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मैमोग्राम की तस्वीर में छिपी छोटी-सी असामान्यता को पहचानने में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी डॉक्टर की मदद करेगा। नयी दिल्ली के एम्स ने एआई आधारित मैमोग्राम पढ़ने के इंटरप्रिटेशन मॉडल की टेक्नोलॉजी बीपीएल टेक्नोलॉजीस लिमिटेड को ट्रांसफर की है। इसका मकसद ऐसी तकनीक को आगे विकसित करना है, जो मैमोग्राफी रिपोर्ट की तस्वीरों को पढ़ने में रेडियोलॉजिस्ट्स की मदद कर सके—खासकर उन जगहों पर जहां स्तन की इमेजिंग समझ सकने वाले विशेषज्ञों की कमी है।

इस एआई मॉडल को एम्स के रेडियोलॉजी और मशीन लर्निंग विशेषज्ञों की टीम ने विकसित किया है। एम्स के अनुसार, यह शुरुआत रिसर्च को इस्तेमाल किए जाने लायक बनाने की दिशा में ले जाने की कोशिश है।

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मैमोग्राम क्या बताता है

मैमोग्राम स्तन का एक खास प्रकार का एक्सरे है। इसमें स्तन के टिश्यू की तस्वीर लेकर रेडियोलॉजिस्ट यह देखते हैं कि कहीं कोई ऐसा बदलाव तो नहीं है जो स्तन कैंसर का संकेत हो।

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मैमोग्राम में कई चीजें दिखाई दे सकती हैं—जैसे कोई गांठ, टिश्यू की संरचना में बदलाव, या कैल्शियम के छोटे-छोटे डिपॉजिट जिन्हें कैल्सीफिकेशन कहा जाता है। हालांकि हर सफेद धब्बा कैंसर नहीं होता। उदाहरण के लिए, बड़े कैल्शियम डिपॉजिट्स आमतौर पर कैंसर वाले नहीं होते। वहीं बहुत छोटे कैल्शियम डिपॉजिट्स खासकर जब वे किसी खास पैटर्न में क्लसटर्ड हों, तो उन्हें ज्यादा ध्यान से देखने की जरूरत पड़ सकती है।

मैमोग्राम की रिपोर्ट को समझें

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मैमोग्राम की रिपोर्ट में अक्सर BI-RADS लिखा होता है। यह एक रिपोर्टिंग सिस्टम है, जिससे रेडियोलॉजिस्ट यह बताते हैं कि तस्वीर में क्या दिखाई दिया और आगे क्या करना चाहिए।

BI-RADS का स्कोर 0 से 6 तक आ सकता है। शून्य आने का मतलब होता है कि तस्वीर पूरी तरह निर्णायक नहीं है। इसके बाद अल्ट्रासाउंड जैसे टेस्ट की जरूरत पड़ सकती है। जबकि 6 स्कोर का मतलब है कि कैंसर पहले ही बायोप्सी से साबित हो चुका है। इसका इस्तेमाल पहले से तय कैंसर की इमेजिंग के लिए करते हैं।

मैमोग्राम रिपोर्ट में एक और शब्द अक्सर महिलाओं को परेशान करता है, वह है डेंस ब्रेस्ट्स यानी घनत्व ज्यादा होना। स्तन में फैट के साथ फाइबर वाला टिश्यू और ग्लैंड्स भी होते है। अगर फाइबर वाला टिश्यू और ग्लैंड्स ज्यादा है तो स्तन गहन यानी डेंस कहे जाते हैं। ऐसे में एक दिक्कत आती है – ऐसी इमेज में छोटी गड़बड़ी को पहचानना अपेक्षाकृत मुश्किल हो सकता है। गहरे यानी कम फैट वाले स्तन में कैंसर का खतरा ज्यादा होता है। इसी वजह से कुछ महिलाओं में डॉक्टर मैमोग्राम के साथ अल्ट्रासाउंड या एमआरआई जैसे टेस्ट पर भी विचार कर सकते हैं।

किस उम्र में मैमोग्राम करवाना चाहिए

अमेरिकन कैंसर सोसाइटी सामान्य रिस्क वाली महिलाओं के लिए 40 से 44 वर्ष की उम्र में एक बार मैमोग्राम करने को कहती है। 45 से 54 वर्ष में हर साल मैमोग्राम की सलाह देती है और 55 वर्ष के बाद हर साल या दो साल में एक बार स्क्रीनिंग का विकल्प देती है।

भारत में स्थिति थोड़ी अलग है। 2026 की मेनोपॉज़ सोसायटी गाइडलाइंस के मुताबिक 40 साल की उम्र के बाद एक बार मैमोग्राम और उसके बाद अपने डॉक्टर से चर्चा करने को कहा गया है। अगर मां या बहन में से किसी को पहले कैंसर हुआ हो तो टेस्ट इससे काफी पहले शुरू हो सकते हैं।

अब एआई क्या करेगा

यहीं एम्स की नयी पहल महत्वपूर्ण हो जाती है। एक रेडियोलॉजिस्ट हजारों इमेज देखते हैं। तस्वीरों में बहुत छोटे बदलाव, या पैटर्न पहचानना कभी-कभी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। एआई सिस्टम ऐसी तस्वीरों में ये काम थोड़ा आसान हो जाता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अब डॉक्टर का काम खत्म हो गया। सबसे महत्वपूर्ण बात—एआई भी अचूक नहीं है। वह कुछ कैंसर को नहीं पकड़ सकता और कभी-कभी ऐसी जगह को कैंसर समझ सकता है जहां कैंसर नहीं होता। लेकिन यह रिपोर्ट को समझने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। रेडियोलॉजिस्ट थक सकता है – याद रखने की क्षमता होती है। एआई का फायदा यह हो सकता है कि वह हर इमेज को एक ही तरह से आंकलन करे खतरे पर अलर्ट करे।

मैमोग्राम स्तन कैंसर को समय पर पकड़ने का आसान टेस्ट है - लेकिन यह कोई ऐसी मशीन नहीं है जो अकेले यह बता दे कि कैंसर है या नहीं। रिपोर्ट के साथ महिला के लक्षण, पुराने मैमोग्राम, अल्ट्रासाउंड और बायोप्सी के साथ समझने का सबसे बेहतर काम डॉक्टर ही कर सकता है।

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