हसबैंड रिपेअरिंग सेंटर
‘‘सुनिए! अब मैं भी बिजनेस करना चाहती हूं।’’ श्रीमती जी के मुखारबिंद से आठ शब्दों का यह वाक्य क्या फूटा कि हमारे शरीर से हैरत का झरना फूट पड़ा। ज्ञानेंद्रियों में उनके नसीब के हिसाब से जो प्रतिक्रिया हुई, सो अलग। आंखों ने अपना साइज, फट जाने की सीमा तक बढ़ा कर उन्हें देखा, जो शायद उनके पूरे होशोहवास
‘‘सुनिए! अब मैं भी बिजनेस करना चाहती हूं।’’ श्रीमती जी के मुखारबिंद से आठ शब्दों का यह वाक्य क्या फूटा कि हमारे शरीर से हैरत का झरना फूट पड़ा। ज्ञानेंद्रियों में उनके नसीब के हिसाब से जो प्रतिक्रिया हुई, सो अलग। आंखों ने अपना साइज, फट जाने की सीमा तक बढ़ा कर उन्हें देखा, जो शायद उनके पूरे होशोहवास
‘‘सुनिए! अब मैं भी बिजनेस करना चाहती हूं।’’ श्रीमती जी के मुखारबिंद से आठ शब्दों का यह वाक्य क्या फूटा कि हमारे शरीर से हैरत का झरना फूट पड़ा। ज्ञानेंद्रियों में उनके नसीब के हिसाब से जो प्रतिक्रिया हुई, सो अलग। आंखों ने अपना साइज, फट जाने की सीमा तक बढ़ा कर उन्हें देखा, जो शायद उनके पूरे होशोहवास
‘‘सुनिए! अब मैं भी बिजनेस करना चाहती हूं।’’ श्रीमती जी के मुखारबिंद से आठ शब्दों का यह वाक्य क्या फूटा कि हमारे शरीर से हैरत का झरना फूट पड़ा। ज्ञानेंद्रियों में उनके नसीब के हिसाब से जो प्रतिक्रिया हुई, सो अलग। आंखों ने अपना साइज, फट जाने की सीमा तक बढ़ा कर उन्हें देखा, जो शायद उनके पूरे होशोहवास में होने का सर्टिफिकेट चाहती थीं। कानों ने खड़े होने के लिए 'श्वान कर्ण' का अनुसरण करना चाहा। मगर दिमाग ने उन्हें गधे के कानों की तरह बैठे रहने का हुक्म दे दिया। जबान में जुंबिश हो भी ना पायी थी कि मुंह ने उसे सदा की तरह ना हिलने की चेतावनी दे डाली।
आखिर शरीर में बुरे दिनों के लिए बचा कर रखी संपूर्ण हिम्मत बटोर कर हमने कहा, ‘‘ऐ कैक्टस की रानी... तूफानों की मलिका ! आपको अधिकृत तौर पर सठियाए 4 साल हो चुके हैं। ब्लड, यूरिक एसिड, बीपी, कोलेस्ट्राॅल आदि सभी रिपोर्टें भी ठीक हैं... फिर अचानक बिजनेस की बात। चलिए शाम को किसी साइकियाट्रिस्ट की भी सलाह ले लेते हैं।’’
‘‘साइकियाट्रिस्ट की जरूरत होगी आपको। कायदे से रिटायर होते ही आपकी जांच करा लेनी चाहिए थी,’’ श्रीमती जी ने अपने ‘आपे’ को खोने से बचाते हुए आगे कहा, ‘‘नारी सशक्तीकरण का जमाना है। इतने साल आपके बच्चों और आपको पालने, सुधारने और ‘तथाकथित’ से वास्तविक आदमी बनाने में निकाल दिए। अब मैं भी देश और समाज के लिए कुछ करना चाहती हूं... अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं।’’
हमने एक नजर उनके पैरों पर डाली, जिनमें चप्पल के अलावा हमारी और बच्चों की जन्नत भी थी। उन्हीं पैरों पर अपने शरीर का 80 किलो वजन धारण किए वह अंगद की तरह दृढ़ खड़ी थीं। हमने हिम्मत की आखिरी किस्त चुकाते हुए फिर कहा, ‘‘कौन से बिजनेस को अपनी किस्मत से नवाजना चाहती हैं आप हुजूर-ए-आली?’’
यह सुनते ही वे चहकते हुए बोलीं, ‘‘रिटायरमेंट के बाद आज 10 साल में आपने पहली बार कोई समझदारी का सवाल पूछा है।’’
श्रीमती जी के हाथों समझदार होने का प्रमाणपत्र मिलने के बाद, हम कुप्पा बनने की प्रक्रिया में फूलते, उसके पहले ही उनके मुंह से बिना भूमिका का आवरण ओढ़े जो शब्द निकले, वे क्रमशः इस प्रकार थे, ‘‘मेरी इच्छा एक दुकान खोलने की है।’’
‘‘भगवान आपको अंबानी और अदानी से भी ज्यादा कामयाब बनाए... लेकिन हमारी पेंशन से क्या आपकी जरूरतें पूरी नहीं होतीं... जो भजन करने की इस उम्र में आपने बिजनेस टायकून बनने की ठानी है,’’ हमने डर की छोटी डोज गुटकते हुए कहा।
यह सुनते ही उन्होंने हमें उन निगाहों से घूरा, जिनका शब्दों में तर्जुमा किया जाता तो वह इस प्रकार होता- काश ! इस साल ‘जीवन प्रमाण पत्र’ के साथ आपने अपने दिमाग का भी नवीनीकरण करा लिया होता। फिर अगले ही पल वे गुस्सा पी कर और हम पर तरस खा कर बोलीं, ‘‘मैं जो दुकान खोलूंगी, वह मेरे 40 साल के तजुर्बे का निचोड़ होगी।’’
यह सुनते ही हम कांप उठे। हमने अपने निचुड़े हुए शरीर को देखा, जो उसी तजुर्बे का अवशेष था। मन ही मन सोचा... हे भगवान ! बुढ़ापे में ये औरत खाने का होटल खोलेगी या जूडो-कराटे सिखाएगी! लेकिन श्रीमती जी ने हमारे सारे अंदाज फौरन ध्वस्त करते हुए आगे कहा, ‘‘मैं जो दुकान खोलूंगी, उसका नाम होगा - हसबैंड रिपेअरिंग सेंटर... हिंदी में पति मरम्मत केंद्र और उर्दू में मुझे पता नहीं ! ...और, उसके शोकेस में आपको सजाया जाएगा।’’
यह सुनते ही हमारे होश ने उड़ जाने की इजाजत मांगी। हमने इतना ही कहा गया, ‘‘लाखों के शोरूम में हमको सजा दो या लटका दो... मगर इस उम्र में कोई मेरे दो रुपए भी नहीं देगा। एक्सपायरी डेट को रिन्यू कराने का कोई फायदा नहीं।’’
‘‘वो तो मैं भी जानती हूं कि आप तो मुफ्त में भी कबाड़ी के लिए महंगे हैं। लेकिन पहले मेरी पूरी बात सुन लीजिए,’’ श्रीमती जी ने मध्यम दर्जे की दहाड़ का गियर लगाया तो हम अपने दोनों कानों सहित सतर्क हो गए। वे आगे बोलीं, ‘‘हमारी दुकान के बोर्ड में यह भी लिखवाया जाएगा कि हमारे यहां हर तरह के ढीठ, बेशरम, आलसी और मक्कार पतियों की मरम्मत उचित मूल्य पर की जाती है।’’
बोर्ड का मजमून जान कर इस बार हम सशरीर उड़ते-उड़ते बचे। वो तो भला हो महान वैज्ञानिक न्यूटन का, जिन्होंने ठीक समय पर धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की खोज कर डाली और हम धरती पर टिके रहे। वरना राजा सत्यव्रत (त्रिशंकु) के बाद शरीर सहित ऊपर जाने का यह दूसरा प्रयास होता। खैर, श्रीमती जी के बोर्ड में ग्राहक खींचने के संपूर्ण चुंबकीय तत्व मौजूद थे। बस गनीमत रही कि उस पर यह नहीं लिखवाया गया कि मरम्मत के बाद भी कोई पेंच ढीला रह जाने पर रिप्लेसमेंट की गारंटी।
अगले ही दिन हमारे मकान के बाहर वाले कमरे में दुकान खुल गयी। महिला सशक्तीकरण की दिशा में श्रीमती जी का यह पहला कदम था। वैसे भी कोई महिला अगर ‘सशक्त’ होने की ठान ले तो उसे कौन रोक सकता है। ऊपर से ऐसी महिला, जिसे पत्नी होने का चार दशक का अनुभव भी प्राप्त हो। हमारा मकान मुख्य मार्ग से हट कर भीतर एक गलीनुमा सड़क पर था। हमने शंका जाहिर की कि भला यहां इतने भीतर कौन लेडी कस्टमर आएगी। इस पर श्रीमती जी का जवाब था कि आपने शराब की दुकानें नहीं देखीं... चाहे जहां हों, पियक्कड़ तीर देख कर सूंघते हुए पहुंच ही जाते हैं। हम भी उसी की तरह दुकान का एक बोर्ड मुख्य मार्ग पर रख देंगे।
इसके आगे बहस की गुंजाइश नहीं थी। हम कहावत वाले हथियार डाल कर शोकेस में खड़े हो गए। हमें शादी वाले सूट में ठूंसठांस कर किसी तरह घुसाया गया। शादी के वक्त इस सूट में हम दूल्हा बने थे और आज पुतले। शोकेस में हमें इस तरह फिट किया गया था कि हमारा रुख तो बाहर सड़क की तरफ रहे, लेकिन चेहरा काउंटर पर बैठी श्रीमती जी पर। इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि गलती से भी हमारी नजर किसी महिला ग्राहक की ओर ना उठे।
पहले ही दिन दुकान में ग्राहकों की भीड़ उमड़ आयी। ऐसा लग रहा था, जैसे वहां पतियों की सेल चल रही हो। यह देख कर हमें महसूस हुआ कि देश और किसी मामले में हो ना हो, किंतु बिगड़े हुए पतियों के मामले में अवश्य आत्मनिर्भर है। श्रीमती जी ने एक अच्छे और व्यवहारकुशल दुकानदार की तरह सबका मुस्करा कर स्वागत किया। हम किसी मजबूर पति की तरह ठंडी आह भर कर रह गए, क्योंकि 40 साल पहले हुए स्वागत को हम अभी तक भूले नहीं थे। महिला ग्राहक तरह-तरह के सवाल पूछ रही थीं। उनमें से कुछ इस प्रकार थे-
शादी के बाद कितने वर्ष तक पति ठीकठाक सर्विस देते हैं?
- एक सर्विस कराने के बाद कितने समय तक पति खराब नहीं होते?
- यदि सेकेंड हैंड हसबैंड हो तो उसकी रिपेयरिंग हो सकती है?
- चार-पांच पतियों की सर्विस कराने पर क्या कोई रियायत मिलेगी?
- अंतिम प्रश्न पूछने वाली महिला को श्रीमती जी ने पहले ध्यान से देखा, फिर पूछा, ‘‘दीदी ! आपका नाम क्या द्रौपदी है?’’
प्रश्न सुन कर वह सकपका गयी। लेकिन फौरन ही संभल कर बोली, ‘‘नहीं ऐसे ही पूछा... दरअसल मेरी कुछ फ्रेंड्स भी हैं... वे भी अपने पतियों की सर्विसिंग कराना चाहती हैं। किसी का कलर उड़ गया है... किसी की डेंटिंग उखड़ गयी है... कोई आवाज बहुत करता है... तो किसी का माइलेज कम है।’’
‘‘हां-हां क्यों नहीं... ले आइए सबको... कंसेशन हो जाएगा,’’ श्रीमती जी ने उन्हें समझाया। उसके बाद बाकी कस्टमर्स को संबोधित करते हुए बोलीं, ‘‘देखिए, मेरा अनुभव कहता है कि आप कितने भी श्रवण कुमार या सत्यवान टाइप लड़के से शादी कर लें, पति बनते ही उनके पर निकालना शुरू हो जाते हैं। यदि उन पर शुरू से नियंत्रण ना रखा जाए तो उनके गब्बर, मोगैंबो या शाकाल बनने में देर नहीं लगती। इसलिए पहले दिन से ही उनके नट-बोल्ट टाइट रखने की जरूरत होती है।’’
श्रीमती जी की बातों से वे सब काफी प्रभावित लग रही थीं। उनमें से कुछ शोकेस के पास आ कर, झांक-झांक कर हमें देखने लगीं। यह नजारा देख कर श्रीमती जी एकदम सतर्क हो गयीं। पहले उन्होंने शोकेस पर ‘कृपया दूर से देखें। किसी सामान को हाथ ना लगाएं’ लिखी तख्ती टांगी, फिर सबको संबोधित करते हुए बोलीं, ‘‘ये आदमी जो शोकेस में बगुला भगत जैसा लग रहा है, पहले बड़ा घाघ था। शादी में जब जन्मपत्री मिलायी गयी तो पूरे 36 अवगुण निकले इसमें। ना नहाता था, ना कपड़े बदलता था। गंदे में से साफ कपड़े छांटता और वही पहन कर ऑफिस चला जाता। खाने में लौकी और तोरी देख कर इसकी स्वर्गीय नानी फिर मर जाती थी। अंग्रेजी नहीं आती थी, फिर भी सिनेमा हॉल में इंग्लिश फिल्में देखने जाता था... डिक्शनरी साथ ले कर। और, क्या-क्या बताऊं। मेरी अच्छी भली किस्मत में पंचर कर दिया था इसने...’’
हमें धाराप्रवाह कोसती श्रीमती जी ने अपनी वाणी पर ब्रेक लगा कर, नाक को सांस लेने की इजाजत दी। फिर कमर में पल्लू खोंस कर, मोर्चे पर डटी पत्नी का पोज बनाया और शेष व्याख्यान पूरा करते हुए बोलीं, ‘‘...लेकिन मैं भी दूर के रिश्ते में फूलन देवी की कजन लगती हूं... शादी की पहली एनिवर्सरी से पहले ही पति नामक इस प्राणी के सारे कसबल निकाल दिए। वो दिन है और आज का दिन... मजाल है कि रिटायरमेंट के बाद भी मनमानी कर सके। जिधर मैं इशारा करूं, उधर ही देखता है। जितना मैं कहूं, उतना ही बोलता है। जितना मैं चाहूं, उतना ही सुनता है। इस तरह हमारा दांपत्य जीवन 40 साल से हंसी-खुशी गुजर रहा है।’’
बेइज्जती, कपड़ों पर लगी धूल के समान होती है। झाड़ दीजिए, साफ हो जाएगी। हमने भी झाड़ दी। वैसे भी अब क्या बुरा मानना... आदत पड़ चुकी थी। लेकिन श्रीमती की भाषण रूपी सलाह और अनुभवों का सारी महिलाओं पर सकारात्मक असर पड़ा। कुछ ने शाम तक अपने पति दुकान में जमा कर जाने का वादा भी कर लिया। तभी एक महिला पूछ बैठी, ‘‘क्या मेरी सास की भी रिपेअरिंग हो सकती है?’’
श्रीमती जवाब जी दे पातीं, उसके पहले ही कुछ और प्रश्न दुकान के काउंटर पर बिखर गए, जैसे-
- मुझे अपनी ननद की भी सर्विस करानी है?
- क्या पति के साथ ससुर और देवर को भी दिया जा सकता है?
- देवरानी-जेठानी का कितना शुल्क होगा?
दुकान के कार्य क्षेत्र का इतनी तेजी से विस्तार हो जाएगा, यह बात कल्पना से परे थी। हमने तो एक और दुकान खोलने तक का सोच डाला - ‘ससुराल सर्विसिंग सेंटर !’
आप इंतजार करें, हम जब भी अपनी यह नयी दुकान खोलेंगे, आपको जरूर बुलाएंगे। तब तक के लिए आप अपने हसबैंड को मेरी पत्नी जी की दुकान पर ला सकती हैं, हम आपको डिस्काउंट दिलाएंगे।