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जिस तरह शरीर को रोज व्यायाम की जरूरत होती है, उसी तरह मस्तिष्क को भी नियमित ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है। हर इंसान चाहता है कि स्ट्रेस का सामना बिना एंग्जाइटी कर सके, निजी व प्रोफेशनल जिंदगी की समस्याओं को बेहतर ढंग से सुलझा सके। ह्यूमन बिहेवियर और इमोशनल इंटेलिजेंस विशेषज्ञ जो पेन कहते हैं कि अप्रत्याशित के प्रति हमारे दृष्टिकोण या रिश्ते की क्वॉलिटी से ही इमोशनल फिटनेस को मापा जाता है। यह निजी व प्रोफेशनल जिंदगी की बेहतरी के लिए अनिवार्य स्किल है। इमोशनल फिटनेस यह नहीं है कि हम हर वक्त खुश, शांत, पॉजिटिव बने रहें या अपने दुख-दर्द को भूल जाएं। भावनाओं के वश में आने के बजाय अपनी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से निपटने की कूवत पैदा करना ही इमोशनल फिटनेस है। इसे पाने की राह क्या हो, बता रही हैं डॉ. ज्योति मिश्रा, सीनियर कंसल्टेंट साइकोलॉजी, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, दिल्ली-

माइंड मैनेजमेंट : विफलताओं को जीवन के जरूरी सबक की तरह देखना जरूरी है। खुद पर या दूसरों पर दोष मढ़ने के बजाय इस पहलू पर सोचा जाए कि कहां सुधार की जरूरत है। दिमाग को लगातार प्रशिक्षित किया जाए कि वह नयी ऊर्जा के साथ आगे काम के लिए तैयार हो सके। एक विफलता पर ठहर कर ना रह जाए।

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इमोशंस की लेबलिंग : अपनी भावनाओं को नाम देना जरूरी है। दुख, सुख, क्रोध, कुंठा, हताशा-निराशा, बेचैनी, तनाव या दबाव जैसी तमाम भावनाएं अलग होती हैं। हर भावना से निपटने का अलग तरीका होता है। फ्रस्ट्रेट हैं तो मौजूदा स्थिति से ब्रेक ले कर या ध्यान हटा कर मन को शांति मिल सकती है। निराश हैं तो किसी करीबी से बात करके मोटिवेशन मिल सकता है। भावनाओं की लेबलिंग करने से उनकी अभिव्यक्ति भी आसान हो जाती है।

जर्नलिंग : मन में आ रही भावनाओं की जर्नलिंग करें। सिर्फ 5-10 मिनट का नियमित अभ्यास भी इमोशनल डिक्लटरिंग में मददगार साबित हो सकता है। कई बार सिर्फ लिखने से उलझनें स्पष्ट होने लगती हैं और समाधान नजर आने लगते हैं।

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इमोशनल सेंटर को फीड करें : योग, ध्यान और नियमित वर्कआउट से सोच में स्थिरता आती है। इससे ब्रेन का इमोशनल सेंटर शांत होता है। मेडिटेशन दिमाग को शांत करता है, तनाव कम करता है और एकाग्रता बढ़ाता है।

बचाव के तरीके : योग-ध्यान के अलावा कई अन्य तरीके भी हैं, जिनसे लाभ मिलता है। मसलन खुली हवा में कुछ देर वक्त बिताना, स्लो ब्रीदिंग एक्सरसाइज, कुछ देर बच्चों के साथ खेलना- ये छोटे-छोटे कदम हैं, जिनसे नर्वस सिस्टम शांत होता है और अगला कदम अपेक्षाकृत कम आक्रामक होता है।

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सीमाएं : सीमाएं तय नहीं होंगी तो बर्नआउट जल्दी परेशान करेगा। सीमाएं ऊर्जा व समय को बचा कर इमोशनल स्पेस प्रदान करती हैं। कब किसे हां कहना है, कब कहां विराम लेना है और कब विनम्रतापूर्वक ना कहना है, इमोशनल फिटनेस यही सिखाने का काम करती है।

सेल्फ केअर : नियमित व्यायाम, सही समय पर खाना, सोना-जागना, पर्याप्त पानी पीना, गट हेल्थ को दुरुस्त रखना भी इमोशनल फिटनेस में आता है। थोड़े से अनुशासन से फिजिकल-मेंटल व इमोशनल हेल्थ भी अच्छी रहती है।

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