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पीरियड्स में गड़बड़ी, चेहरे पर अनचाहे बाल, गंभीर मुंहासे या तेजी से बढ़ता वजन—किशोरियों में ये संकेत केवल सामान्य हार्मोनल बदलाव मानकर नजरअंदाज नहीं किए जाने चाहिए। एम्स की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक हर 100 में 8 किशोरियों और हर 100 में से 15 महिलाओं में पीसीओएस की परेशानी देखी जा रही है।

किशोरियों और युवतियों में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी पीसीओएस की चर्चा अक्सर पीरियड्स में गड़बड़ी और ओवरी में सिस्ट तक सीमित रह जाती है। लेकिन अब इसे केवल ओवरी की समस्या नहीं माना जा रहा। हार्मोनल बदलाव के साथ वजन, इंसुलिन रेजिस्टेंस, खानपान, शारीरिक गतिविधि, तनाव और मानसिक स्वास्थ्य भी इस स्थिति से जुड़े महत्वपूर्ण पहलू हैं।

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इसी समझ के कारण पीसीओएस के लिए पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम जैसे नाम का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। हालांकि, मरीज के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल नाम नहीं, बल्कि यह है कि लक्षणों को कैसे पहचाना जाए और इलाज कैसे किया जाए।

शुरुआती सालों में अनियमित पीरियड्स सामान्य

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एम्स की डॉ. रजनी शर्मा के मुताबिक किशोरियों में पीरियड शुरू होने के शुरुआती एक साल में अनियमितता सामान्य हो सकती है। लेकिन इसके बाद भी अगर पीरियड्स के बीच बहुत ज्यादा अंतर बना रहता है, तो इसकी जांच करानी चाहिए।

पीरियड शुरू होने के एक से तीन साल के बीच बार-बार 45 दिन से ज्यादा का अंतर, या बाद के वर्षों में 35 दिन से ज्यादा का अंतर चिंता का संकेत हो सकता है। तीन महीने से ज्यादा समय तक पीरियड न आना भी जांच की वजह है।

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दूसरा महत्वपूर्ण संकेत है एंड्रोजन यानी पुरुष हार्मोन के प्रभाव के लक्षण। चेहरे या शरीर पर जरूरत से ज्यादा बाल आना, गंभीर मुंहासे और कुछ मामलों में सिर के बालों का कम होना इसके संकेत हो सकते हैं।

हालांकि हर अनियमित पीरियड या हर मुंहासे का मतलब पीसीओएस नहीं है।

अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट से ना खाएं धोखा

किशोरियों में केवल अल्ट्रासाउंड में पॉलीसिस्टिक जैसी ओवरी दिखाई देने से पीसीओएस का इलाज नहीं किया जाना चाहिए। किशोरावस्था में ऐसी ओवरी सामान्य रूप से भी दिखाई दे सकती है।

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इसलिए पीरियड्स का पैटर्न, एंड्रोजन से जुड़े लक्षण और जरूरत पड़ने पर हार्मोन संबंधी जांच को मिलाकर डॉक्टर स्थिति का आकलन करते हैं। मौजूदा किशोर पीसीओएस सिफारिशों में भी अल्ट्रासाउंड को अकेले निदान का आधार नहीं माना गया है।

ये लक्षण हैं चेतावनी

पीरियड्स लगातार बहुत अनियमित रहना

दो पीरियड्स के बीच बहुत लंबा अंतर

तीन महीने या उससे ज्यादा समय तक पीरियड न आना

चेहरे या शरीर पर अत्यधिक बाल आना

लगातार बने रहने वाले मुंहासे

तेजी से बढ़ता वजन या शरीर में मेटाबॉलिक बदलाव

सुरक्षित दवाओं से इलाज संभव

पीसीओएस का मतलब यह नहीं कि हर लड़की को तुरंत हार्मोनल दवा शुरू करनी पड़ेगी। खासकर किशोरियों में, अगर स्पष्ट डायग्नोसिस नहीं है तो लाइफस्टाइल मैनेजमेंट पर फोकस महत्वपूर्ण है।

किशोरियों में पीसीओएस के इलाज का मतलब सिर्फ हार्मोनल दवाएं देना नहीं है। एम्स के डॉक्टरों के अनुसार, नॉन-हार्मोनल मैनेजमेंट को प्राथमिक उपचार के तौर पर अपनाया जाता है, क्योंकि इससे अनचाहे साइड इफेक्ट कम होने की संभावना रहती है। इसमें मरीज के लक्षण और जरूरत के हिसाब से मेटफॉर्मिन और एंटी-एंड्रोजन दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। मेटफॉर्मिन का उद्देश्य इंसुलिन रेजिस्टेंस और मेटाबॉलिक पैरामीटर्स में सुधार करना है, जबकि एंटी-एंड्रोजन का इस्तेमाल एंड्रोजन के अधिक प्रभाव, जैसे अनचाहे बाल और मुंहासों से जुड़े लक्षणों को कम करने के लिए किया जा सकता है। चेहरे या शरीर पर अत्यधिक बालों की समस्या में मैकेनिकल, लेजर और लाइट थेरेपी जैसे विकल्प भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

पीसीओएस की शिकार महिलाएं डाइट नोट करें

खानपान में अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और जंक फूड को कम करने पर जोर दिया है। फल, सब्जियां, सलाद और मौसम के रंग-बिरंगे फल-सब्जियों को भोजन में शामिल करने की सलाह दी गई है। यह जरूरी नहीं कि पीसीओएसंं के लिए कोई एक 'स्पेशल डाइट' ही अपनाई जाए। अंतर्राष्ट्रीय गाइडलाइन के अनुसार भी किसी एक खास डाइट को बाकी सभी डाइट से बेहतर साबित करने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं; टिकाऊ और व्यक्ति के अनुरूप स्वस्थ खानपान अधिक महत्वपूर्ण है।

फोन से दूरी बनाएं

लंबे समय तक बैठना और स्क्रीन पर समय बिताना कम करना भी इलाज का हिस्सा है। किशोरियों के लिए रोज पर्याप्त शारीरिक गतिविधि जरूरी है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय सिफारिशें किशोरों के लिए रोजाना कम से कम 60 मिनट की मध्यम से तेज शारीरिक गतिविधि का लक्ष्य बताती हैं। सिर्फ आराम से टहलना ही पर्याप्त मान लेना सही नहीं है।

योग भगाए ये बीमारी

एम्स के एनॉटमी विभाग की प्रोफेसर डॉ रीमा दादा ने सूर्य नमस्कार, बटरफ्लाई, विपरीत करनी जैसे आसनों और प्राणायाम को नियमित अभ्यास में शामिल करने की सलाह दी है। उनके मुताबिक नियमित योग के साथ कुछ अध्ययनों में हार्मोनल और मेटाबॉलिक संकेतकों में सुधार देखा गया है।

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