मुंबई की डॉ. सिमरन कपूर पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन दिल से पर्यावरण प्रेमी हैं। वे हाल ही में लॉन्च हुए वुमन क्लाइमेट कलेक्टिव का हिस्सा हैं। वे महिलाओं को बता रही हैं कि पर्यावरण के लिए खतरनाक सैनिटरी पैड्स का निस्तारण कैसे संभव हो सकता है।

मुंबई की डॉ. सिमरन कपूर पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन दिल से पर्यावरण प्रेमी हैं। वे हाल ही में लॉन्च हुए वुमन क्लाइमेट कलेक्टिव का हिस्सा हैं। वे महिलाओं को बता रही हैं कि पर्यावरण के लिए खतरनाक सैनिटरी पैड्स का निस्तारण कैसे संभव हो सकता है।

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मुंबई की डॉ. सिमरन कपूर पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन दिल से पर्यावरण प्रेमी हैं। वे हाल ही में लॉन्च हुए वुमन क्लाइमेट कलेक्टिव का हिस्सा हैं। वे महिलाओं को बता रही हैं कि पर्यावरण के लिए खतरनाक सैनिटरी पैड्स का निस्तारण कैसे संभव हो सकता है।

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डब्लूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक सैनिटरी पैड्स का कचरा एनवायरनमेंट और हेल्थ के लिए बड़ा खतरा है। इनसे कैंसर तक की आशंका होती है। मार्केट में मिलने वाले ज्यादातर सैनिटरी नैपकिन्स में प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है और इनकी रीसाइकिलिंग नहीं होती। हमारे देश में ग्रामीण महिलाएं जागरूक नहीं हैं। कहा जाता है कि एक अरब से भी ज्यादा नॉन कम्पोस्टेबल पैड कचरे या सीवर में डाल दिए जाते हैं। कूड़ा साफ करने के कार्य में लगे लोगों की हेल्थ सबसे ज्यादा प्रभावित होती है।

महिला स्वास्थ्य और पर्यावरण

25 वर्षीय डॉ. सिमरन कपूर मास्टर्स कर रही हैं और गाइनी हेल्थ में काम करने की इच्छा रखती हैं। वे मानती हैं कि मेंस्ट्रुअल हाइजीन और सैनिटरी नैपकिन्स डिस्पोजल को ले कर अभी हमारे यहां बुनियादी काम भी नहीं हो पा रहा है। वे बताती हैं, ‘‘पढ़ाई के दौरान मैं हेल्थ कैंप्स में जाती थी। वहां मुझे महसूस हुआ कि महिलाएं पीरियड्स के दिनों में साफ-सफाई और पैड्स के डिस्पोजल को ले कर जागरूक नहीं हैं। इसी दौरान मैं एक चिकित्सक के संपर्क में आयी, जो सैनिटरी पैड्स बनाते थे, तो मैंने भी मुंबई में यह काम शुरू किया, लेकिन जल्दी ही मैंने पाया कि इन पैड्स में भी प्लास्टिक का प्रयोग होता था, तब हमने इस पर दोबारा काम करने का मन बनाया। प्लास्टिक ना सिर्फ सेहत, बल्कि पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है। हमें इस बारे में लोगों, खासतौर पर महिलाओं को जागरूक बनाना होगा। अभी मैं वुमन क्लाइमेट कलेक्टिव इनिशिएटिव का हिस्सा बनी हूं। यह कलेक्टिव पर्यावरण व जेंडर इकोसिस्टम की दिशा में महिलाओं की आवाज बुलंद करने के लिए बनाया गया है। इसमें 10 अलग-अलग संस्थाओं-संगठनों और 16 क्लाइमेट चैंपियंस का सहयोग शामिल है। इसमें जलवायु परिवर्तन, साफ हवा, सस्टेनेबल आर्किटेक्चर, मरीन कंजर्वेशन, वेस्ट मैनेजमेंट जैसे तमाम पहलुओं को ले कर लोगों को जागरूक बनाया जाएगा।’’

वर्कशॉप के जरिये सिखाया

डॉ. सिमरन कहती हैं, ‘‘मैं पुणे के मेडिकल कॉलेज में पढ़ रही थी। वहां आसपास के गांवों में हमने कई वर्कशॉप कीं। यों तो मेंस्ट्रुअल हाइजीन को ले कर कई फिल्में बनी हैं, ऑनलाइन माध्यमों से भी जागरूकता बढ़ाने का काम किया जा रहा है, लेकिन समस्या यह है कि ग्रामीण इलाकों में महिलाएं ना फिल्म देखती हैं, ना ही ऑनलाइन साइट्स पर सक्रिय हैं। कोविड के दौरान मैंने ऐसे कई इलाकों में वर्कशॉप आयोजित करके उन्हें जागरूक बनाने का काम किया। अकेले मैं वर्कशॉप नहीं कर सकती, इसलिए ऑनलाइन कम्युनिटी में अपने प्लान शेअर करती हूं, कुछ अन्य संगठन भी मेरे साथ आ जाते हैं। मैं कई एनजीओ, संगठनों और सरकारी संस्थाओं के साथ मिल कर काम कर रही हूं, ताकि लोगों को मेंस्ट्रुअल हाइजीन के साथ ही प्लास्टिक के सही निस्तारण ना होने से पैदा होने वाली मुश्किलों के बारे में समझा सकूं। नदियों और समुद्रतटों के सफाई अभियानों से भी मैं जुड़ी हूं।’’

बुनियादी जानकारी जरूरी

सिमरन कहती हैं, ‘‘वर्कशॉप के जरिये हम बेसिक बातें बताते हैं। जैसे सैनिटरी पैड्स घर पर कैसे तैयार करें, उन्हें कैसे फेंकें, कैसे रीसाइकिलिंग करें आदि। भारत में तो महिलाओं को पीरियड्स के ही बारे में सही जानकारी नहीं है, तो उन्हें टैंपून या मेंस्ट्रुअल कप्स के बारे में कैसे समझाएं। वे पीरियड्स को ले कर बातचीत करने में हिचकिचाती हैं। गांवों में आज भी महिलाएं कपड़ा इस्तेमाल करती हैं, उन्हें नहीं मालूम कि इससे उन्हें इन्फेक्शन हो सकता है, जिससे आगे उनकी हेल्थ प्रभावित हो सकती है। महिलाओं को सही ढंग से समझा सकूं, इसलिए मैं गाइनी हेल्थ में ही आगे पढ़ाई जारी रखना चाहती हूं, क्योंकि स्त्री रोग विशेषज्ञ की बात को वे ज्यादा महत्व देती हैं।’’