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अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (2017) के अनुसार, क्लाइमेट एंग्जाइटी एक क्रोनिक भय व तनाव है, जो पर्यावरण में हो रही हलचलों, बाढ़, सुनामी, जंगलों की आग, तूफान, सूखे की स्थिति और अनिश्चितता के कारण पैदा होता है। इससे उदासी, अपराध-बोध, क्रोध, अवसाद जैसे मनोभाव पनपते हैं। इसके अलावा थकान, कंपकंपी या पसीना छूटने, सांस लेने में कठिनाई जैसे लक्षण भी उभरते हैं। लोगों के व्यवहार पर भी असर पड़ता है। कुछ लोग नशे की गिरफ्त में जाते हैं तो कुछ भविष्य के प्रति उदासीन हो जाते हैं। युवाओं व महिलाओं को यह एंग्जाइटी ज्यादा घेरती है।

युवाओं पर बोझ अधिक क्यों

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रोटरी एक्शन ग्रुप में मेंटल हेल्थ इनिशिएटिव्स की कंसल्टिंग साइकोलॉजिस्ट और चेअरपर्सन रीता अग्रवाल कहती हैं, ‘‘आज का युवा इको एंग्जाइटी से ग्रस्त है। मेरी परिचित यंग प्रोफेशनल महक दिन की शुरुआत फोन स्क्रॉलिंग से करती है। अचानक उसकी स्क्रीन पर सुनामी की न्यूज आती है तो वह बेचैन होने लगती है। उसके चेहरे के भाव बदलने लगते हैं और कई सवाल मन में आते हैं। क्लाइमेट एंग्जाइटी रोजमर्रा के जीवन पर असर डालती है तो भविष्य के प्रति चिंताग्रस्त भी करती है। मसलन, यात्रा का प्लान विपरीत स्थितियों की वजह से रद्द कर देना पड़े। दूसरी ओर भविष्य में संतानोत्पत्ति जैसे निर्णय लेने में युवा इस कारण डरने लगें कि भावी संतान को साफ हवा, पानी और अच्छा मौसम मिलेगा या नहीं! युवाओं के सामने अपने कैरिअर, रिलेशनशिप और लाइफस्टाइल की चुनौतियां हैं। क्लाइमेट चेंज से पैदा हुई अनिश्चितता के कारण वे निर्णय लेने में हिचकिचा रहे हैं। हालांकि पर्यावरण को ले कर जागरूकता, खबरों और आपसी बातचीत में बार-बार मौसम परिवर्तन का जिक्र होने से भी वे चिंतित होने लगते हैं।’’

एक्स्ट्रीम वेदर का नुकसान कई रूपों में दिखता है। प्रदूषण या अति गरमी या सरदी के कारण देश के लगभग आधे स्कूलों को कई-कई बार छुट्टियों की घोषणा करनी पड़ी, जिससे शिक्षा पर प्रभाव पड़ा। आउटडोर एक्टिविटीज में 32 फीसदी तक की कटौती हुई। युवाओं का सामाजिक जीवन सिकुड़ गया। जेन-जी अकसर कंक्रीट के जंगलों, गंदे पानी, खराब हवा, ऑक्सीजन मास्क और मौसम की चुनौतियों के बारे में बात करते दिखते हैं, जिससे उनकी एंग्जाइटी बढ़ती है। कई बार वे पुरानी पीढ़ियों और सरकारों को भी इसके लिए दोषी मानते हैं।

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तसवीर का दूसरा रुख

वर्ष 2023 के एक अध्ययन में कहा गया कि क्लाइमेट एंग्जाइटी लोगों के बीच जागरूकता भी बढ़ाती है। यूनिसेफ के अनुसार, विश्व भर में 99 फीसदी बच्चों ने कम से कम एक बार जलवायु परिवर्तन को करीब से देखा है। लू, चक्रवात, बाढ़, सुनामी या वायरस अटैक उनके लिए नयी बात नहीं है। लेकिन इस चिंता का सकारात्मक पहलू यह है कि युवा आसपास के परिवेश पर ध्यान दे रहे हैं, प्रकृति की परवाह करना सीख रहे हैं। यूएस में एक 10 साल की बच्ची ने पर्यावरण को ले कर फ्यूचर फाइटर्स ग्रुप बनाया। यह प्रेरणा उसे महज 7 साल की उम्र में तब मिली, जब वह एक समर कैंप में गयी। वहां उसे प्लास्टिक में रैप खाना मिला। उसे घर में बताया गया था कि यह पर्यावरण के लिए खतरनाक है। उसने खाना नहीं खाया और अपने कैंप संचालक को एक पत्र लिखा, जिसमें अपने दोस्तों के भी हस्ताक्षर करवाए, जिसमें संचालक से पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग का प्रयोग करने का आग्रह किया गया। कैंप संचालक ने इसे माना। यहां से इस फ्यूचर फाइटर्स संस्था की शुरुआत हुई। आज यह ग्रुप पर्यावरण व जलवायु संबंधी तमाम गतिविधियों में शामिल होता है। अभिभावकों का दायित्व है कि बच्चों को शुरू से ऐसी मुहिमों का हिस्सा बनने को प्रेरित करें। इससे उनमें सामाजिक दायित्व का भाव पैदा होगा, भविष्य की चिंताएं भी कम होंगी।

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यूनेस्को ने 2021 में एक स्टडी की, जिसमें 100 देशों के स्कूली पाठ्यक्रम का मूल्यांकन किया गया। लगभग आधे स्कूलों ने जलवायु परिवर्तन को अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया है। हालांकि अब सभी स्कूलों को ऐसा करने की आवश्यकता है। बच्चों को ज्यादा से ज्यादा प्रकृति के करीब रखने की कोशिश की जानी चाहिए। शोध बताते हैं कि प्रकृति का सान्निध्य मानसिक स्वास्थ्य को सुधारता और तनाव को दूर करता है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं। मेंटल हेल्थ फाउंडेशन के एक सर्वे में 44 प्रतिशत लोगों ने कहा कि प्रकृति की निकटता उनकी चिंता व घबराहट को दूर करती है। सर्वे बताते हैं कि जो बच्चे प्रकृति के बीच एक घंटा रोज बिताते हैं, उनमें मानसिक समस्याओं का खतरा 50 फीसदी तक कम होता है।

कैसा हो एक्शन प्लान

रीता अग्रवाल कहती हैं, ‘‘पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी महसूस करना, कम्युनिटी इनिशिएटिव्स में भागीदारी, अपनी भावनाओं व उनके पीछे छिपे कारणों की पहचान करना, साथ ही बचाव की रणनीति बनाना जरूरी है। मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से बात करना, नेचर के बीच समय बिताना और प्रकृति को संरक्षित करने की दिशा में छोटे-छोटे कदम बढ़ाना भी इसमें कारगर हो सकता है। सोशल मीडिया के जमाने में हम पूरी तरह उससे अलग नहीं रह सकते, लेकिन कोशिश करें कि सूचनाओं की ओवरडोज ना लें, पर्यावरण के लिए विभिन्न देशों में लोग क्या कर रहे हैं, इसके बारे में जानने की कोशिश करें। अपने स्तर पर इसके लिए क्या कर सकते हैं, इसकी रणनीति बनाएं और काम शुरू करें। अपनी पीड़ा और बेचैनी को एक्शंस में तब्दील करें, ताकि हमारा भविष्य सुरक्षित हो सके।’’

क्या करें जब बेचैनी बढ़े

- पर्यावरण संबंधी जानकारी जरूरी है, लेकिन सीमाएं निर्धारित करना भी आवश्यक है। लगातार नकारात्मक खबरें पढ़ने से दिक्कतें बढ़ सकती हैं।

Hands of protester with text SAVE THE PLANET on black board on background of sunflower field. Reuse reduce recycle concept. Protesting for nature Climate strike volunteer protest against earth
बदलते मौसम का प्रभाव कई रूपों में दिखता है

- पर्यावरण के लिए पहल करें। चाहे वह प्लास्टिक का उपयोग कम करना हो, कचरे का निस्तारण करना हो, घर में ग्रीनरी एड करनी हो, कम्युनिटी स्तर पर गतिविधियों में शामिल होना हो, घरेलू जीवन में कपड़ों व अन्य सामानों की खरीदारी सीमित करनी हो...। ऐसे छोटे-छोटे कदम भी बेचैनी कम करने में मददगार साबित हो सकते हैं।

- समान विचारों के लोगों का समूह बनाएं। पर्यावरण संबंधी अभियानों में शामिल दोस्तों-संबंधियों को सहयोग प्रदान करें। खुद आगे बढ़ें।

- अपने परिवेश के बारे में सोचना अच्छी बात है, लेकिन तनाव को नियंत्रित करना भी जरूरी है। समस्याओं के बजाय समाधान की दिशा में काम करें। दुनिया भर में हो रहे सकारात्मक कार्यों के बारे में जानें।

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