कश्मीर की केसर, दार्जिलिंग की चाय, कन्नौज का अत्तर, बंगाल की जामदानी, सांगानेरी चादर, मैसूर संदल सोप, कर्नाटक का बीदड़ी आर्ट- इन सबमें एक चीज समान है, वह है इनसे जुड़ा हुआ जीआई टैग। बहुतों को शायद यह पता नहीं होगा कि जीआई टैग क्या होता है और किसी वस्तु पर जीआई टैग लगे होने का क्या मतलब होता है। जीआई टैग का पूरा नाम है जियोग्राफिकल इंडेक्स टैग। यह अपने देश की कला और संस्कृति को सहेजने और उसकी पहचान को सुरक्षित रखने का एक तरीका है। हर क्षेत्र की कुछ ना कुछ खासियत होती है। कहीं पर खास किस्म के मसाले उगते हैं, तो कहीं पर कुछ अदभुुत फल व सब्जियां। इसी तरह से कुछ खास तरह की कारीगरी भी किसी राज्य या शहर की पहचान होती है। इस धरोहर को सहेजने व उसे पहचान दिलाने के लिए सरकार की तरफ से उसे जीआई टैग दिया जाता है।
इस टैग की मदद से आपको यह पता चलता है कि अमुक चीज किस जगह से संबंध रखती है और उसमें क्या ऐसे गुण हैं, जो उसे खास बनाते हैं। एक तरह से यह किसी भी वस्तु को दिया गया भौगोलिक संपदा अधिकार है, जो उस वस्तु को उसके भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ कर पहचान देता है। यह जियोग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन) एक्ट, 1999 के अंतर्गत दिया जाता है।
यह टैग यह सुनिश्चित करता है कि वह वस्तु उस क्षेत्र में ही उत्पादित होती है या बनायी जाती है। जैसे दार्जिलिंग की चाय या बनारसी साडि़यां। दार्जिलिंग की चाय पूरे विश्व में मशहूर है, जो उसी क्षेत्र में उगती है। भारत के बाकी कई राज्यों में चाय का उत्पादन होता है, लेकिन अगर उस पर जीआई टैग नहीं है, तो इसका मतलब वह दार्जिलिंग से नहीं आयी है। इसी तरह से हम सभी जानते हैं वाराणसी में सदियों से खास किस्म की रेशम की साडि़यां बनाने का काम होता है। यह काम वहां के कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी कर रहे हैं। जीआई टैग हमें यही जानकारी देता है कि ये साडि़यां भारत के वाराणसी या बनारस क्षेत्र में बनायी जाती हैं, उन्हें बनाने की खास कला और तकनीक वहां के कारीगर ही बेहतर बता सकते हैं और अगर आपको असली बनारसी साड़ी चाहिए, तो आपको बनारस ही आना होगा।
क्या होता है लाभ
जिस वस्तु को जीआई टैग मिला होता है, उसकी नकल करने से रोका जा सकता है। इसका सीधा फायदा छोटे कारीगरों या उत्पादकों को मिलता है, क्योंकि इस टैग के जरिए उत्पादों को कानूनी संरक्षण मिलता है और उनकी नकल नहीं की जा सकती है। इसके अलावा जीआई टैग किसी वस्तु की गुणवत्ता का पैमाना भी होता है, जिसके जरिए उपभोक्ता तक भी असली उत्पाद ही पहुंचता है। इस टैग से लुप्त होती कला और कारीगरों को भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पहचान मिलती है और राजस्व व रोजगार में वृद्धि होती है। ऐसे उत्पादों के निर्यात को भी सरकार द्वारा बढ़ावा दिया जाता है।
कैसे मिलता है जीआई टैग
जीआई टैग के लिए लोकल उत्पादक जैसे किसान, कोई व्यापारिक संगठन, सरकारी इकाइयां या विभिन्न संगठनों की तरफ से उनके अधिकृत प्रतिनिधि अप्लाई कर सकते हैं। जिस वस्तु या उत्पाद के लिए जीआई टैग की मांग की जा रही है, सरकार की तरफ से उसकी पूरी तरह से जांच-पड़ताल की जाती है और फिर 10 साल के लिए यह टैग दिया जाता है। जिस क्षेत्र के लिए वह टैग दिया जाता है, केवल उसी क्षेत्र के लोग उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। जीआई टैग मिलने के बाद वह टैग और उससे जुड़ी जानकारी उस वस्तु की पैकिंग पर छाप दी जाती है, जिससे लोगों को उस वस्तु के बारे में जानकारी मिलती है, जैसे यह किस क्षेत्र में पायी जाती है और इसकी क्या खासियत है।
किन वस्तुओं को मिला है
भारत में अभी तक 600 से ज्यादा वस्तुओं को जीआई टैग मिल चुका है। क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में सबसे पहला जीआई टैग वर्ष 2004 में दार्जिलिंग की चाय को मिला था। इसके अलावा रतलामी सेव, बीकानेरी भुजिया, नागपुर के संतरे, बंगाली रसगुल्ले, तिरुपति के लड्डू, कोल्हापुरी चप्पल, गुजराती केसरी आम, बलुआ पत्थर, मकराना के संगमरमर, मेरठ की कैंची, मिर्जापुर के पीतल के बरतन, कोयंबतूर का वेट ग्राइंडर, नासिक वैली वाइन, भदोई के हाथ से बुने कालीन, मधुबनी पेंटिंग, आगरा की दरियों, आंध्र प्रदेश के चमड़े की कठपुतलियों को जीआई टैग मिल चुका है।