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सिरोसिस लिवर की ऐसी बीमारी है, जो शरीर में धीरे-धीरे विकसित होती है। यह बीमारी बिना लक्षणें के बढ़ती रहती है, कभी-कभी तब तक जब तक यह एडवांस्ड स्टेज तक नहीं पहुंच जाती। लिवर के कई रोग देर से ही पहचाने जाते हैं, मुख्यतः इसलिए क्योंकि शुरुआती लक्षण नहीं होते और लोग इसकी जांच कराने में देरी करते हैं। सिरोसिस के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं कानपुर के कृष्णा हॉस्पिटल कानपुर एवं प्राइम डाइजेस्टिव केयर के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी कंसल्टेंट, डीएम, डॉ. प्रांजल सिंह-


सिरोसिस क्या है

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सिरोसिस लिवर की क्रोनिक बीमारी लिवर स्थिति है। यह तब होता है जब लिवर को लंबे समय तक बार-बार नुकसान होता है, जिससे हेल्दी टिशूज की जगह स्कार टिशूज ले लेते हैं। ये टिशूज लिवर की सामान्य संरचना को बदल देते हैं और इसकी आवश्यक कार्य करने की क्षमता को कम कर देते हैं। इन कार्यों में रक्त से हानिकारक पदार्थों को छानना, भोजन के पाचन में सहायता करना, और शरीर के मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट करना शामिल है। यह रोग धीरे-धीरे विकसित होता है । समय बीतने के साथ, इससे लिवर की कार्यक्षमता कम हो जाती है और दिक्कतें पैदा होने लगती हैं। इस नुकसान के बावजूद, लिवर लंबे समय तक पूरी रूप से कार्य कर सकता है। यही कारण है कि सिरोसिस आरंभिक स्टेज में पता नहीं चल पाता है।


क्यों पकड़ में नहीं आता सिरोसिस

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सिरोसिस का धीरे और चुपचाप बढ़ना इस पर निर्भर करता है कि लिवर कैसे काम करता है। जब लिवर में कोई खराबी होती है तो इसका कोई लक्षण जैसे दर्द आदि नहीं होता और खुद ही रिपेयर होने लगता है। इसी वजह से सिरोसिस कई वर्षों तक धीरे-धीरे विकसित होता रहता है। इसके शुरुआती बदलाव बेहद सूक्ष्म होते हैं और हमारी दिनचर्या में कोई बाधा नहीं डालते, इसलिए इसका पता नहीं चल पाता है।


क्या होते हैं शुरुआती लक्षण

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इसके शुरुआती लक्षणों में शामिल हैं लगातार थकान, हल्की कमजोरी, भूख में कमी, और कभी-कभार पाचन संबंधी दिक्कतें आदि। चूंकि ये आम संकेत हैं इसलिए इन पर ध्यान नहीं दिया जाता। और जब तक लक्षण ज्यादा और स्पष्ट दिखायी देते हैं, तब तक सिरोसिस काफी बढ़ चुका होता है। ऐसे लक्षणों में त्वचा का पीला पड़ना, पेट में सूजन, और सामान्य रूप से अस्वस्थ महसूस करना शामिल हैं।


डायगनोसिस क्यों है जरूरी


चूंकि सिरोसिस के शुरुआती लक्षण हल्के और आसानी से नजरअंदाज करने योग्य होते हैं, जिन्हें हम आमतौर पर थकान या रोजमर्रा के तनाव के रूप में टाल देते हैं तो इसलिए कोई टेस्ट भी नहीं करवाते, जबकि स्थिति समय के साथ धीरे-धीरे बिगड़ती रहती है। 
जब तक सिरोसिस का पता चलता है, तब तक यह काफी एडवांस्ड स्टेज में आ चुका होता है। हेपेटाइटिस बी या हेपेटाइटिस सी के साथ जी रहे लोगों में लिवर कैंसर विकसित होने का जोखिम भी अधिक होता है। भारत में, सिरोसिस से ग्रस्त हर 100 में से लगभग 1.6 लोगों में हर साल लिवर कैंसर विकसित होता है।

निदान और उपचार: क्या किया जा सकता है


सिरोसिस का जल्दी पता लगाना इसे मैनेज करने में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। शुरुआती टेस्ट में आमतौर पर ब्लड टेस्ट शामिल होते हैं, जैसे लिवर फंक्शन टेस्ट, साथ ही इमेजिंग। फाइब्रोस्कैन (ट्रांज़िएंट इलास्टोग्राफी) एक अत्यंत प्रभावी, नॉन इंवेसिव टेस्ट है जो सिरोसिस का पता लगाने और उसकी अवस्था निर्धारित करने में मदद करता है। इसके अलावा अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन या एमआरआई भी किए जा सकते हैं।


टेस्ट होने और सिरोसिस का पता चलने के बाद, इसके इलाज में शामिल है सिरोसिस के बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करना और इससे जुड़ी मुश्किलों को कम करना। इसमें आवश्यकता अनुसार एंटीवायरल दवाएं शामिल हो सकती हैं, साथ ही शरीर में फ्लुइड जमा होने से रोकना, ब्लीडिंग के रिस्क को कम करन और शरीर में टॉक्सिंस जमा होने से रोकने की दवाएं भी दी जाती हैं।


मेटाबोलिक केअर का महत्व की भूमिका


यदि शरीर में ब्लड शुगर, वजन और लिपिड लेवर का संतुलन नहीं होाग, तो इससे लिवर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा और इससे लिवर जल्दी डैमेज होने लगेगा। ऐसी स्थिति में ब्लड शुगर को नियंत्रित करना, स्वस्थ वजन बनाए रखना, और लिपिड स्तर में सुधार करना—इस दबाव को कम कर सकते हैं और लिवर के कार्य करने की क्षमता को सपोर्ट कर सकते हैं।


जहां एक ओर गंभीर रोगों के लक्षण बेहद ज्यादा और स्पष्ट होते हैं, वहीं सिरोसिस हमारे शरीर में चुपचाप बिना किसी खास लक्षणों के विकसित होता है, और कई लोग पूरी तरह ठीक महसूस करते रहते हैं, इसी वजह से यह तब तक अनदेखा रह सकता है जब तक यह पूरी तरह से फैल नहीं चुका होता।

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