“क्या मतलब सुनंदा मैम?” काश्वी को उत्सुकता हुई। “जब कनिका और निखिल यहां गिटार सीखते थे तो मेरी कनिका से अच्छी दोस्ती हो गयी थी। कनिका थी संपन्न घर की फिजूलखर्च लड़की और निखिल आर्थिक रूप से थोड़े कमजोर घर का लड़का। कनिका और निखिल का रिश्ता आगे बढ़ाने में कनिका की बुआ की बहुत बड़ी भूमिका थी। जाने

“क्या मतलब सुनंदा मैम?” काश्वी को उत्सुकता हुई। “जब कनिका और निखिल यहां गिटार सीखते थे तो मेरी कनिका से अच्छी दोस्ती हो गयी थी। कनिका थी संपन्न घर की फिजूलखर्च लड़की और निखिल आर्थिक रूप से थोड़े कमजोर घर का लड़का। कनिका और निखिल का रिश्ता आगे बढ़ाने में कनिका की बुआ की बहुत बड़ी भूमिका थी। जाने

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“क्या मतलब सुनंदा मैम?” काश्वी को उत्सुकता हुई। “जब कनिका और निखिल यहां गिटार सीखते थे तो मेरी कनिका से अच्छी दोस्ती हो गयी थी। कनिका थी संपन्न घर की फिजूलखर्च लड़की और निखिल आर्थिक रूप से थोड़े कमजोर घर का लड़का। कनिका और निखिल का रिश्ता आगे बढ़ाने में कनिका की बुआ की बहुत बड़ी भूमिका थी। जाने

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“क्या मतलब सुनंदा मैम?” काश्वी को उत्सुकता हुई।

“जब कनिका और निखिल यहां गिटार सीखते थे तो मेरी कनिका से अच्छी दोस्ती हो गयी थी। कनिका थी संपन्न घर की फिजूलखर्च लड़की और निखिल आर्थिक रूप से थोड़े कमजोर घर का लड़का। कनिका और निखिल का रिश्ता आगे बढ़ाने में कनिका की बुआ की बहुत बड़ी भूमिका थी। जाने क्यों कनिका की बुआ 22 वर्ष की कनिका को घुमा-फिरा कर कैरिअर पर ध्यान देने की सलाह देने के बदले जल्द से जल्द निखिल से शादी करने को उकसाती रहती थीं,” सुनंदा ने विस्तार से बताया।

“पर कनिका और निखिल तो पहले से ही कॉलेज में साथ में पढ़ते थे,” काश्वी की उत्सुकता बढ़ रही थी।

“कॉलेज में दोनों की बस थोड़ी ही जान-पहचान थी। असली प्रगाढ़ता तो इसी म्यूजिक इंस्टिट्यूट में आ कर शुरू हुई, वो भी कनिका की बुआ की शह पर !” सुनंदा झल्लायी हुई थी।

“ऐसा क्यों लगा आपको?” काश्वी हतप्रभ थी।

“अरे, यहां से थोड़ी दूर पर ही तो कनिका की बुआ का घर है, उसकी बुआ खुद आ कर दोनों को अपने घर ले जाती थीं। इस म्यूजिक इंस्टिट्यूट में इतना एकांत कहां ! कनिका और निखिल तो बुआ के घर पर ही मिलते थे। कनिका के फूफा जी बिजनेस में व्यस्त रहते थे और उनके दोनों बच्चे यहां रहते नहीं थे। बुआ घर पर अकेले ही तो रहती थीं। वैसे झूठ क्यों बोलूं, मैं खुद उस समय कनिका की बहुत अच्छी सहेली थी। कनिका का हर कदम मुझे सही लगता था।

“कनिका के पिता थे नहीं, कनिका की सीधी-सरल मम्मी पूजा-पाठ में व्यस्त रहती थीं। कनिका के दोनों भाई और भाभी अपनी नौकरी में व्यस्त थे। कनिका अपनी बुआ से बहुत ज्यादा प्रभावित थी, वह कनिका की हर बात में हां में हां जो मिलाती थीं। निखिल से शादी होने के बाद कनिका मुझसे एक बार 10 और एक बार 15 हजार रुपए ले गयी। पैसा वापस मांगने पर बहाना बना देती है और ससुराल की तंगी का रोना रोने लगती है।‌ कनिका तो अब नौकरी कर रही है, फिर भी मेरे पैसे नहीं लौटा रही है। मेरा तो कनिका से बात करने का मन भी नहीं होता है, पर क्या करूं अपने 25 हजार वापस भी तो लेने हैं,” सुनंदा का आक्रोश बाहर आ रहा था।

“जब से कनिका मेरे पैसे लौटाने में आनाकानी कर रही है, तब से मैं भी बहुत गहराई में जा कर सोचने लगी कि आखिर यह सब हुआ क्यों? कनिका ने बिना अपने कैरिअर में सेटल हुए एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में शादी की, इसके लिए काफी हद तक उसकी रंजना बुआ जिम्मेदार हैं। कनिका की कम उम्र और अपरिपक्वता का उपयोग उन्होंने अपनी कुंठा मिटाने के लिए किया,” सुनंदा ने बोलना जारी रखा।

“अपनी कुंठा मिटाने के लिए?” काश्वी आश्चर्यचकित थी।

“मैंने कहा ना कि मेरे पैसे फंसे तो मैं सारी बातों की गहराई में उतर गयी। कनिका ने मुझे बताया था कि उसकी बुआ की बेटी का पति उसे छोड़ कर किसी और से शादी करना चाहता है, पर उनकी बेटी तलाक के लिए राजी नहीं है। वो जैसे-तैसे अपने बच्चों के साथ पति के घर में रह रही है। कनिका की बुआ की बेटी के साथ गलत हुआ तो किसी और की बेटी के साथ भी कुछ गलत हो तो अपनी कुंठा कम हो जाए। पता नहीं, मुझे तो यही समझ में आया,” सुनंदा बिना रुके बोले जा रही थी।

“सुनंदा, तुमने ये सारी बातें विस्तार से कभी कनिका के घरवालों को बताने की नहीं सोची,” काश्वी हैरान थी।

“मैंने बताया ना आपको कि कनिका पहले मेरी करीबी सहेली थी। अभी इसलिए नहीं बताया कि मुझे कनिका से 25 हजार वापस चाहिए थे, अगर कनिका नाराज हो जाती तो ! आपको पता ही होगा कि कनिका की बड़ी भाभी के घर छोड़ कर जाने के बाद से कनिका की मायके में ज्यादा चलती नहीं है तो मेरे पैसे कौन देता? जहां तक बुआ की बात है, उनका व्यवहार इतना मीठा है कि कनिका के घरवाले मेरी बात पर भरोसा ही नहीं करते।

“दो दिन पहले मैंने कनिका की फेसबुक पर तसवीरें देखीं, उसने अपनी नयी सहेलियों को महंगे रेस्टोरेंट में बर्थडे पार्टी दी। मेरे तो तन-बदन में आग लग गयी, मेरा उधार लौटाया नहीं और पैसे उड़ा रही है। आज आप खुद यहां आयीं और कनिका का नाम लिया तो मैं सब कुछ बताने से अपने आपको रोक नहीं पायी। और तो और आपकी बुआ जी कनिका को आपकी जेठानी के खिलाफ भड़काती रहतीं थीं, अब शायद आपकी बारी है,” सुनंदा का गुस्सा सातवें आसमान पर था।

“मेरी जेठानी ! ओह उन्हें तो मैं भूल ही गयी थी। अब याद आया कि वह तितली के टैटू वाला हाथ मैंने कहां देखा था, मेरी जेठानी अलंकृता के हाथ में! असल में तो उन्हें कभी देखा नहीं था, रजत भैया के कमरे में उनकी शादी और किसी हॉलीडे ट्रिप की तसवीर में ही उन्हें देखा था,” काश्वी के मन में उथल-पुथल मची हुई थी।
गिटार क्लासेज की जानकारी लेने गयी काश्वी के इस नयी जानकारी ने तो होश ही उड़ा दिए थे। रंजना बुआ का घर इसी इंस्टिट्यूट के पास ही था। शाम हो रही थी, काश्वी सीधे घर के लिए निकल गयी।

काश्वी सीधे ऊपर की मंजिल पर बने रजत भैया के कमरे में गयी, भैया अकसर ऑफिस टूर पर रहते थे। काश्वी इस कमरे में एक-दो बार ही आयी थी। कमरे में जा कर उसने अलंकृता भाभी की तसवीर ध्यान से देखी, ये तो अलका ही थीं। पहले वह क्यों नहीं पहचान पायी? कैसे पहचानती, भाभी से कभी मिली जो नहीं थी। पहली तसवीर में भाभी दुलहन के मेकअप में थीं और दूसरी में वे काला चश्मा और बड़ी सी टोपी लगाए हुए थीं। दूसरी तसवीर में तितली वाला टैटू साफ दिख रहा था।

अब समझ में आया कि उस दिन बाजार में रंजना बुआ के चेहरे का रंग क्यों उड़ गया था। पर भाभी अलंकृता से अलका कब बन गयीं?

मम्मी जी को ऐसे कुछ बताना ठीक नहीं होगा, उन्हें एक बार अवसाद की समस्या हो चुकी है। ऋषभ दो दिन बाद घर वापस लौटेंगे, फोन पर सारी बात करना उचित नहीं होगा। रंजना बुआ ने कनिका के भविष्य के साथ यों खिलवाड़ किया, वे अलंकृता भाभी की दिल्ली में नौकरी दिलवाने में भी मदद कर रही थीं?

काश्वी ने श्रुति को फोन किया, श्रुति घर में आराम से बैठ कर टीवी देख रही थी। काश्वी ने उसे संगीत संस्थान के पूरे घटनाक्रम की जानकारी दे दी ।

“ये लो काश्वी, मेरी कजिन रिया दी से बात कर लो,” श्रुति ने अगले दिन ऑफिस में काश्वी को फोन थमा दिया।

“हेलो रिया दी, मुझे आपकी फ्रेंड अलका के बारे में जानना है। उनका नाम अलंकृता है ना?”

“हां काश्वी ! उसका नाम अलंकृता है। मुझे वो नाम थोड़ा भारी-भरकम सा लगता है, इसलिए मैं उसे अलका बुलाती हूं। तुम उसकी देवरानी हो ना ! तुम्हें पता ही होगा कि अलका एक महत्वाकांक्षी लड़की है और उसका पति रजत पुराने विचारों का इंसान हैं।”

“रिया दी, मैं उन आंटी के बारे में जानना चाहती हूं, जिन्होंने अलंकृता भाभी को नौकरी दिलवाने में मदद की थी।”

“काश्वी, मैं उनसे मिली तो नहीं हूं, पर अलका के मुंह से यह सुना था कि वे उसे नौकरी दिलाने में उसकी बहुत मदद कर कर रही हैं।”

“और भाभी के घर वाले इस बारे में क्या सोचते हैं?”

“काश्वी, अलका का जन्म कई वर्षों की प्रतीक्षा के बाद हुआ था, इसलिए उसके माता-पिता को अलका की इच्छा के सिवा और कुछ नजर नहीं आता है। अलका की मां उसके हर कदम को सही ठहराती हैं। अब जब अलका काफी समय से मायके में रह रही थी तो उसके पापा उसे उसकी गलतियां बताने लग गए थे, इसलिए उसने दिल्ली जाने का निर्णय ले लिया,” रिया दी ने सब स्पष्ट कर दिया था।

मम्मी जी को अभी कुछ भी बताने को ऋषभ ने मना किया था। ऋषभ और काश्वी अपने बेडरूम में बैठ कर पूरे घटनाक्रम पर विचार कर रहे थे।

“काश्वी, मुझे यह सोच-सोच कर गुस्सा आ रहा है कि रंजना बुआ ने पहले कनिका को राह से भटकाया और अब भैया-भाभी के अलगाव को हवा दे रही हैं।”

“ऋषभ, मुझे पिछली बातें विस्तार से बताओ।”
“कनिका का कैरिअर पर ध्यान देने के बदले जल्दबाजी में शादी कर लेना मम्मी को अंदर तक आहत कर गया था। शादी के बाद वही हुआ, जिसका डर था। कनिका ससुराल में सामंजस्य नहीं बिठा पा रही थी, वहां पर जिम्मेदारियां बहुत थीं और सुख-सुविधाएं बहुत कम ! आए दिन कनिका यहां आ कर बैठ जाती और हमसे अपने शौक पूरे करवाती। इन्हीं सब बातों को ले कर कनिका और अलंकृता भाभी में कई बार बहस हो जाती थी। यह जानते हुए भी कि कनिका गलत है, मम्मी खुल कर भाभी का पक्ष नहीं ले पाती थीं। भाभी गलत नहीं थीं, पर उनमें थोड़ा अहं था। कनिका से भाभी का बार-बार सख्ती से बात करना रजत भैया को पसंद नहीं आया। इन सब बातों के कारण भैया और भाभी के बीच तनाव रहने लगा। अपनी दो-दो संतानों के वैवाहिक जीवन में मची उथल-पुथल मम्मी सहन नहीं कर पायीं और अवसाद में चली गयीं। यह सब होने के बाद निखिल ने कनिका को सख्ती से समझाया। निखिल के समझाने का तो कनिका पर थोड़ा ही असर हुआ हो, पर मम्मी की हालत देख कर कनिका के व्यवहार में थोड़ा बदलाव जरूर आया,” ऋषभ विस्तार से काश्वी को सारी बात समझाने की कोशिश कर रहा था।

“निखिल कनिका को अपने पैरों पर खड़ा होने को प्रेरित करता था। उसे लगता था कि इससे कनिका व्यस्त भी हो जाएगी और उसके हाथ में अपने लिए कुछ पैसे भी आ जाएंगे,” ऋषभ ने अपनी बात जारी रखी।

“ऋषभ, निखिल और उसके घरवाले पैसों के लालची तो नहीं लगते !”

“नहीं काश्वी ! वे लोग पैसों के लालची नहीं हैं, बस इसी बात की तसल्ली है। पर उस वक्त मम्मी को अवसाद ने घेर लिया था, उन्हें देखभाल की जरूरत थी। भैया ने भाभी से ऑफिस से एक महीने की छुट्टी लेने को कहा। भाभी किसी महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर रहीं थीं, उन्हें छुट्टी मिलना मुश्किल था और वे लेना भी नहीं चाहती थीं। भाभी का कहना था कि सारे फसाद की जड़ कनिका है और उसकी भरपाई वे अपनी नौकरी से छुट्टी ले कर ऑफिस में अपनी छवि बिगाड़ कर क्यों करें।

“सिद्धांतों के हिसाब से भाभी सही थीं, पर भैया को लगने लगा था कि भाभी को मम्मी से कोई लगाव ही नहीं है। यों तो कनिका को भी बुलाया जा सकता था, पर उसको यहां बुलाना किसी को भी ठीक नहीं लगा। भैया ने ये भी चाहा कि कुछ समय के लिए भाभी कैरिअर से ब्रेक ले लें और मम्मी के ठीक होने पर वापस नौकरी पर चली जाएं। भाभी को लगा कि वे कनिका की गलतियों और भैया की अत्यधिक भावुकता का शिकार बन रही हैं। भैया और भाभी के बीच कड़वाहट बढ़ती जा रही थी। ऐसा नहीं था कि मुझे घर और मम्मी की परवाह नहीं थी, पर मैं मम्मी को पूरा समय नहीं दे पा रहा था। आखिरकार बहुत कोशिशों के बाद मैंने अपने मैनेजर को दो महीने के वर्क फ्रॉम होम के लिए मना लिया था। मैं खुश था, क्योंकि मेरे दो महीने घर में रहने से अब भाभी का ऑफिस का काम प्रभावित नहीं होता।

“यह खुशखबरी ले कर मैं रात को घर पहुंचा ही था कि पता चला कि भैया और भाभी के बीच जबर्दस्त झगड़े के बाद भाभी मायके चली गयी हैं। भाभी और उनके घर वालों का कहना था कि किसी और की गलती की भरपाई पत्नी से करवाने वाले ‘इमोशनल फूल’ भैया के साथ उनकी बेटी का रिश्ता निभाना असंभव सा लग रहा है। भैया और मम्मी ने भाभी को कई बार लौट आने को कहा, पर वे नहीं आयीं। वे अपने माता-पिता की लाड़ली इकलौती संतान हैं, मायके में रहना उनके लिए ज्यादा सुविधाजनक था।

“मुझे दो महीने घर से ऑफिस का काम करने का मौका मिला। डेढ़ महीने में मम्मी बिलकुल ठीक हो गयीं। उसके कुछ महीनों बाद हमारी शादी हो गयी, भाभी शादी में भी नहीं आयीं। मुझे तो विश्वास नहीं हो रहा है कि रंजना बुआ ऐसा भी कर सकती हैं, उन्होंने ऐसा क्यों किया?” ऋषभ के चेहरे पर क्रोध और हताशा की तसवीर उभर आयी थी।

“ऋषभ, जैसा कि तुमने बताया था कि पापा जी अपनी खराब सेहत के कारण अपने बिजनेस को ज्यादा आगे बढ़ा नहीं पाए, पर पिछले कई सालों में भैया और तुम्हारी बढ़िया नौकरी लगने से घर का आर्थिक स्तर एकदम से ऊपर उठ गया। रंजना बुआ संपन्न थीं, उन्हें तुम लोगों को अपने से कमतर देखने की आदत थी। अपने भाई के परिवार को ऊपर उठता देखना उन्हें हजम नहीं हुआ,” काश्वी ने अपने सिर को तकिए से टिका लिया था।

“मगर ऐसी सोच क्यों?”

“ऋषभ, अब इस क्यों का क्या उत्तर दूं। लोग अपने परिचितों से, संबंधियों से कोई शिकायत ना होते हुए भी उनकी तरक्की के कारण उनसे ईर्ष्या करते हैं। कुछ लोग दूसरों को ऊंचा उठते देख उन्हें नीचे गिराने के प्रयास में खुद ही नैतिक पतन का शिकार हो जाते हैं। रंजना बुआ जैसे लोगों का प्रयास यह भी होता है कि अगर उनके जीवन में कोई समस्या है तो दूसरों को भी वही समस्या मिले तो उनकी कुंठा कम हो जाए। खुद की बेटी परेशानी में है तो कनिका भी परेशान रहे। रंजना बुआ के बेटे-बहू उनसे मतलब नहीं रखते तो दूसरों को भी अपने बेटे-बहू से खुशियां ना मिल पाएं। ऋषभ, सबसे पहले हमें ये सारी बातें रजत भैया को बतानी चाहिए। मुझे पूरी उम्मीद है कि सारी बातें जानने के बाद वे भाभी से बात करेंगे। भैया और भाभी के बीच उपजे तनाव में उन दोनों से ज्यादा गलती रंजना बुआ और कनिका की है। बुआ का नाम पहले आता है, क्योंकि उन्होंने सब कुछ जानबूझ कर किया है।”

“काश्वी, रंजना बुआ पर आंख बंद करके भरोसा करने और कनिका की हरकतों को नजरअंदाज करने की गलती मम्मी से भी हुई है। भाभी के मम्मी-पापा ने भी पूरी स्थिति पर गहराई से विचार नहीं किया,” ऋषभ ने काश्वी की बात पूरी की।

घर के सब सदस्यों को रंजना बुआ की वास्तविकता का पता चल चुका था। घर के हर मामले में रंजना बुआ की सलाह लेने का परिणाम सामने आ चुका था। सबकी आंखें खुल गयी थीं, पर कनिका को इस रहस्योद्घाटन पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।

“काश्वी, तुमने तो इस घर की सारी उलझनें सुलझा दीं। मेरे और रजत के अलंकृता के घर जा कर बात करने से सारी गलतफहमियां दूर हो गयी हैं और षडयंत्र का पर्दाफाश भी गया है। रजत और अलंकृता फोन पर बातें भी करने लगे हैं। कुछ ही महीनों में अलंकृता दिल्ली वाली नौकरी छोड़ कर यहां आ जाएगी। हम सब मिलजुल कर अपने घर की समस्याएं स्वयं सुलझा सकते हैं, अब और किसी से सलाह लेने की जरूरत नहीं है। उम्मीद है कि कनिका और अलंकृता को भी यह समझ में आ गया होगा,” मम्मी जी ने काश्वी को गले लगा लिया था।
काश्वी पहली बार मम्मी जी के चेहरे पर संतोष की मुसकान देख रही थी। मम्मी जी को देख कर उसे अपनी मां की याद आ गयी। ससुराल के मसले सुलझाते- सुलझाते वह मायके को तो भूल ही गयी थी। समय मिलते ही काश्वी ने मां को वीडियो कॉल लगाया, “अरे मां ! आप गांव कब पहुंच गयीं? कुछ परेशानी है क्या?”

“परेशानी थी, पर सुनीता बुआ ने उसे हल कर दिया है। गांव में हमारी जमीन के साथ वाली जमीन पर मकान बनना शुरू हुआ तो उन लोगों ने अपनी जमीन से आगे बढ़ कर हमारी जमीन का कुछ हिस्सा ले कर दीवार बनानी शुरू कर दी। हमारे पास खबर पहुंची तो मैं और तुम्हारे पापा गांव आ गए। हमने हमारी जमीन छोड़ने को कहा तो वो लोग आनाकानी करने लगे। तुम्हारे पापा ने सुनीता बुआ को फोन किया, फूफा जी के दोस्त विनय अंकल पुलिस में अच्छे पद पर हैं ना ! सुनीता बुआ और फूफा जी तुरंत गांव आ गए। हमारे गांव वाले पड़ोसी थोड़े दबंग हैं, पर सुनीता बुआ ने उनका पूरी हिम्मत से सामना किया। विनय अंकल की सूझबूझ से सारा मामला शांति से सुलझ गया है। अभी हम सब गांव में हैं, पड़ोसियों की दीवार बनने तक यहीं रहेंगे,” मां ने पूरी बात बतायी।

“बिन्नी, तुम किसी बात की चिंता ना करना ! हम हैं ना तुम्हारे मां और पापा के साथ। किंशुक को अभी कुछ ना बताना, उसकी पढ़ाई में व्यवधान आ जाएगा,” सुनीता बुआ वीडियो कॉल पर आ गयी थीं।

काश्वी जड़वत सी हो गयी थी। अचानक पास में रखी रंजना बुआ की दी हुई कीमती साड़ी काश्वी का हाथ लगने से गिर गयी। साड़ी की तह खुलते ही उसके इंद्रधनुषी रंग खुल कर सामने आ गए थे।

कुछ ऐसा ही तो हुआ था काश्वी के साथ ! रिश्तों की परतें खुल गयी थीं और जीवन के अनोखे रंग सामने आ गए थे।