदायों आम है। इस कमी के साथ जन्म लेने वाले बच्चे जन्म के समय तो बिल्कुल सामान्य दिखाई देते हैं, लेकिन कुछ दवाईयों, खाने-पीने की चीजों या संक्रमणों के संपर्क में आने पर उनकी हालत गंभीर हो सकती है।
नवजात बच्चे में ये सभी समस्याएं जन्म के पहले कुछ दिनों में सामने नहीं आती हैं और बच्चा बिल्कुल स्वस्थ दिखाई देता है। लेकिन कुछ हफ्तों के बाद ये अचानक से बच्चे को बीमार कर सकती हैं और समय पर इलाज न मिले तो गंभीर रूप ले सकती हैं।
सिकल सेल डिज़ीज़ और थैलेसेमिया जैसे हीमोग्लोबिन के विकार भी भारत के मध्य, पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में आमतौर से देखने में आते हैं। नवजात बच्चे की स्क्रीनिंग में इन विकारों के बारे में भी पता चल जाता है। अगर इन बीमारियों का समय पर पता चल जाए, तो इलाज सरल व प्रभावशाली होता है। खाने-पीने की सावधानियों, उचित दवाईयों और नियमित फॉलो-अप के साथ बच्चे को स्वस्थ रखा जा सकता है और आगे होने वाली परेशानियों को रोककर बच्चे को एक बेहतर जीवन प्रदान किया जा सकता है।
स्क्रीनिंग के परिणामों को समझना
नवजात बच्चे की स्क्रीनिंग संभावित समस्याओं का पता लगाने के लिए की जाती है। यह अंतिम निदान नहीं होती है। किसी भी असामान्य परिणाम के लिए आगे की जांच की जाती है। स्क्रीनिंग में कई बच्चों में समस्याओं का संदेह होने के बाद भी आगे चलकर वो स्वस्थ पाए जाते हैं। लेकिन सबसे जरूरी यह होता है कि जाँच के परिणामों पर बिना विलंब के तुरंत कार्रवाई की जाए।
माता-पिता के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
माता-पिता को प्रसव से पहले नवजात बच्चों की स्क्रीनिंग के बारे में बात करनी चाहिए। हॉस्पिटल में किन परीक्षणों की सुविधा उपलब्ध है, इस बारे में पूछना महत्वपूर्ण होता है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि परामर्शित फॉलो-अप परीक्षण समय पर पूरे किए जाएं। जन्म के बाद पहले कुछ दिनों में किए गए सामान्य परीक्षण बच्चों को पूरी जिंदगी चलने वाली समस्याओं से बचा सकते हैं। हमारे देश में समय पर निदान को अक्सर भुला दिया जाता है, इसलिए नवजात बच्चों की स्क्रीनिंग को वैकल्पिक एड-ऑन के रूप में नहीं, बल्कि एक आवश्यक निवारक उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए, जो सभी बच्चों के लिए उपलब्ध हो।