नयी तकनीकों से बेहतर इलाज संभव है कैंसर का
कैंसर के केसेज भारत में ही नहीं, दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि कैंसर नए एपिडेमिक की शक्ल ले चुका है। इस रोग से दुनिया भर में हर साल लगभग 1 करोड़ लोगों की मौत होती है। डॉ. अश्वनी कुमार शर्मा, वाइस चेअरमैन, मनीपाल कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर एंड ऑन्को रोबोटिक सर्जरीज,
कैंसर के केसेज भारत में ही नहीं, दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि कैंसर नए एपिडेमिक की शक्ल ले चुका है। इस रोग से दुनिया भर में हर साल लगभग 1 करोड़ लोगों की मौत होती है। डॉ. अश्वनी कुमार शर्मा, वाइस चेअरमैन, मनीपाल कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर एंड ऑन्को रोबोटिक सर्जरीज,
कैंसर के केसेज भारत में ही नहीं, दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि कैंसर नए एपिडेमिक की शक्ल ले चुका है। इस रोग से दुनिया भर में हर साल लगभग 1 करोड़ लोगों की मौत होती है। डॉ. अश्वनी कुमार शर्मा, वाइस चेअरमैन, मनीपाल कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर एंड ऑन्को रोबोटिक सर्जरीज,
कैंसर के केसेज भारत में ही नहीं, दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि कैंसर नए एपिडेमिक की शक्ल ले चुका है। इस रोग से दुनिया भर में हर साल लगभग 1 करोड़ लोगों की मौत होती है। डॉ. अश्वनी कुमार शर्मा, वाइस चेअरमैन, मनीपाल कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर एंड ऑन्को रोबोटिक सर्जरीज, मनीपाल हॉस्पिटल, गुरुग्राम बता रहे हैं कैंसर के इलाज के क्षेत्र में हुई लेटेस्ट तकनीकों के बारे में-
कैंसर के इलाज में अब फोकस 3 चीजों पर है- जल्दी पहचान, शरीर के हिसाब से पर्सनलाइज्ड इलाज और कम साइड इफेक्ट के साथ लंबी राहत। पहले इलाज की मुख्य धुरी सर्जरी, कीमोथेरैपी और रेडिएशन थे, जो अच्छे हैं, पर कई बार पूरे शरीर पर असर डालते हैं। अब इम्यूनोथेरैपी, टार्गेटेड थेरैपी, CAR-T सेल थेरैपी, कैंसर वैक्सीन, रोबोटिक सर्जरी और स्मार्ट इमेजिंग जैसी तकनीकें कम साइड इफेक्ट के साथ मरीज को बेहतर उपचार दे रही हैं।
CAR-T सेल थेरैपी
CAR-T सेल थेरैपी को अकसर ‘लिविंग ड्रग’ कहा जाता है, क्योंकि इसमें मरीज के ही T-cells को लैब में जीन एडिट करके सुपर सोल्जर बनाया जाता है। सबसे पहले यह तकनीक ल्यूकेमिया और लिंफोमा में इस्तेमाल हुई। नयी पीढ़ी की CAR-T तकनीकें और भी स्मार्ट हैं। इनसे कैंसर दोबारा लौटने का खतरा कम हो सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मरीज 10 -12 साल तक कैंसर मुक्त रहे हैं, जो इस थेरैपी की जबर्दस्त संभावनाओं को दिखाता है।
इम्यूनोथेरैपी : जब शरीर खुद लड़ता है
इम्यूनोथेरैपी का आइडिया है- शरीर के अपने इम्यून सिस्टम को इतना ताकतवर बना दो कि वह कैंसर सेल्स को दुश्मन मान कर खुद ही हमला कर दे। 2024-25 में अलग-अलग तरह के कैंसर (फेफड़े, ब्लैडर, कुछ स्किन कैंसर आदि) के लिए कई नयी इम्यूनोथेरैपी दवाओं को मंजूरी मिली है, जिससे मरीजों के सर्वाइवल रेट में सुधार दिखा है।
टार्गेटेड थेरैपी और प्रिसिजन मेडिसिन
कैंसर अब ‘वन साइज फिट्स ऑल’ बीमारी नहीं समझा जाता, बल्कि हर मरीज के कैंसर की अपनी जीन प्रोफाइल मानी जाती है। टार्गेटेड ड्रग्स सीधे उन खास मॉलिक्यूल्स या जीन म्यूटेशन पर निशाना साधती हैं, जो कैंसर को बढ़ा रहे हैं। प्रिसिजन मेडिसिन में मरीज के ट्यूमर का जीनोमिक टेस्ट होता है, फिर उसी के हिसाब से दवाओं का कॉम्बिनेशन चुना जाता है।
रोबोटिक सर्जरी
कैंसर पेशेंट की सर्जरी अब रोबोटिक सर्जरी के दौर में हैं, जिसमें पारंपरिक सर्जरी में किए जाने वाले बड़े-बड़े चीरों की जगह की होल्स किए जाते हैं, जो एक सेंटीमीटर से भी कम साइज के होते हैं। इस सर्जरी के कई फायदे हैं, इसमें छोटे चीरे, कम दर्द, कम ब्लड लॉस और कम इन्फेक्शन होता है। गले के कैंसर, थायरॉइड कैंसर, फूड पाइप व लंग कैंसर, रेक्टल कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर और किडनी कैंसर में रोबोटिक सर्जरी बहुत कामयाब है। हाइपरथर्मिक इंट्रा पेरेटोनियल कीमोथेरैपी यानी हाइपैक एक उन्नत उपचार है, जिसमें सर्जरी के बाद पेट में कैंसर की छोटी-छोटी कोशिकाओं को मरने के लिए गरम कीमोथेरैपी दवाएं दी जाती हैं। यह इलाज पारंपरिक कीमोथेरैपी की तुलना में अधिक प्रभावी होता है। यह रोबोटिक सर्जरी के साथ किया जाता है। रोबोटिक और इमेज गाइडेड सर्जरी से अब ट्यूमर को बहुत नपेतुले तरीके से हटाया जा सकता है, जिससे आसपास के स्वस्थ ऊतक और नसों को कम नुकसान होता है और रिकवरी तेज होती है।
AI और स्मार्ट स्कैन
कैंसर की पहचान और स्टेजिंग में अब एआई सुपर असिस्टेंट बनता जा रहा है। सीटी, एमआरआई और पेट स्कैन की इमेज को एआई एल्गोरिद्म रेडियोमिक्स जैसी तकनीकों के साथ पढ़ कर उन सूक्ष्म पैटर्न को पकड़ सकते हैं, जो मानव आंख से छूट जाते हैं। इससे ट्यूमर का आकार, फैलाव और इलाज का रिस्पॉन्स अधिक सटीक रूप से आंका जा सकता है और अनावश्यक बायोप्सी से भी बचा जा सकता है।
लिक्विड बायोप्सी
बायोप्सी के लिए दर्द भरी सूई या सर्जरी के बजाय बस एक ब्लड टेस्ट से कैंसर की जानकारी मिल जाए, तो कैसा हो! यही सपना लिक्विड बायोप्सी धीरे-धीरे सच कर रही है। इस तकनीक में खून में घूम रहे कैंसर से जुड़े डीएनए टुकड़े, प्रोटीन या एक्सोसोम जैसी सूक्ष्म चीजों का विश्लेषण किया जाता है। लिक्विड बायोप्सी से ना सिर्फ कैंसर की मौजूदगी, बल्कि उसके शुरुआती स्टेज और इलाज के बाद बची हुई छोटी सी बीमारी का भी अंदाजा लगाया जा सकता है।
कैंसर वैक्सीन और रोकथाम की नयी सोच
कैंसर वैक्सीन 2 तरह की होती है- कुछ प्रिवेंटिव (जैसे एचपीवी वैक्सीन, जो गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का खतरा घटाती है), और कुछ थेरैप्युटिक, जो पहले से हुए कैंसर के खिलाफ इम्यून सिस्टम को ट्रेन करती हैं। 2024 में मेलेनोमा और कुछ अन्य ट्यूमर के लिए पर्सनलाइज्ड mRNA वैक्सीन ट्रायल्स में अच्छे नतीजे दिखे हैं, जिनमें हर मरीज के ट्यूमर के अनुसार वैक्सीन डिजाइन की जाती है। यह वही mRNA तकनीक है, जिस पर कोविड के समय वैक्सीन बनी थीं, लेकिन अब इसे कैंसर के लिए बहुत बारीकी से कस्टमाइज किया जा रहा है।
प्रोटॉन थेरैपी और स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी जैसी तकनीकें बेहद सटीक रेडिएशन डिलीवरी देती हैं, जो दिमाग, रीढ़ या बच्चों के कैंसर में खासतौर पर फायदेमंद साबित हो रही हैं। कुछ केंद्रों पर सर्जरी से पहले ट्यूमर को छोटा करने के लिए इम्यूनोथेरैपी और टार्गेटेड ड्रग्स दी जा रही हैं, ताकि ऑपरेशन कम जटिल हो और बची हुई कोशिकाओं के दोबारा बढ़ने की आशंका घटे।
चुनौतियां अभी भी कम नहीं
उम्मीद की तसवीर जितनी चमकीली है, चुनौतियां भी उतनी ही वास्तविक हैं। CAR-T और कुछ नयी इम्यूनोथेरैपी इलाज बहुत महंगे हैं और अभी सीमित सेंटर्स में ही उपलब्ध हैं। कई मरीजों में शुरुआत में अच्छे नतीजे आने के बाद भी कुछ सालों में कैंसर लौट आता है, जिस पर रिसर्च लगातार जारी है। लिक्विड बायोप्सी और एआई आधारित टेस्ट अभी बड़े ट्रायल्स के चरण में हैं। उन्हें आम स्क्रीनिंग प्रोग्राम में शामिल करने से पहले उनकी सटीकता, लागत और प्रैक्टिकल उपयोग को और परखना जरूरी है।
मरीज और परिवार के लिए क्या मायने
नयी तकनीकों का सीधा असर मरीज और परिवार की जिंदगी पर पड़ता है। कई तरह के कैंसर जो पहले लाइलाज माने जाते थे, अब लंबे समय तक कंट्रोल में रखे जा सकते हैं और कुछ मामलों में पूरी तरह खत्म भी हो सकते हैं। कैंसर के इलाज की यह नयी कहानी उम्मीद, विज्ञान और तकनीक का ऐसा संगम है, जो आने वाले समय में शायद ‘कैंसर’ शब्द के साथ जुड़ा डर कुछ कम कर दे।