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मेघना गुलजार की ‘दायरा’, जो 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हुई, एक युवती के साथ हुए जघन्य अपराध की जांच के बहाने पुलिस और न्याय व्यवस्था के बीच मौजूद इसी तनाव को सामने लाती है। फिल्म में दो पुलिस वालों की दो अलग सोच के माध्यम से इंसान के मन में चल रही दो राय को बखूबी दिखाया गया है। पृथ्वीराज सुकुमारन के किरदार रमन कुमार और करीना कपूर खान की अजूनी कोहली एक ही व्यवस्था में रहते हुए न्याय तक पहुंचने के दो अलग रास्तों को सामने रखते हैं। मेघना गुलाजर के डिस्क्लेमर के मुताबिक फिल्म सत्य घटनाओं से प्रेरित है, लेकिन इसके घटनाक्रम में 2019 के हैदराबाद गैंगरेप-हत्या मामले और उसके बाद हुए पुलिस एनकाउंटर की छाया साफ महसूस होती है।

‘दायरा’ को आज देखना इसलिए और ज्यादा असहज करता है क्योंकि फिल्म के सवाल सिनेमाघर से बाहर निकलते ही हमारे आसपास की खबरों में दिखाई देने लगते हैं।

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जमुई से दिल्ली तक – महिलाओं की सुरक्षा के सवाल

बिहार के जमुई में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित छेड़छाड़ और बदसलूकी का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मुख्य आरोपी नंदन यादव को पकड़ने की कोशिश की। पुलिस के मुताबिक उसने भागने की कोशिश की और मुठभेड़ के दौरान उसके पैर में गोली लगी।

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जमुई की खबर अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि समस्तीपुर से एक और वीडियो सामने आया, जिसमें एक लड़की के साथ सड़क पर युवकों द्वारा कथित तौर पर बदसलूकी और अभद्रता की गई। रिपोर्टों के मुताबिक लड़की एक लड़के के साथ वहां रुकी थी, जिसके बाद कुछ युवकों ने उसे घेर लिया।

इसी दौरान दिल्ली के आस्था कुंज पार्क की घटना सामने आई। 17 साल की लड़की के साथ कथित गैंगरेप के मामला सामने आ गया। पुलिस के मुताबिक तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर उसे उसके दोस्त से अलग किया और पार्क के सुनसान हिस्से में ले गए। मामले में आरोपी आसिफ को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया। पुलिस का कहना है कि उसने पुलिस टीम पर गोलियां चलाईं, जिसके जवाब में एक गोली उसके पैर में लगी।

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इन सबके बीच एक बेचैन करने वाला सवाल जरूर जुड़ता है—क्या महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के लिए हमें हमेशा उस बिंदु तक इंतजार करना होगा, जहां पुलिस की बंदूक न्याय का प्रतीक बन जाए?

सवाल है, जिसे ‘दायरा’ उठाती है

2019 में हैदराबाद में 26 वर्षीय वेटनरी डॉक्टर के साथ गैंगरेप और हत्या के मामले में गिरफ्तार चार आरोपियों को पुलिस ने कुछ दिन बाद मुठभेड़ में मार दिया था। उस समय देश के बड़े हिस्से में इसे त्वरित न्याय के तौर पर देखा गया। लेकिन इसके बाद यह बुनियादी सवाल भी उठा कि क्या किसी आरोपी को अदालत में मुकदमे और न्यायिक प्रक्रिया का सामना किए बिना मार दिया जाना कानून के राज के अनुरूप है?

हालांकि सबसे बड़ा सवाल ये है कि महिलाओं के साथ ऐसा हो ही क्यों रहा है – हर बार जब किसी लड़की के साथ बदसलूकी होती है तो सवाल लड़की से शुरू क्यों होता है? कहां गई थी? किसके साथ गई थी? कपड़े कैसे थे? इतनी रात को बाहर क्यों थी? अकेली क्यों थी? ये सोच अपराध को रोकने के बजाय उसके लिए एक सामाजिक बहाना तैयार करती है। क्या हम अपराध को अपराध मानने की अपनी बुनियादी क्षमता खो रहे हैं ? दिल्ली के आस्था कुंज मामले में भी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि लड़की शाम को पार्क क्यों गई थी। सवाल यह भी है कि एक सार्वजनिक जगह पर अपराधियों को ऐसा करने का अवसर कैसे मिला और सुरक्षा व्यवस्था कहां थी।

अगर समाधान हर बार यही है कि महिलाएं शाम को बाहर न निकलें, अकेली न जाएं, उस रास्ते से न जाएं, उस जगह न जाएं, तो इसका मतलब ये है कि आपराधिक सोच आज़ाद है – महिलाएं आज भी एक सीमित दायरे में आजाद महसूस कर सकती हैं।

अगर एक बार यह स्वीकार कर लिया जाए कि किसी गंभीर आरोप के बाद पुलिस ही तय कर सकती है कि आरोपी को जीना चाहिए या नहीं, तो इसका खतरा सिर्फ अपराधियों तक सीमित नहीं रहेगा। गलत पहचान, गलत जांच, झूठे आरोप, पुलिस की गलती या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में निर्दोष व्यक्ति भी इसकी कीमत चुका सकता है।

‘दायरा’ की खासियत यही है कि फिल्म दर्शक को किसी एक आसान नैतिक निष्कर्ष तक नहीं ले जाती। वह अपराध की भयावहता को कम नहीं करती, लेकिन ‘तुरंत न्याय’ को भी अंतिम समाधान मानकर छोड़ नहीं देती।

फिल्म कोर्टरूम ड्रामा से ज्यादा पुलिस जांच, पुरानी सोच और कानून बनाम फटाफट न्याय के तनाव पर केंद्रित है। रमन कुमार और अजूनी कोहली के बीच का वैचारिक टकराव कहानी को आगे बढ़ाता है। पृथ्वीराज सुकुमारन अपने किरदार में पर्याप्त वजन लाते हैं। करीना कपूर खान की भूमिका फिल्म की केंद्रीय बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन इस बहस में फिल्म का नाटकीय असर उतना गहरा नहीं बन पाता।

फिर भी ‘दायरा’ की अहमियत उसके सवाल में है।

क्या है असली दायरा

अगर एक लड़के को बचपन से यह सिखाया ही नहीं गया कि लड़की की मर्जी, उसकी स्वतंत्रता और उसकी गरिमा का सम्मान करना है, अगर सार्वजनिक जगह पर किसी लड़की को घेरना, छूना, टिप्पणी करना या डराना ‘मजाक’ माना जाता रहा —तो केवल कानून बदलने से समस्या खत्म नहीं होगी। अपराध के खिलाफ कठोर कानून जरूरी हैं। तेज और निष्पक्ष जांच जरूरी है। दोषियों को सजा मिलना जरूरी है। लेकिन उससे पहले अपराध को जन्म देने वाली सोच बदलना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि असली ‘दायरा’ बंदूक और अदालत के बीच नहीं, सोच और व्यवस्था के बीच है। ये हमें सोचना है कि महिलाएं बाहर निकलने का समय और कपड़े तय करें या पुलिस आरोपी को देखते ही गोली मार दे या लोग अपनी सोच बदलें और सुधर जाएं ?

फिल्म देखने के बाद पहला एहसास यही होता है कि ‘दायरा’ सिर्फ एक जघन्य अपराध की कहानी नहीं है। यह उस अपराध के बाद पैदा होने वाले उन सवालों की पड़ताल भी है, जिनका जवाब समाज और सिस्टम दोनों के लिए आसान नहीं है। इंसाफ आखिर है क्या? कानून की हद कहां तक है? और जब समाज का कानून पर भरोसा कमजोर पड़ने लगे तो क्या ‘तुरंत न्याय’ ही न्याय का सबसे आसान और इकलौता रास्ता है?

फिल्म खत्म हो जाती है, लेकिन सवाल खत्म नहीं होते। और शायद इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है।

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