अगर आप उनमें से हैं जो अपने लिए फुटवियर खरीदने जाएं और आसानी से आपके साइज का जूता मिल जाता है तो आप लकी हैं। लेकिन किस्मत हर किसी का साथ नहीं देती। बहुत से लोग इस वजह से मायूस रहते हैं कि उनके पसंद के डिजाइन में उनके नाप का फुटवियर नहीं मिलता। और कहते हैं ना आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। कुछ ऐसा ही हुआ अवि कुमार के साथ। उनका अपना पैरों का नाप बड़ा है, जिसकी वजह से उन्हें अपने साइज का जूता ढूंढ़ने में दिक्कत होती थी। इस बात से परेशान हो कर उन्होंने सोचा कि अब अपने लिए खुद ही जूता बनाना पड़ेगा, जो ना सिर्फ पैर में परफेक्ट फिट हो और कंफर्टेबल भी हो। जब दोस्तों को अवि के बनाए सैंडल पसंद आए तो उन्हें एहसास हुआ कि जूतों का बाजार तो बहुत बड़ा है, लेकिन इसके कुछ पहलू अभी भी अनछुए हैं। यहीं से शुरुआत हुई 13 नंबर तक फुटवियर बनाने की। धीरे-धीरे लोगों ने कहना शुरू किया कि क्या आप कुछ और बड़े साइज भी बना सकते हैं।
अवि कहते हैं, ‘‘जब पुरुष और महिलाओं दोनों की तरफ से और बड़े साइज के जूते बनाने की डिमांड आयी तो धीरे-धीरे हम साइज बढ़ाते गए। जब हम जूतों का 16-17 तक के साइज तक पहुंच गए तो तान्या हर्बर्ट ने हमसे संपर्क किया। उनके नाम महिलाओं के सबसे बड़े शू साइज का गिनीज बुक रिकॉर्ड दर्ज है। तान्या ने हमें बताया कि उन्हें अपने लिए ऑर्डर दे कर जूते बनवाने पड़ते हैं। जिसके लिए उन्हें 2000 यूएस डॉलर तक खर्च करने पड़ते हैं। तान्या ने यह भी बताया कि आज तक इस वजह से उन्होंने हील्स नहीं पहनी थी, अगर आप हील्स बना देंगे तो मजा आ जाएगा। तान्या के लिए हील्स बनाना हमारे लिए चैलेंज था। धीरे-धीरे हमने साइज 20 तक फुटवियर बनाया। आज हॉउस ऑफ अवि ही एकलौता ऐसा मैन्यूफैक्चरर है जो 15 नंबर से बड़े साइज का फुटिवयर बनाता है।’’
शुरुआती सफर आसान नहीं था। हालांकि इस काम के लिए परिवार का सपोर्ट था, लेकिन जिस सफर पर अवि कुमार चल रहे थे, उसके लिए रास्ता खुद बनाना था। एन ओ का मतलब नो नहीं बल्कि नेक्स्ट आपरच्युनिटी होता है। जब यह काम करना शुरू किया तो महिलाओं की तरफ से बहुत अच्छा रेस्पॉन्स मिला। अपने ही परिवार में ऐसी महिलाएं थीं, जिनके पैर थोड़े चौड़े या बड़े होते हैं। महिलाओं के पैरों में उम्र बढ़ने के साथ सूजन भी बढ़ने लगती है, जिसकी वजह से हर तरह की चप्पल या सैंडल वे नहीं पहन पातीं। जीवन में एडजस्ट करते-करते हर चीज में एडजस्ट करना औरतों की आदत बन जाती है फिर चाहे मामला उनकी पसंद व कंफर्ट से जुड़ा हुआ ही क्यों ना हो। वे अच्छा भी दिखना चाहती हैं, लेकिन गलत साइज या पैरों के मुताबिक फुटवियर ना मिलने की वजह से उन्हें असुविधा को चुनना पड़ता है। इसी एडजस्टमेंट के चक्रव्यूह को तोड़ा अवि कुमार ने अपने प्रोडक्ट्स से।
ऑस्ट्रेलिया में उनके स्टोर पर बड़े साइज उपलब्ध होने लगे, तो उन्होंने पाया कि दुकान में काफी तादाद में एलजीबीटी समुदाय के लोग आने लगे, क्योंकि अमूमन इन लोगों के पैरों का नाप बड़ा होता है। यहीं से आइडिया आया कि इन लोगों की जरूरतों को समझा जाए और ऐसे प्रोडक्ट्स बनाए जाएं, जिनसे हर तबके और हर वर्ग का कंज्यूमर जुड़ सके।
अवि कुमार का मानना है कि वे बिजनेस में मुनाफे से ज्यादा ग्राहकों के भरोसे को तरजीह देते हैं, यही वजह है कि बाकी बड़े-बड़े ब्रांड्स की तरह हाउस ऑफ अवि के फुटवियर महंगे नहीं हैं, बल्कि अफोर्डेबल कीमतों में उपलब्ध हैं।
वे चाहते तो बड़ी सेलिब्रिटी या इंफ्लुएंसर को अपने कैंपेन का हिस्सा बना सकते थे, लेकिन इससे ब्रांड वैल्यू के साथ-साथ प्रोडक्ट वैल्यू भी बढ़ जाती, जिसका बोझ कस्टमर की जेब पर पड़ता। इसकी बजाय उन्होंने लक्ष्मी त्रिपाठी या तान्या हर्बर्ट जैसे लोगों को अपना चेहरा बनाया, जो खुद प्रोडक्ट इस्तेमाल करके शाउटआउट दें । महिलाओं में वॉटर रिटेंशन के कारण होने के कारण होने वाली समस्या लिंफोडिमा बहुत आम है। एक महिला ने अपने जीवन में इस समस्या के कारण जीवन में कभी जूते नहीं पहने थे, जब उसने हॉउस ऑफ अवि की जूती पहनी तो वह खुशी के मारे अपने आंसू नहीं रोक पायी।
भारतीय जूती को बनाया इंटरनेशनल
भारतीयों को जूती से विशेष प्रेम है। इंडियन एथनिक वियर खासकर से सलवार कमीज, कुरता के साथ जूती पहनने का हमारे यहां हमेशा से ही चलन रहा है। हाउस ऑफ अवि ने जूती को विदेशियों को पहनाया। विदेशियों की बैले फ्लैट और जूती में ज्यादा फर्क नहीं है। इंडिया की जूती जब वहां बड़े साइज में और कंफर्टेबल बन कर पहुंची तो विदेशियों ने उसे हाथोंहाथ लिया। जूती के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि यह चौड़े साइज में नहीं मिलती, जो हाॅउस ऑफ अवि ने बनायी और उम्मीदों पर खरी उतरी।