बच्चा होने के बाद मां खुश नहीं ? हो सकता है पोस्टपार्टम डिप्रेशन
Postpartum depression, a serious mental health condition affecting new mothers with symptoms like persistent sadness and anxiety, is often exacerbated by hormonal shifts, sleep deprivation, and inadequate social support, with research indicating a significant prevalence in India and emphasizing the critical need for early recognition and professional intervention.
Postpartum depression, a serious mental health condition affecting new mothers with symptoms like persistent sadness and anxiety, is often exacerbated by hormonal shifts, sleep deprivation, and inadequate social support, with research indicating a significant prevalence in India and emphasizing the critical need for early recognition and professional intervention.
Postpartum depression, a serious mental health condition affecting new mothers with symptoms like persistent sadness and anxiety, is often exacerbated by hormonal shifts, sleep deprivation, and inadequate social support, with research indicating a significant prevalence in India and emphasizing the critical need for early recognition and professional intervention.
बच्चे का जन्म सिर्फ नई मां के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए उत्सव का पल होता है। नए बने माता और पिता दोनों के परिवारों में खुशियां आती हैं, लेकिन हर मां इस समय सिर्फ खुशी ही महसूस करे, ऐसा जरूरी नहीं है। कई महिलाओं को बच्चे के जन्म के बाद लगातार उदासी, चिड़चिड़ापन, घबराहट, थकान और अकेलेपन का एहसास होने लगता है। कई बार यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि महिला को अपने बच्चे की देखभाल करना भी मुश्किल लगने लगता है। इसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन यानी प्रसव के बाद होने वाला अवसाद कहा जाता है।
क्यों होता है पोस्टपार्टम डिप्रेशन
मां बनने की खुशी पर ऐसा कौन सा दुख दर्द हावी हो जाता है कि बच्चे की मुस्कुराहट भी उसे नहीं मिटा पाती ? इसे समझने के लिए एक भारतीय मां के दिन की कल्पना ही काफी है। डिलीवरी के दर्द से गुजरने के बाद जीवन में चुनौतियां बढ़ जाती हैं। नवजात को थोड़ी थोड़ी देर में ब्रेस्टफीडिंग (स्तनपान) करवाने के लिए घंटों बैठना, बच्चे के सोने के शेड्यूल की वजह से भरपूर नींद की कमी, शरीर में हो रहे बदलाव, हॉरमोनल बदलाव से होने वाली उदासी और चिड़चिड़ापन – अपने लिए बिल्कुल समय ना निकाल पाना – ये वो मुश्किले हैं जिससे मां को जूझना पड़ता है। अगर महिला नौकरीपेशा हो तो करियर की चिंता, काम पर लौटने का तनाव, घर और ऑफिस के बीच तालमेल ना बिठा पाने का डर – इतनी सारी चिंताओं में तनाव होना स्वाभाविक है। ऐसे में अगर परिवार का भावनात्मक साथ ना हो, आर्थिक तंगी हो और कोई मदद करने वाला ना हो तो चिंता को मानसिक बीमारी में बदलने में समय नहीं लगता।
दिल्ली के द्वारका में बने वेंकटेश्वर अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ रिचा चौधरी कुछ साल पहले जब महाराष्ट्र के वर्धा के मेडिकल कॉलेज में गायनाकोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई कर रही थी – उस दौरान उनके सामने ऐसा हादसा घटा जिसे वो आज भी नहीं भूल पाई। एक महिला ने बच्चा पैदा होने के कुछ समय बाद आत्महत्या कर ली थी – वजह थी – पोस्टपार्टम डिप्रेशन – यानी बच्चा होने के बाद मां को होने वाला डिप्रेशन।
डॉ रिचा ने बताया कि इस नई मां के जीवन में उदासी और डिप्रेशन का दूसरा कोई कारण नहीं था । सिर्फ डिलीवरी के बाद पैदा हुए अवसाद की वजह से महिला आत्महत्या को मजबूर हो गई थी। ऐसे गिने-चुने मामले भी हैं जिसमें नौबत यहां तक आ जाए कि कोई महिला अपने आप को नुकसान पहुंचाने तक आ जाए। हालांकि ऐसा नहीं होना चाहिए। इसके लिए जरुरी है परिवार का साथ और प्रोफेशनल मदद।
19 प्रतिशत भारतीय महिलाओं में पोस्टपार्टम डिप्रेशन – रिसर्च
भारत में यह समस्या कितनी बड़ी है, इसका अनुमान साइंस डाइरेक्ट जर्नल में प्रकाशित एक मेटा अध्ययन से लगाया जा सकता है। 2025 में प्रकाशित इस स्टडी में भारत में हुए 59 अध्ययनों को शामिल किया गया। इसमें भारतीय महिलाओं में पोस्टपार्टम डिप्रेशन करीब 19% पाया गया। भारतीय अध्ययनों में सामाजिक मदद की कमी को एक महत्वपूर्ण कारण पाया गया है।
इसी वर्ष येल यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ साइकियाट्री में आयोजित ग्रैंड राउंड्स लेक्चर में हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की प्रोफेसर और ब्रिघम एंड विमेन्स हॉस्पिटल की विशेषज्ञ डॉ. हेडिन जोफी ने महिलाओं में डिप्रेशन के कारणों और इलाज पर विस्तार से चर्चा की । उन्होंने बताया कि महिलाओं के जीवन में हार्मोनल बदलाव, जैसे प्यूबर्टी, गर्भावस्था, डिलीवरी के बाद का समय और मेनोपॉज के कारण महिलाओं में डिप्रेशन का खतरा पुरुषों के मुकाबले दो गुना होता है।
भारत जैसे समाज में एक और समस्या है—मां से यह उम्मीद की जाती है कि बच्चा होने के बाद वह खुश ही रहेगी। इसलिए अगर कोई महिला कहती है कि वह परेशान है, रोना आता है या बच्चे की जिम्मेदारी संभालना मुश्किल लग रहा है, तो उसे अक्सर यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि “सबके बच्चे होते हैं, तुम्हें भी आदत हो जाएगी।” यही सोच समस्या को और गंभीर बना सकती है।
पहचानें पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण
बच्चे के जन्म के बाद कुछ दिनों तक मूड स्विंग्स होना सामान्य है। लेकिन अगर उदासी, रोने की इच्छा, चिड़चिड़ापन, अत्यधिक चिंता, किसी काम में मन न लगना, नींद या भूख में बदलाव, खुद को बेकार समझना, बच्चे से जुड़ाव महसूस न होना या लगातार अपराधबोध बना रहे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। महिला खुद को या बच्चे को नुकसान पहुंचाने के बारे में सोचे तो इसे एमरजेंसी के तौर पर समझा जाना चाहिए और मेडिकल मदद ली जानी चाहिए।
ऐसे में पति और परिवार का सपोर्ट सबसे अहम होता है। साथ ही साइकोलॉजिस्ट से काउंसलिंग लेकर नई मां को राहत मिल सकती है और बिना दवाओं के इलाज हो सकता है। आजकल ऐसी सुरक्षित दवाएं मौजूद हैं जो ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली महिलाएं भी ले सकती हैं। ये दवाएं दिमाग को शांत करने वाले केमिकल बनाकर राहत दे सकती हैं। लेकिन बिना डॉक्टर की सलाह के कोई दवा खुद से ना लें।
क्या कहते हैं डॉक्टर
गुड़गांव के मदरहुड अस्पताल की डायरेक्टर डॉ प्रीति अग्रवाल के मुताबिक बच्चे के जन्म के बाद महिलाएं खुद के लिए आधा घंटा सैर का समय निकालें और थोड़ी बहुत एक्सरसाइज़ करें तो ये उनके शरीर और दिमाग दोनों की सेहत के लिए बहुत अच्छा होता है।
सबसे जरूरी बात यह है कि मां की मानसिक सेहत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी बच्चे की। बच्चे के जन्म के बाद अगर मां खुश नहीं है, तो उसे दोष देने के बजाय उसकी बात सुनना, उसका साथ देना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या मनोवैज्ञानिक तक पहुंचाना परिवार की जिम्मेदारी है।