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भगवान सत्यनारायण की कथा समाप्त होने के बाद पंडित जी वहां उपस्थित लोगों की कलाई में लाल-पीले रंग का धागा कुछ मंत्रोच्चार के साथ बांधते हैं। शिव जी के मंदिर में महिलाएं शिवलिंग और पार्वती जी की प्रतिमा का गठबंधन कच्चे धागे से करती हैं। कई लोग अपने हाथ-पैरों में काला धागा बांधते हैं। आखिर क्या है इन धागों का रहस्य और क्या है इन्हें धारण करने के लाभ? कच्चे धागों के प्रति मजबूत अास्था के बारे में बता रहे हैं ज्योतिषाचार्य डॉ. प्रभाकर मिश्रा।

जानिए क्या है कलावे का धार्मिक महत्व

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दरअसल, शिव जी और मां पार्वती को एक धागे में बांधना प्रतीक है उनके गठबंधन का। सुहागिन महिलाएं इसे अपने सुहाग की रक्षा से जोड़ कर देखती हैं और इसीलिए पूजन से पहले वे उपवस्त्र के रूप में कच्चे धागे का प्रयाेग करती हैं। वहीं वट-सावित्री पूजन में महिलाएं बरगद के पेड़ के चारों ओर कच्चे धागे से बंधन बनाती हैं, यह भी सुहाग की रक्षा का प्रतीक है। इसके अलावा, कलाई में कलावा, मौली या रक्षासूत्र बांधने के पीछे की कथा के बारे में पं. प्रभाकर कहते हैं कि कलावा बांधते समय एक मंत्र का उच्चारण किया जाता है - येन बद्धो बलि राजा दानवेंद्रो महाबलः। तेन त्वामनुबद्धामि प्रति रक्षे मा चल मा चलः। यानी जैसे राजा बलि को बांधा गया है, उसी तरह मैं आपको यह रक्षासूत्र बांधती हूं, ताकि अचल समय तक आप सुरक्षित रहें। राजा बलि प्रह्लाद के पूर्वज थे। वे बहुत बड़े दानवीर थे और उनका साम्राज्य वहां तक था, जहां तक सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश पहुंचता है। यह रक्षाबंधन मां भगवती ने श्रावण मास की पूर्णिमा को किया था और तभी से रक्षाबंधन को पर्व के रूप में मनाया जाने लगा। वैसे आजकल सिल्क आदि के धागे बांधे जाने लगे हैं, लेकिन असली धागा कच्चा धागा ही है। मान्यता है कि कलावा को 2, 3 या 5 बार लपेटना चाहिए। पुरुष और कुंआरी कन्याओं को दायीं कलाई में और विवाहित महिलाओं को अपनी बायीं कलाई में कलावा बांधना चाहिए। पुराना कलावा खोलना हो, तो उसे इधर-उधर ना फेंकें। जल में प्रवाहित कर दें या पीपल के पेड़ के नीचे रख दें।

क्या है काले धागे का धार्मिक महत्व

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काला धागा बांधने के पीछे बायोलॉजिकल फैक्ट भी है। महिलाएं विवाह के बाद पैरों में पाजेब, पैरों की उंगलियों में बिछुए आदि पहनती हैं। इसके पीछे लॉजिक है कि इससे नर्व्स पर प्रेशर पड़ता है और वहां ब्लड सर्कुलेशन बढ़ जाता है। इससे वह अंग अधिक सक्रिय रहता है, सचेत रहता है, जिससे चोट आदि लगने की आशंका कम रहती है। काला धागा बांधने से भी वही लाभ मिलते हैं। दूसरा, काले रंग को शनिदेव का प्रतीक माना गया है और यही वजह है कि बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए काले रंग का टीका लगाया जाता है, उनके हाथ-पैरों में काला धागा बांधा जाता है। पं. प्रभाकर कहते हैं कि हालांकि शास्त्रों में काला धागा बांधने का कहीं उल्लेख नहीं है। कुछ गुरुओं ने सिद्धि पाने के बाद अपनी वाणी से कह दिया कि काला धागा बांध लो, बुरी नजर से बचे रहोगे। माना जाता है कि पैरों में काला धागा बांधने के बाद प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप जरूर करना चाहिए। इससे इसका प्रभाव बढ़ जाता है। आजकल यह परंपरा चल निकली है, जिसके पीछे यही मान्यता है कि काला धागा बांधने से चोट लगने की आशंका कम हो जाती है, बुरी नजर का असर नहीं होता। दरअसल, काला रंग आसपास की चीजों की नेगेटिविटी को दूर करता है। कहते हैं, जिस बच्चे का इम्यून सिस्टम कमजोर हो, उसके पैरों में काला धागा बांधना चाहिए। कमर में काला धागा अकसर बच्चों को बांधा जाता है। काले रंग का टोटका हर जगह चलता है।

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