दीपा के अतीत ने 32 साल बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था कि अपने बेटे की शादी दीपा की बेटी से करूं या नहीं। उसकी कहानी जान कर क्या उसे एक मौका देना उचित नहीं था?

दीपा के अतीत ने 32 साल बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था कि अपने बेटे की शादी दीपा की बेटी से करूं या नहीं। उसकी कहानी जान कर क्या उसे एक मौका देना उचित नहीं था?

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दीपा के अतीत ने 32 साल बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था कि अपने बेटे की शादी दीपा की बेटी से करूं या नहीं। उसकी कहानी जान कर क्या उसे एक मौका देना उचित नहीं था?

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आज मेरी शादी की 30वीं सालगिरह थी। मेरा बेटा अर्जुन भी बंगलुरु से इसे सेलिब्रेट करने आया। उसे बंगलुरू में नौकरी करते 2 साल हो गए। उसकी शादी नहीं हुई थी। हम पति-पत्नी की राय थी कि कोई ढंग की लड़की मिलेगी, तो उसकी शादी कर देंगे। पिछले साल अर्जुन से 2 साल छोटी बेटी श्यामली की शादी की थी। हमारा सोचना है कि शादी-ब्याह सही समय पर कर देना चाहिए। श्यामली एमएससी कर रही थी, तभी एक अच्छा रिश्ता आया। श्यामली तब शादी के लिए तैयार नहीं थी। वह अपना कैरिअर बनाना चाहती थी। मैंने समझाया, ‘‘अगले साल तुम्हारी पाेस्ट ग्रेजुएशन पूरी हो जाएगी। नौकरी करनी है तो कोई अच्छा स्कूल जॉइन कर लेना।’’ थोड़े नानुकुर के बाद वह तैयार हो गयी। आज वह एक नामीगिरामी स्कूल में अध्यापन का काम कर रही है ओैर अपने काम से खुश है।

इस समारोह में मैंने कुछ खास लाेगों को ही बुलाया था। आयोजन खत्म होने के बाद मेरी एक चचेरी ननद ने एक रिश्ते का जिक्र किया, ‘‘लड़की बंगलुरु में नौकरी करती है। उसने कानपुर से बीटेक किया है,’’ वह बोली। सुन कर अच्छा लगा। अर्जुन भी वहीं सेटल था। दोनों साथ काम करेंगे, तो घर-गृहस्थी का आर्थिक बोझ आसानी से उठा सकेंगे। ननद ने लड़की का फोटो मोबाइल के जरिए दिखाया। लड़की सुंदर थी।

समारोह से निवृत होेने के बाद मैंने मौका देख कर एक दिन अपनी चचेरी ननद से संपर्क किया।

‘‘लड़की की मां ही सब कुछ है,’’ सुन कर मुझे अफसोस हुआ।

‘‘पिता को हुआ क्या था?’’ मैंने सवाल किया।

‘‘अरे, वह नहीं जो आप समझ रही हैं। उसकी मां तलाकशुदा है।’’

सुन कर मुझे मायूसी हुई। उससे उबरी, तो पूछा, ‘‘आप लड़की की मां को कब से जानती हैं। उससे आपका रिश्ता क्या है?’’

‘‘लड़की की मां मेरे पड़ोस में रहती है। अच्छी जान-पहचान है। काफी मिलनसार महिला है। यहीं एक प्राइवेट बैंक में नौकरी करती है।’’

बाकी सब तो ठीक था, पर मुझे उसकी मां का तलाकशुदा होना अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने अपने मन की बात ननद से कही।

‘‘भाभी, जमाना बदल रहा है। नहीं निभा होगा तो हाे गयी होगी अलग। रोज-रोज घुट कर जीने से अच्छा है अलग हो जाएं,’’ ननद ने जमीनी हकीकत से अवगत कराया।

‘‘तो भी क्या ऐसे परिवार से रिश्ता जोड़ना ठीक रहेगा। लाेग तरह-तरह की बातें करेंगे,’’ मैंने कहा।

‘‘कोई कुछ नहीं कहेगा। किसके पास समय है। वैसे आप अपनी तसल्ली के लिए लड़की की मां से हर तरीके से बात कर लें। जब संतुष्ट हों, तब रिश्ते के बारे में सोचिए। सिर्फ तलाक की वजह से रिश्ता ठुकराना मेरी समझ में उचित नहीं है,’’ ननद ने दो टूक कह कर अपनी बात समाप्त कर दी।

एक तरफ लड़की की पढ़ाई-लिखाई, अच्छी नौकरी का लोभ था, तो दूसरी तरफ उसके परिवार को ले कर मन में तरह-तरह की दुश्चिंता। अंततः मैंने अपने पति राजन से इसका जिक्र किया।

‘‘हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जरूरी नहीं कि जैसा तुम सोचती हो, वैसा ही हो। तलाक लेने का मतलब यह नहीं कि उस महिला का चरित्र संदिग्ध हो गया। तमाम ऐसे पुरुष हैं, जिनकी नजरों में औरतों की कोई अहमियत नहीं होती। वे अपनी तरह से जीना पसंद करते है। शराब पीना, परस्त्री संबंध, मारना-पीटना ऐसी तमाम हरकतें हैं, जो अपनी बीवी के साथ करते हैं। ज्यादातर महिलाएं इसे अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लेती हैं, वहीं कुछ के लिए तलाक ही सही विकल्प होता है।’’

राजन ने गलत नहीं कहा। मैंने एक दिन लड़की की मां को बुलाया। बातचीत से वह सुलझी हुई लगी। ना जाने क्यों मुझे उसका चेहरा जाना-पहचाना सा लगा। हो सकता हो, लखनऊ में ही कहीं देखा हो? उन्हाेंने अपना नाम दीपा बताया। उसके पति के बारे में जानना चाहा, तो कहने लगी, ‘‘वे एक बिजनेसमैन हैं। इससे ज्यादा मैं उनके बारे में कुछ भी बताना मुनासिब नहीं समझूंगी।’’

‘‘वे रहते कहां हैं? आपका मायका कहां है?’’ मैंने फिर भी पूछ ही लिया।

‘‘जी, मैं बनारस की रहनेवाली हूं। मेरे एक्स पति भी वहीं रहते हैं।’’

अब तो मुझे पूरा भरोसा हो गया कि यह वही महिला है, जिसके बारे में मैं सोच रही थी। फिर भी तसल्ली के लिए सब कुछ उसी से पूछना मुनासिब होगा। पर क्या अभी उचित होगा? मुझे लगा नहीं। जब तक शादी के लिए सबकी राय एक नहीं बनती, तब तक दीपा के अतीत को कुरेदना उचित नहीं होगा। मैंने दूसरी बात छेड़ी।

‘‘क्या वे अपनी बेटी से मिलने आते हैं?’’

मेरे इस सवाल पर वह किंचित भरे मन से बोली, ‘‘नहीं।’’

मुझे आश्चर्य हुआ। कैसा पिता है, जिसे अपनी बेटी से लगाव नहीं। चाय पीने के बाद मैंने कहा, ‘‘मुझे आपकी बेटी पसंद है। रही शादी की बात, तो मैं इसके बारे में अपने पति और बेटे से बात करूंगी। बिना उनकी रजामंदी के मैं कोई निर्णय नहीं लेना चाहूंगी।’’

वह खुश हो गयी। उसके जाने के बाद मैं 32 साल पुरानी उस घटना पर गौर करने लगी, जो मेरे सामने फिर से सजीव हो उठी। बात उन दिनों थी, जब मैं बनारस के एक मोहल्ले में बतौर किरायेदार रहती थी। मेरी उम्र यही कोई 22 साल की होगी। मेरे हिसाब से दीपा भी इसी के आसपास थी। तब मैं कुंअारी थी और मेरी शादी की बातचीत चल रही थी। एक रोज मैं अपने मकान के एक ओर लगे नल से पानी भर रही थी, तभी एक सुंदर सी महिला तेजी से निकल कर आंगन में आयी। वह हड़बड़ायी हुई थी और उसने छत की सीढि़यों का रास्ता पूछा। मैंने एक नजर उस पर डाली, फिर सीढ़ीे की ओर इशारा किया। वह लगभग भागती हुई सीढि़यों पर चढ़ी, फिर लापता हो गयी। बाद में पता चला कि वह साथवाले दूसरे मकान की छत पर उतरी, फिर नीचे जानेवाली सीढि़यों के माध्यम से पिछवाड़े से निकल कर कहीं चली गयी। उसके जाने के बाद उसकी चर्चा जोर पकड़ने लगी। जिन किरायेदारों ने यह नजारा देखा, उनके लिए यह जिज्ञासा का विषय बन गया। मैं भी उसके बारे में जानने को उत्सुक थी। कौन है, कहां से आयी? भागने की वजह क्या थी? दरअसल हम जिस मकान में रहते थे, वह काफी बड़ा था। मकान के बीच में आंगन था। अांगन शेष किरायदारों के बीच का साझा रास्ता था, जिससे हो कर हम सब बाहर या छत पर जाते थे। सबके घर का बरामदा आंगन में ही खुलता था, सिर्फ उस मकान को छोड़ कर जिसका सिर्फ एक दरवाजा अांगन से जुड़ा था, जिससे निकल कर वह महिला अांगन में आयी। उस कमरे में रहनेवाले एकमात्र किरायेदार से हम सबका कोई संबंध ना था। वह मकान के सामनेवाले हिस्से से आता-जाता था, वहीं दूसरे किरायेदार पीछे के रास्ते से।

मकान के बाहर कुछ लोग शोर मचा रहे थे। मेरी मां बाहर निकल कर मकान के सामनेवाले मेन हिस्से की ओर गयी। वहां मोहल्ले के काफी लाेग जमा थे। मोहल्ले के कुछ दबंग किस्म के लाेग मकान मालिक को गालियां दे रहे थे। वे मकान में रहनेवाले किरायेदार को बाहर निकालने का दबाव बना रहे थे। लोगों से पता चला कि एक आदमी भी उनके साथ खड़ा था, जो उस भागनेवाली महिला का पति था। मां आधे घंटे बाद आयीं, तब सारे वाकये से हम सबको परिचित कराया। कहने लगीं, ‘‘भागनेवाली महिला का प्रेमी था यह किरायेदार। वह महिला अपने प्रेमी से मिलने आयी थी। इस बीच उसके पति को खबर लगी, तो पीछा करते हुए यहां तक आ पहुंचा।’’ अब मेरी समझ में सारा माजरा आया।

वह महिला वाकई सुंदर थी, जिसकी सुंदरता की चर्चा मोहल्ले में कुछ दिनों तक होती रही। उसके बाद बात आयी-गयी हो गयी। सालभर बाद मेरी शादी हो गयी और मैंने उस घटना को हमेशा के लिए भुला दिया। तो क्या यह वही महिला है? समय के साथ चेहरे पर बदलाव आ जाता है। इसलिए यह कहना कि दीपा ही वही महिला है, थाेड़ी जल्दबाजी होगी। तब कैसे पता चले कि दीपा वह महिला नहीं है। अगर दीपा वही महिला साबित हो गयी, तब तो शादी का सवाल ही नहीं उठेगा।

इस बीच अर्जुन ने खबर दी कि वह उस लड़की से मिला है, ‘‘उसका नाम नम्रता है। बातचीत से ठीकठाक लगी। उसे जब मैंने बतलाया कि मेरी मां तुम्हारी मां को जानती है, तो वह खुश हो गयी। हम दोनाें ने अॉफिस से निकलने के बाद एक रेस्टोरेंट में काॅफी भी पी। नम्रता बहुत सुंदर लड़की है।’’

सुंदर शब्द ने मुझे धर्मसंकट में डाल दिया। अर्जुन ने नम्रता से शादी की जिद की, तब क्या करूंगी। तलाक तक तो ठीक था, पर जब बात चरित्र पर आएगी, तब क्या होगा? मुझे अपने आप पर अफसोस होने लगा कि क्यों इस मामले में जल्दबाजी दिखलायी? ना अर्जुन को लड़की की फोटो और पता बतलाती, ना ही वह एक कदम आगे बढ़ता। मैंने राजन से कहा, तो वे बड़े निश्चिंत भाव से बोले, ‘‘इसके लिए ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। अर्जुन ऐसा कुछ नहीं करेगा। हां, तुम लड़की की मां को बुला कर चाहो तो अपनी शंका का समाधान कर सकती हो। मेरे हिसाब से ऐसा कुछ नहीं होगा, जो अनुचित हो। मां का अच्छा कैरिअर है। बेटी को उच्च शिक्षा दिलवायी है। यह सब अच्छे संस्कारों से ही संभव है।’’

मुझे राजन की बात जंची। मौका देख कर दीपा को दोबारा बुलवाया।

‘‘क्या मैं आपकी निजी जिंदगी के बारे में जान सकती हूं?’’ पहले तो वह थोड़ा हिचकी, फिर तैयार हो गयी।

‘‘मेरे मन में आपको ले कर कुछ शंकाएं हैं, जिसका समाधान हो जाए, तो इस रिश्ते के लिए मुझे कोई एतराज नहीं होगा।’’

‘‘जी, पूछिए। मैं भी चाहूंगी कि कहीं कोई कसर ना रह जाए, जिसके लिए हम दोनों काे पछताना पड़े।’’

मैंने उस घटना का जिक्र किया। कुछ क्षण के लिए वह कहीं खो गयी। जब उबरी, तो उसकी आंखों के दोनों कोर भीगे हुए थे। एक स्त्री होने के नाते मैं भी भावुक हाे गयी।

‘‘मैंने सोचा था कि वक्त के साथ मेरा अतीत भी दफन हो चुका होगा, पर ऐसा हुआ नहीं। आपके रूप में फिर से जिंदा हो गया। यह सच है कि मैं वही अभागिन स्त्री हूं, जिसके बारे में आप जानती हैं। वह मेरा प्रेमी था। पर यह सच नहीं था कि मैं शादी के बाद भी उससे मिलती थी। उस दिन उससे मिलने की सिर्फ यही वजह थी कि उसके पास हमारे साथ बिताए कुछ पलों की तसवीरें थीं, जिन्हें मैंने लेने का प्रयास किया। पता नहीं कैसे मेरे पति ने मुझे रिक्शे से अकेले जाते हुए देख लिया। उन्होंने मेरा पीछा किया और  वे वहां तक आ पहुंचे। उसके बाद जो हुआ, वह आपकाे तो पता ही है,’’ उसने कहना जारी रखा, ‘‘शादी के 2 साल किसी तरह से गुजारे। नम्रता उन्हीं की बेटी थी, मगर उन्होंने कभी भी उसे नहीं स्वीकारा। वे बार-बार यही कहते कि यह मेरी बेटी नहीं है। अंततः जब उनकी आदतों में कोई बदलाव नहीं आया, तो एक दिन आजिज आ कर मैंने कहा, ‘‘क्या स्त्री का प्रेम करना गुनाह है? शादी के पहले आपने भी किया होगा? आपका प्रेम क्षम्य, वहीं मेरा प्रेम व्यभिचार। सिर्फ इसलिए कि मैं एक स्त्री हूं?’’

‘तुम्हारी वजह से आज भी मैं सामाजिक रुसवाइयाें से मुक्त नहीं हो पाया। कोई बात छुपती नहीं। सबको पता चल चुका है कि तुम शादी के बाद भी अपने प्रेमी से मिलती रही,’’ मेरे पति बोले।

‘‘उसके लिए आप जिम्मेदार हैं। अगर आप खुले दिमाग के होते, तो क्या जरूरत थी मुझे उससे फोटो लेने की। साथ फोटो खिंचवा लेना एक आम बात है। लड़का-लड़की एक साथ पढ़ रहे हैं। यदि उनके बीच एक अच्छी दोस्ती बन जाती है, तो साथ में फोटो खिंचवा लेने से कौन सा पहाड़ टूट पड़ता है। मगर नहीं, मन में आपको ले कर एक भय था, इसलिए उसके पास गयी थी। आपने तो सोचा कि मैं उसके पास प्रेमालाप करने जा रही हूं।’’

‘‘कौन देख रहा है कि अंदर तुम क्या कर रही हो। मैं चाह कर भी उस पल को भुला नहीं पाता।’’

‘‘इसका इलाज क्या है ?’’

‘‘तलाक।’’ यही उनका निर्णय था। मैंने भी इसे बेहतर फैसला समझा। तब से आज तक मैंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।’’

‘‘दूसरी शादी का खयाल नहीं आया।’’

‘‘पता नहीं क्यों मेरा मन नहीं हुआ। सोचा, एक लड़की है। उसे ही अपने जीवन का मकसद बनाऊंगी। उसे अच्छी परवरिश दूंगी, शिक्षा दूंगी।’’

‘‘कल को आपकी बेटी भी आपके पदचिह्नों पर चले, तब?’’

‘‘मैंने कौन सा गलत रास्ता चुना था? प्रेम किया, जो किन्हीं कारणों से शादी में तब्दील ना हाे सका। इसमें बुरा क्या है। जरूरी नहीं कि आप जिससे प्रेम करते हैं, उससे विवाह भी हो? मेरी गलती यह थी कि अपने प्रेमी से संपर्क करके उससे अपना अतीत मांगा, जो मेरे पति के शक का कारण बना। इसमें मैं अपने पति को दोष नहीं दूंगी, बल्कि मुझमें आत्मविश्वास की कमी थी। ना जाती उसके पास। जो होता देखा जाता। कल यदि मेरे पति कोे मेरे प्रेमी से पता चलता कि मैं उससे प्रेम करती थी, तो मैं निडर हो कर कहती ‘हां करती थी।’ और हां, आप यह मत समझिएगा कि मेरी बेटी नहीं जानती है। मैंने उसे सब बता दिया है। जमाने की ऊंच-नीच भी समझा दी है। मुझे उस पर पूरा भरोसा है कि वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिसके लिए उसे बाद में पछताना पड़े। उसमें मुझे ले कर कोई हीन भावना नहीं है।’’

दीपा की बातों से लगा कि वह बेकसूर स्त्री थी। वह उठ कर जाने लगी। मैंने उसे दरवाजे तक छोड़ा। इतना सब कुछ कहने-सुनने के बाद उसके चेहरे पर कहीं भी अपराधबोध के शिकन ना थे। यह मुझे अच्छा लगा। एक महीना गुजर गया। मैंने इस शादी के बारे में सोचना छोड़ दिया था।

एक दिन अर्जुन का फोन आया, ‘‘मां, मुझे नम्रता पसंद है। मैं उसी से शादी करना चाहता हूं।’’

सुन कर मुझे तीव्र आघात लगा। उस समय तो कुछ नहीं बोली, मगर जब रात को राजन ऑफिस से आए, तो अर्जुन की पसंदगी के बारे में जिक्र किया।

‘‘दिक्कत क्या है। लड़की उच्च शिक्षा प्राप्त है। अच्छी नौकरी में है। मुझे तो उसमें कुछ खराबी नजर नहीं आ रही।’’

‘‘मैं उसकी मां का अतीत पचा नहीं पा रही हूं।’’

‘‘अतीत के बारे में सोच कर क्या हासिल हो जाएगा। जीना तो है हमें वर्तमान में। वर्तमान यही कहता है कि उस लड़की में कोई खराबी नहीं है। अगर उसकी मां चरित्रहीन होती, तो दूसरी शादी रचा कर ऐश करती। मगर नहीं, उसने अपनी जवानी अपनी बेटी के भविष्य के लिए कुर्बान कर दी। इससे बड़ा त्याग कुछ नहीं हो सकता,’’ राजन का तर्क न्यायसंगत था।

‘‘इसका मतलब आपको यह शादी पसंद है?’’

‘‘ज्यादा खोजबीन का जमाना गया। आज के बच्चे अपने आर्थिक भविष्य के बारे में ज्यादा सोचते है। अर्जुन ने उसकी शक्ल नहीं, बल्कि अपना आर्थिक भविष्य देखा होगा। आज के बच्चे भावनाओं में नहीं बहते। ऐसा ही लड़की ने भी सोचा हाेगा?’’

‘ऐसे बच्चों के आगे हम कहां टिकते हैं? कल को बेटे-बहू काे लगेगा कि हम बेकार हैं, तब क्या हाेगा?’’

‘‘यह तुम क्या सोचने लगी?’’

‘‘मैं गलत नहीं सोच रही। आप ही तो कह रहे हैं कि आज के बच्चे भावनाओं में नहीं बहते। ना भावना रहेगी, ना वे हमें पूछेंगे,’’ कह कर मैं निराशा में डूब गयी।

‘‘उसकी चिंता मत करो। कल की कौन जानता है। और हां, दीपा के अतीत का जिक्र कभी भी अर्जुन के सामने मत करना।’’

मैंने भी मन बना लिया कि ऐसा ही होगा। राजन ने कुछ सोच कर ऐसा कहा होगा।

बच्चों की खुशी में ही अपनी खुशी है। सो दीपा को फोन करके बुलाया। वह भागी-भागी आयी। जैसे ही मैंने शादी की रजामंदी की खबर दी, उसकी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। मेरा हाथ अपने हाथ में लेती हुई बोली, ‘‘आपने मेरी बेटी का हाथ थाम कर मुझे एक बड़ी चिंता से उबार दिया। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी नम्रता यहां सुखी रहेगी।’’ मैंने दीपा को गले लगा लिया।