6 सितंबर, 2026, रविवार की दोपहर थी। दिल्ली के सत्य निकेतन की संकरी गलियों में हमेशा की तरह जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी। कहीं चाय की दुकान पर दोस्तों की हंसी थी, कहीं पीजी के कमरों में किताबें खुली थीं और कहीं किसी छात्र के फोन पर घर से आया संदेश चमक रहा था- खाना खा लिया?
फिर अचानक एक तेज आवाज हुई। कुछ ही सेकेंड में वह पांच मंजिला इमारत, जो दर्जनों युवाओं के लिए दिल्ली में उनका अस्थायी घर था, मलबे के ढेर में बदल गयी। यह वही इलाका है, जहां दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस में पढ़ने आए देश भर के छात्र किराये के कमरों और पीजी में रहते हैं। हादसे के बाद वहां चीख-पुकार, धूल, सायरन और अपने किसी करीबी को तलाशती आंखों का सैलाब उमड़ पड़ा। घायलों के आने की खबर सुन कर परिजन दौड़े चले आ रहे थे। यह लेख लिखे जाने तक 11 घरों के चिराग हमेशा के लिए बुझ चुके हैं और कई अभी भी कई जिंदगियां मलबे के ढेर के नीचे उम्मीद की किरण की प्रतीक्षा कर रही है।
लेकिन इस कहानी का सबसे भयावह हिस्सा वह नहीं था, जो बाहर दिखायी दे रहा था। असली त्रासदी उन आवाजों में छिपी थी, जो मलबे के नीचे से आ रही थीं। “बचाइए... मुझे निकालिए...” किसी मोबाइल फोन से आयी आवाज ने बाहर खड़े लोगों को जैसे पत्थर का बना दिया। कुछ देर पहले तक जिन लड़कों की दुनिया किताबों, क्लास, प्रतियोगी परीक्षाओं और कैरिअर के सपनों से भरी थी, उनमें से कुछ अब सांस लेने भर की जगह तलाश रहे थे। एक छात्र का मलबे के नीचे से वीडियो सामने आया, जिसमें उसके चेहरे पर धूल और खून के निशान थे। वह जिंदा था, लेकिन उसके चारों ओर सिर्फ कंक्रीट और अंधेरा था। बाहर खड़े उसके दोस्त बार-बार फोन मिला रहे थे। रिंग जाती थी, मगर कोई जवाब नहीं आता था। फिर अचानक किसी फोन पर घंटी सुनायी देती- उम्मीद की एक छोटी सी किरण। लोग सांस रोक कर उस दिशा में देखते। बचावकर्मी मलबा हटाते। हर ईंट, हर लोहे की सरिया और हर कंक्रीट के टुकड़े को सावधानी से हटाया जाता, क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ मलबा नहीं था- इसके नीचे किसी का बेटा, भाई, दोस्त या भविष्य दबा था।
अस्पताल में भी एक अलग कहानी चल रही थी। किसी के हाथ में बेटे की तसवीर थी, किसी के फोन में आखिरी बार हुई बातचीत। एक बहन अपने भाई को तलाशती अस्पताल पहुंची। उसे हर स्ट्रेचर पर वही चेहरा नजर आता, जिसे वह पहचानना चाहती थी। मगर जवाब किसी के पास नहीं था।
यह सिर्फ एक इमारत नहीं गिरी थी। किसी मां की वर्षों की बचत से तैयार किया गया सपना गिरा था। किसी पिता का भरोसा गिरा था, जिसने अपने बेटे को दिल्ली पढ़ने भेजते हुए कहा था- “मन लगा कर पढ़ना, बाकी हम देख लेंगे।” किसी बहन की राखी का इंतजार मलबे में दब गया था। किसी छात्र की वह नोटबुक दब गयी थी, जिसमें उसने आने वाले वर्षों की योजनाएं लिख रखी थीं।
दिल्ली में पढ़ने आने वाला हर छात्र अपने साथ सिर्फ कपड़े और किताबें नहीं लाता। वह अपने साथ छोटे शहरों और कस्बों की उम्मीदें भी ले कर आता है। कोई आईएएस बनने का सपना देखता है, कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई पत्रकार। कोई सिर्फ इतना चाहता है कि पढ़-लिख कर अपने माता-पिता की जिंदगी थोड़ी आसान कर सके।
इनमें से कितने सपने रविवार दोपहर अचानक हमेशा के लिए रुक गए, इसका पूरा हिसाब शायद कभी नहीं हो पाएगा। और यही इस हादसे का सबसे कड़वा सवाल है- क्या इन मौतों को सिर्फ एक ‘दुर्घटना’ कह कर आगे बढ़ जाना पर्याप्त है? और यह एक अकेला हादसा नहीं था, इससे पहले भी दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में बिल्डिंग गिरे थे और मौतें हुई थीं।
दिल्ली में पिछले कुछ सालों में हुए बड़े हादसे -
- मई, 2026 में सैदुलाजाब में साकेत मेट्रो स्टेशन के पास एक पांच मंजिला इमारत के गिर जाने से 6 लोगों की मौत
- जुलाई, 2026 में रोहिणी क्षेत्र में एक चार मंजिला निर्माणाधीन इमारत के ढहने से 3 मजदूरों की मौत
- जुलाई, 2025 में वेलकम इलाके में एक चार मंजिला जर्जर इमारत के गिरने से 6 लोगों की मौत और 8 घायल
- मई, 2025 में तेज आंधी और बारिश के कारण एक निर्माणाधीन इमारत के बेसमेंट की दीवार ढह गयी, जिससे 4 लोगों की जान गयी
- अप्रैल, 2025 में मुस्तफाबाद में एक चार मंजिला इमारत के गिरने से 11 लोगों की मौत
- जुलाई, 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर स्थित एक आईएएस कोचिंग सेंटर की बेसमेंट वाली लाइब्रेरी में पानी भरने से 3 छात्रों की डूबने से मौत
रिपोर्टों के अनुसार, हादसे के समय इमारत के बेसमेंट में निर्माण/मरम्मत का काम चल रहा था। इमारत करीब 5 दशक पुरानी बतायी जा रही है। हादसे के बाद भवन की सुरक्षा, निर्माण नियमों और निगरानी को ले कर गंभीर सवाल उठे हैं। दिल्ली सरकार ने मामले में मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए हैं और पुलिस ने भवन मालिक के खिलाफ मामला दर्ज किया है। लेकिन जांच की फाइलें बाद में खुलेंगी। सवाल-जवाब भी बाद में होंगे। इस वक्त मलबे के पास खड़े लोगों के लिए सिर्फ एक सवाल है- क्या कोई और जिंदा है? हर बार जब बचाव दल मलबे का कोई हिस्सा हटाता है, आसपास खड़ी भीड़ की सांसें थम जाती हैं। किसी हाथ के दिखायी देने का इंतजार होता है। किसी आवाज के सुनायी देने की उम्मीद होती है। और जब कोई जीवित बाहर आता है, तो कुछ क्षणों के लिए पूरा इलाका जैसे सांस लेने लगता है।
इस हादसे में स्थानीय लोग, छात्र और बचावकर्मी भी मदद के लिए जुटे। किसी ने पानी पहुंचाया, किसी ने रास्ता खाली कराया, किसी ने घायल को अस्पताल पहुंचाने में मदद की। जिन छात्रों ने कुछ घंटे पहले अपने दोस्तों के साथ समय बिताया था, वही अब दूसरे छात्रों को बचाने के लिए मलबे के पास खड़े थे।
लेकिन राहत और बचाव की इस तस्वीर के पीछे एक बड़ा सवाल भी खड़ा है। क्या दिल्ली आने वाले छात्रों को सिर्फ इसलिए असुरक्षित इमारतों में रहना होगा, क्योंकि उन्हें अपने बजट में रहने की जगह चाहिए? क्या माता-पिता यह मान कर अपने बच्चों को महानगर भेजते रहें कि जिस छत के नीचे वे रह रहे हैं, वह सुरक्षित होगी? और क्या किसी इमारत की उम्र, दरारें या कमजोर ढांचा तब तक नजरअंदाज होता रहेगा, जब तक वह किसी रविवार की दोपहर भरभरा कर गिर ना जाए?
सत्य निकेतन की उस गली में अब शायद कुछ समय तक सामान्य चहल-पहल नहीं लौटेगी। चाय की दुकानों पर बातचीत होगी, लेकिन आवाजों में वह बेफिक्री नहीं होगी। पीजी के कमरों में लौटने वाले छात्र शायद पहली बार छत को ऊपर देख कर सोचेंगे- क्या यह सचमुच सुरक्षित है?
मलबा हट जाएगा। सड़क साफ हो जाएगी। कैमरे चले जाएंगे। खबरें भी धीरे-धीरे दूसरी खबरों के बीच दब जाएंगी। लेकिन जिन परिवारों के घरों में रविवार की शाम फोन की घंटी नहीं बजी, वहां यह हादसा कभी खत्म नहीं होगा। उनके लिए दिल्ली की वह दोपहर हमेशा उसी क्षण पर ठहर जाएगी, जब एक इमारत गिरी थी और उसके साथ कई परिवारों के भविष्य का एक हिस्सा भी मलबे में दब गया था।
यह सिर्फ भवन का ढहना नहीं था। यह उन सपनों का ढहना था, जिन्हें माता-पिता ने अपने बच्चों की आंखों में देख कर दिल्ली भेजा था। अब जरूरत सिर्फ मलबे के नीचे जिंदगी तलाशने की नहीं है। संबंधित सरकारी विभागों और अफसरों की जिम्मेदारी तय करनी होगी, ताकि भविष्य में ऐसे हादसों पर लगाम समय रहते लगायी जा सके।