महिला और पुरुष दोनों के लिए बदलने होंगे बराबरी के मायने
Despite advancements, gender inequality persists in India, with women disproportionately shouldering unpaid domestic labor, impacting their career opportunities. Policy gaps, particularly the absence of mandatory paternity leave in the private sector, and deeply ingrained societal expectations further exacerbate this imbalance. True equality requires the equal sharing of domestic responsibilities and opportunities in both home and professional spheres.
Despite advancements, gender inequality persists in India, with women disproportionately shouldering unpaid domestic labor, impacting their career opportunities. Policy gaps, particularly the absence of mandatory paternity leave in the private sector, and deeply ingrained societal expectations further exacerbate this imbalance. True equality requires the equal sharing of domestic responsibilities and opportunities in both home and professional spheres.
Despite advancements, gender inequality persists in India, with women disproportionately shouldering unpaid domestic labor, impacting their career opportunities. Policy gaps, particularly the absence of mandatory paternity leave in the private sector, and deeply ingrained societal expectations further exacerbate this imbalance. True equality requires the equal sharing of domestic responsibilities and opportunities in both home and professional spheres.
पिछले महीने ही उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कानपुर की छत्रपति शाहू जी महाराज यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में एक छात्रा से कहा - "आईएएस अफसर बनो या टीचर, पहले एक्सपर्ट मदर बनो। घर में बना खाना बनाना सबको आना चाहिए।" यह बयान किसी गांव की चौपाल का नहीं, बल्कि 2026 के एक विश्वविद्यालय के मंच का है, जहां हजारों डिग्रीधारी युवतियां बैठी थीं। और यही वह क्षण है जो बताता है कि हम बराबरी की जिस लड़ाई को "जीती हुई" मान बैठे हैं, वह अब भी कितनी अधूरी है। महिला समानता पर बात करते हुए डॉ. अनिरबन चौधूरी, जो हैशटेग ऑरेंज के मुख्य रणनीति अधिकारी (Chief Strategy Officer) हैं। ब्रांड और कंज्यूमर स्ट्रैटेजिस्ट के रूप में वे कॉरपोरेट नैरेटिव, उपभोक्ता व्यवहार और भारत में बदलती सामाजिक सोच के बीच के संबंधों पर काम करते हैं, उनका कहना है कि ‘‘सवाल यह नहीं है कि कोई महिला IAS बने या मां - सवाल यह है कि किसी पुरुष अधिकारी से मंच पर यह उम्मीद कभी नहीं जताई जाती कि पहले वह "एक्सपर्ट पिता" बने। यही असंतुलन है, जिसे हम हर 26 अगस्त को "महिला समानता दिवस" के नाम पर याद तो करते हैं, पर बदलते नहीं।’’
एक महिला कर्मचारी सुबह 9 बजे दफ्तर पहुंचती है। रात 7 बजे घर लौटती है - लेकिन उसका दिन वहीं खत्म नहीं होता, दूसरी पारी शुरू होती है। खाना, बच्चों का होमवर्क, बुजुर्गों की देखभाल। उसी दफ्तर में बैठा उसका पुरुष सहकर्मी घर पहुंचते ही सोफे पर बैठ जाता है। दोनों की डिग्री एक जैसी, पद एक जैसा, तनख्वाह लगभग बराबर - फिर भी दिन का हिसाब बराबर नहीं है।
आंकड़े जो असुविधाजनक सच बताते हैं
यह सिर्फ भावनात्मक अवलोकन नहीं है - सरकार का अपना डेटा इसकी पुष्टि करता है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के टाइम यूज़ सर्वे 2024 के अनुसार, 6 साल से ऊपर की भारतीय महिलाएं रोजाना औसतन 289 मिनट बिना वेतन वाले घरेलू काम में बिताती हैं, जबकि पुरुष सिर्फ 88 मिनट - यानी महिलाओं का बोझ पुरुषों से करीब तीन गुना ज्यादा। देखभाल से जुड़े कामों में बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों की जिम्मेदारी - महिलाएं रोज औसतन 137 मिनट देती हैं, पुरुष सिर्फ 75 मिनट।
15 से 59 साल की कामकाजी उम्र की महिलाओं के लिए यह बोझ और भारी है - वे रोज करीब 305 मिनट यानी पांच घंटे से ज्यादा समय बिना वेतन के घरेलू काम में लगाती हैं। इसी वजह से इस उम्र वर्ग में सिर्फ 25% महिलाएं रोजाना किसी सवेतन काम में शामिल हो पाती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 75% है - दफ्तर से पहले और बाद की "अनपेड शिफ्ट" ही तय कर देती है कि कौन करियर बना पाएगा और कौन नहीं।
नीति के स्तर पर भी वही पुराना असंतुलन
अगर यह सिर्फ सामाजिक सोच का मामला होता, तो शायद तर्क दिया जा सकता था कि समय के साथ बदल जाएगा। लेकिन नीतियां खुद इस असमानता को संस्थागत रूप दे रही हैं। नवंबर 2025 में लागू हुई सामाजिक सुरक्षा संहिता (Code on Social Security, 2020) के तहत 10 या उससे ज्यादा कर्मचारियों वाली हर कंपनी को महिला कर्मचारी को 26 हफ्तों की पूरी वेतन सहित मातृत्व अवकाश देनी अनिवार्य है। यह सराहनीय कदम है।
लेकिन पितृत्व अवकाश के मामले में तस्वीर बिल्कुल उलट है - निजी क्षेत्र के लिए पितृत्व अवकाश को लेकर देश में कोई कानून ही नहीं है। सिर्फ केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 15 दिन का सवेतन पितृत्व अवकाश मिलता है। निजी क्षेत्र की मात्र 14% कंपनियों के पास ही औपचारिक पितृत्व अवकाश नीति है - बाकी पूरी तरह नियोक्ता की मर्जी पर निर्भर हैं। 2017 में संसद में पेश हुआ पैटर्निटी बेनिफिट बिल आज तक पास नहीं हो पाया। सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में इस पर संसद से कानून बनाने का आग्रह जरूर किया है, पर अभी तक यह सिर्फ एक सुझाव ही है।
विज्ञापन में बराबरी, घर में असमानता
हमें 'घर का काम बांटने' और 'साझा पैरेंटिंग' दिखाने वाले विज्ञापन खूब पसंद आते हैं। ब्रांड्स ऐसे विज्ञापनों से तालियां भी खूब बटोरते हैं। लेकिन असली बदलाव विज्ञापन के 30 सेकंड में नहीं, घरों की रोजमर्रा की जिंदगी में और सरकारी आंकड़ों में दिखना चाहिए - और अभी तक वह वहां नहीं दिखा।
समस्या की जड़ में एक गहरी सामाजिक धारणा है, जिसे राज्यपाल के बयान ने सार्वजनिक मंच से ही दोहरा दिया: पुरुष का करियर उसका "स्वाभाविक अधिकार" माना जाता है, जबकि महिला का करियर एक ऐसी "उपलब्धि" है, जो घरेलू जिम्मेदारियां निभाने के बाद ही हासिल की जा सकती है। जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, नीतियां कागज़ पर ही रह जाएंगी। किसी महिला से "अच्छी मां" बनने की उम्मीद करने से पहले, हमें पुरुषों से भी उतनी ही शिद्दत से "जिम्मेदार पिता" बनने की उम्मीद करनी होगी।
तालियां नहीं, भागीदारी चाहिए
इस महिला समानता दिवस पर पुरुषों को दर्शक की भूमिका से निकलकर भागीदार की भूमिका में आना होगा। सिर्फ मंच से तालियां बजाना काफी नहीं - बदलाव की मांग खुद अपने घर और अपनी टीम से शुरू करनी होगी। और जब कोई राज्यपाल किसी विश्वविद्यालय के मंच से एक युवा IAS उम्मीदवार को "पहले मां बनो" कहती हैं, तो सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए - क्या किसी पुरुष अफसर से कभी यह उम्मीद जताई जाएगी कि वह पहले "पिता" बने?
असली बराबरी उस दिन आएगी, जब घर और दफ्तर दोनों जगह जिम्मेदारियां भी बराबर बंटेंगी और अवसर भी।