यह तो हम सभी जानते हैं कि हर 4 साल में एक बार लीप इयर आता है और इसके पीछे का विज्ञान भी समझते हैं, लेकिन जब बात अधिक मास की आती है, तो बहुत से लोग इसे वेदों या धर्म से जुड़ी मुश्किल बात समझ कर हवा में उड़ा देते हैं। अधिक मास, जिसे मल मास, पुरुषोत्तम मास या लोंद मास कहा जाता है, उसके पीछे भी वैसी ही

यह तो हम सभी जानते हैं कि हर 4 साल में एक बार लीप इयर आता है और इसके पीछे का विज्ञान भी समझते हैं, लेकिन जब बात अधिक मास की आती है, तो बहुत से लोग इसे वेदों या धर्म से जुड़ी मुश्किल बात समझ कर हवा में उड़ा देते हैं। अधिक मास, जिसे मल मास, पुरुषोत्तम मास या लोंद मास कहा जाता है, उसके पीछे भी वैसी ही

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यह तो हम सभी जानते हैं कि हर 4 साल में एक बार लीप इयर आता है और इसके पीछे का विज्ञान भी समझते हैं, लेकिन जब बात अधिक मास की आती है, तो बहुत से लोग इसे वेदों या धर्म से जुड़ी मुश्किल बात समझ कर हवा में उड़ा देते हैं। अधिक मास, जिसे मल मास, पुरुषोत्तम मास या लोंद मास कहा जाता है, उसके पीछे भी वैसी ही

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यह तो हम सभी जानते हैं कि हर 4 साल में एक बार लीप इयर आता है और इसके पीछे का विज्ञान भी समझते हैं, लेकिन जब बात अधिक मास की आती है, तो बहुत से लोग इसे वेदों या धर्म से जुड़ी मुश्किल बात समझ कर हवा में उड़ा देते हैं। अधिक मास, जिसे मल मास, पुरुषोत्तम मास या लोंद मास कहा जाता है, उसके पीछे भी वैसी ही वैज्ञानिक गणना काम करती है, जैसी कि लीप ईयर के पीछे। इस बारे में पंडित देवेंद्र शर्मा का कहना है, ‘‘यह तो हम सभी जानते हैं कि एक साल 365 दिन 6 घंटों का होता है। 365 दिनों के बाद बचे हुए 6 घंटे पूरे करने के लिए हर चौथा साल लीप ईयर होता है। यह सूर्य आधारित गणना है। दूसरी तरफ चंद्र गणना के आधार पर एक साल 354 दिन और लगभग 9 घंटे का होता है। इस तरह से सूर्य और चंद्र कैलेंडर में 11 दिन, एक घंटे, 31 मिनट और 1 सेकंड का अंतर होता है। इन दोनों कैलेंडर के बीच का अंतर समाप्त करने के लिए ही अधिक मास की परिकल्पना की गयी थी। पुरुषार्थ चिंतामणि के अनुसार 28 मास से ले कर 36 मास के भीतर एक अधिक मास की पुनरावृत्ति हो सकती है। इस साल अधिक मास रविवार, 17 मई से शुरू हो कर सोमवार, 15 जून तक रहेगा। यह निंदनीय मास नहीं, बल्कि पाप कर्मों को धोने वाला समय है। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिस साल अधिक मास हो, उस साल किसी वरिष्ठ राजनेता के निधन या अपदस्थ होने के योग बनते हैं।’’

कब होता है अधिक मास

जैसे कि अंग्रेजी कैलेंडर में हर चौथा साल लीप ईयर के लिए तय किया गया है, वैसे ही अधिक मास उस अवधि के बाद आता है, जब अमावस्या और पूर्णिमा और पूर्णिमा और अमावस्या के बीच संक्रांति ना आए, तो उस महीने को अधिक मास कहते हैं। संक्रांति क्या होती है, इसे समझने के लिए पृथ्वी की परिक्रमा के चक्र को समझना होगा। पृथ्वी के चारों ओर के आकाश को 12 राशियों के तारामंडल में बांटा गया है। हर महीने सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। इसी दिन को संक्रांति कहा जाता है।

क्या करें क्या ना करें

पंडित देवेंद्र शर्मा का कहना है कि इस महीने में कुछ काम करने से मना किए गए हैं, जैसे विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, गाय का दान, व्रत का उद्यापन, संपत्ति या गाड़ी की खरीद आदि। यदि किसी तीर्थ स्थान पर पहली बार जा रहे हों, तो वहां भी अधिक मास में नहीं जाना चाहिए। फल प्राप्ति की इच्छा से जो काम किए जाते हैं, वे काम भी इस मास में ना करें। यदि किसी की मृत्यु मल मास में हो, तो उसका वार्षिक श्राद्ध मल मास से 12वें मास में होगा।

अगर कोई व्यक्ति किसी गंभीर रोग से पीडि़त हो तो उसकी निवृत्ति के लिए रुद्राभिषेक, बच्चे का अन्नप्राशन, गंडमूल या जन्मदिन पर की जाने वाली पूजा इस मास में की जा सकती है। इसके अलावा अगर कोई काम आपने मल मास शुरू होने से पहले आरंभ किया हो, तो उसे इस मास में खत्म किया जा सकता है।