इनसे मिलिए- ये हैं युवा सॉफ्टवेअर इंजीनियर आदित्य तिवारी, जिन्हें बेस्ट मम्मी ऑफ वर्ल्ड अवॉर्ड मिल चुका है। 2016 में सबसे कम उम्र के सिंगल पिता बन कर उन्होंने इतिहास रच दिया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उन्होंने डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चे अवनीश को गोद लिया।

इनसे मिलिए- ये हैं युवा सॉफ्टवेअर इंजीनियर आदित्य तिवारी, जिन्हें बेस्ट मम्मी ऑफ वर्ल्ड अवॉर्ड मिल चुका है। 2016 में सबसे कम उम्र के सिंगल पिता बन कर उन्होंने इतिहास रच दिया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उन्होंने डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चे अवनीश को गोद लिया।

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इनसे मिलिए- ये हैं युवा सॉफ्टवेअर इंजीनियर आदित्य तिवारी, जिन्हें बेस्ट मम्मी ऑफ वर्ल्ड अवॉर्ड मिल चुका है। 2016 में सबसे कम उम्र के सिंगल पिता बन कर उन्होंने इतिहास रच दिया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उन्होंने डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चे अवनीश को गोद लिया।

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इनसे मिलिए- ये हैं युवा सॉफ्टवेअर इंजीनियर आदित्य तिवारी, जिन्हें बेस्ट मम्मी ऑफ वर्ल्ड अवॉर्ड मिल चुका है। 2016 में सबसे कम उम्र के सिंगल पिता बन कर उन्होंने इतिहास रच दिया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उन्होंने डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चे अवनीश को गोद लिया। आज इस बच्चे ने माउंट एवरेस्ट बेस कैंप से 5500 मीटर की कठिन चढ़ाई चढ़ कर साबित कर दिया है कि आदित्य जैसा जिद्दी पिता हो और अवनीश जैसा जुझारु बच्चा, तो हर मुश्किल आसां हो सकती है।

पहली बार आदित्य ने इस बच्चे (जिसे प्यार से वे बिन्नी बुलाते हैं) को एक अनाथालय में देखा था, तब वह महज 5-6 महीने का बच्चा था। आदित्य अपने पिता के जन्मदिन पर अनाथ बच्चों के लिए कुछ तोहफे ले कर अनाथालय गए थे। इस बच्चे को उसके माता-पिता यहां छोड़ गए थे, क्योंकि उनके अनुसार बच्चा सामान्य नहीं था और वे इतने अमीर नहीं थे कि बच्चे का पालन-पोषण और इलाज करा सकें। इसके अलावा भी बच्चे को कई अन्य समस्याएं थीं। आदित्य कहते हैं, ‘‘बच्चे ने मुझे देखा और मैंने आगे बढ़ कर उसे गोद में उठा लिया। वह हंसा और हम एक-दूसरे से जुड़ गए। वार्डन ने कहा कि इस बच्चे को कोई गोद नहीं लेगा, क्योंकि उसे कई समस्याएं हैं, उसकी उम्र भी ज्यादा नहीं है।’’

महज 27 की उम्र में बड़ा फैसला

आदित्य ने अनाथालय के मैनेजमेंट से बच्चे को गोद लेने का प्रस्ताव दिया, तो सब हंसने लगे कि एक सिंगल लड़का कैसे बच्चा गोद ले सकता है और फिर इस बच्चे को भला कोई क्यों गोद ले। आदित्य हर महीने अवनीश से मिलने जाते रहे, उसकी सेहत की जानकारी लेते रहे, लेकिन कोई उन्हें बहुत सहयोग नहीं दे रहा था। बच्चे को गोद लेने में कई कानूनी अड़चनें थीं। वे सिंगल थे और उनकी उम्र महज 27 थी, जबकि कानूनन गोद लेने के लिए पिता की उम्र 30 होनी चाहिए। ऐसे में आदित्य ने गोद लेने संबंधी तमाम कानूनों के बारे में जानकारी हासिल की और प्रशासन और तंत्र को इस बारे में चिट्ठियां लिखीं। अनाथालय की गतिविधियां भी कुछ ठीक नहीं थीं और आदित्य तमाम सवालों को सरकार और पावर में बैठे लोगों के समक्ष लाना चाहते थे। लिहाजा वे कोशिशें करते रहे। इस बीच कानून में एक संशोधन यह हुआ कि गोद लेने की उम्र 30 से घटा कर 25 कर दी गयी। आदित्य की कोशिशों में परिवार और समाज को मानसिक तौर पर तैयार करने की जिम्मेदारी भी शामिल थी। अंत में 11 महीने के अथक प्रयासों के बाद आदित्य को अवनीश की कस्टडी मिल गयी।

जीत का एहसास

आदित्य कहते हैं, ‘‘यह मेरे जीवन का सबसे प्यारा पल था। मैंने अपने घर को बच्चे के रहने के हिसाब से व्यवस्थित किया। एक बच्चे के डायपर बदलने से ले कर स्पेशल नीड्स के साथ पैदा हुए बच्चे की देखभाल संबंधी सारी चीजें समझने की कोशिश कीं। बच्चे के घर में आने से माता-पिता भी प्रसन्न हुए और मैंने पाया कि अवनीश बहुत ही प्यारा बच्चा है, जिसे एक बेहतर परवरिश मिले, तो वह बहुत कुछ कर सकता है। मैं पुणे में कार्यरत था, लेकिन बच्चे की देखभाल के लिए मैंने कंपनी से 6 महीने की छुट्टी ली, ताकि बच्चे को पूरा समय और देखभाल दे सकूं।’’ 

अनोखे पिता की अनोखी शादी

बच्चे को गोद लेने के कुछ समय बाद ही आदित्य ने इंदौर की अर्पिता से शादी की। यह शादी भी अनोखे अंदाज में हुई। इसमें कोई बैंड-बाजा या बारात नहीं थी। स्लम और अनाथालय के बच्चे इसमें मेहमान थे। शादी पर हजार पेड़ लगाए गए, ताकि भावी पीढ़ी को सांस लेने के लिए भरपूर ऑक्सीजन मिल सके। शादी में जानवरों को भी खाना खिलाया गया। आदित्य एक सहयोगी पार्टनर चाहते थे, लेकिन वे कभी उन पर यह दबाव भी नहीं डालना चाहते थे कि वे बच्चे की जिम्मेदारी उठाएं। 

जिद कुछ बदलने की

आदित्य कहते हैं, ‘‘हमारे समाज में अनाथ बच्चों को सिर्फ दया की नजर से देखा जाता है। स्पेशल नीड्स वाले बच्चों के लिए सोचा जाता है कि किसी भी तरह बस वह खाना खा ले या अपने काम कर ले। वह भी कुछ अचीव कर सकता है, आगे बढ़ सकता है, एक स्वतंत्र जीवन जी सकता है, यह अपेक्षा नहीं की जाती। पिता बनने का निर्णय मेरे लिए भी मुश्किल था, क्योंकि बिन्नी के जीवन में आते ही मेरी भूमिकाएं बदल गयीं। डाउन सिंड्रोम एक जेनेटिक डिस्ऑर्डर है। इसके अलावा बच्चे में और भी कुछ समस्याएं थीं, जो समय के साथ मेरे सामने आयीं। लेकिन मेरे माता-पिता और परिजनों के सहयोग से मैं बच्चे की देखभाल बेहतर ढंग से कर पाया।’’ 

अच्छी परवरिश मकसद है

आदित्य कहते हैं, ‘‘अभी अवनीश आर्मी स्कूल में पढ़ रहा है। सभी बच्चों की तरह उसे भी आर्ट, म्यूजिक, डांस, फोटोग्राफी और स्पोर्ट्स में दिलचस्पी है। घर में बच्चे की कितनी भी बेहतर परवरिश हो, स्कूल जाना बच्चे के लिए जरूरी है, क्योंकि वहां वह अनुशासन, सामाजिकता, व्यावहारिकता या दुनियादारी सब कुछ सीखता 
है। पिछले 6 वर्षों में वह मेरे साथ कई शहरों में गया है।’’ 

आदित्य बताते हैं कि वे स्पेशल नीड्स वाले बच्चों के पेरेंट्स की काउंसलिंग करते हैं। इंटैलेक्चुअल डिसेबिलिटीवाले बच्चों की परवरिश को ले कर यूनाइटेड नेशंस की एक कॉन्फ्रेंस में भी उन्हें आमंत्रित किया गया। उन्होंने सपोर्ट ग्रुप्स बनाए हैं। कई राज्यों में जा कर मीटिंग्स, वर्कशॉप, टॉक्स कर चुके हैं। दुनिया भर के लगभग 10,000 पेरेंट्स से अादित्य मिल चुके हैं। स्पेशल नीड्सवाले बच्चों के पेरेंट्स के सामने बहुत सी मुश्किलें आती हैं। पेरेंट्स को समझना चाहिए कि उनके बच्चे की जरूरतें क्या हैं, उसकी ट्रेनिंग कैसे होनी चाहिए, उसकी परवरिश का तौर-तरीका क्या होना चाहिए।

सहयोग चाहिए दया नहीं

आदित्य का कहना है, ‘‘मैं सिर्फ अवनीश की नहीं, ऐसी पूरी कम्युनिटी की बात करता हूं। मेरे पास सैकड़ों माता-पिता अपनी समस्याएं ले कर आते हैं, जो नहीं समझ पाते कि उन्हें अपने स्पेशल चाइल्ड की परवरिश कैसे 
करनी है। डाउन सिंड्रोम एक बर्थ प्रॉब्लम है, जिसमें कई अन्य समस्याएं भी हो जाती हैं। मेरे बच्चे को भी बहुत सी समस्याएं थीं, मुझे खुद उनके बारे में कुछ देरी से पता चला। हमारे यहां बहुत सुविधाएं नहीं हैं, खासतौर पर छोटे शहरों में तो पेरेंट्स के सामने और भी चुनौतियां आती हैं। मैं चाहता हूं कि पेरेंट्स के सामने सकारात्मक उदाहरण पेश करूं। अगर अवनीश कर सकता है, तो और ऐसे बच्चे क्यों आगे नहीं बढ़ सकते।’’

सात साल का माउंटेनियर

इन पंक्तियों को लिखे जाने तक 7 साल का नन्हा प्यारा और हौसलेमंद बच्चा अवनीश अपने जिद्दी पिता के साथ माउंट एवरेस्ट की कठिन चढ़ाई करके वर्ल्ड रेकॉर्ड बना चुका है। आदित्य बताते हैं, ‘‘हम 70 किलो का वजन साथ ले कर चल रहे थे, जिसमें 10 किलो तो मेडिकल इक्विपमेंट्स और दवाएं थीं। अवनीश के लिए नेबुलाइजर मशीन भी रखी। मैं लगातार प्रार्थना कर रहा था कि किसी भी तरह अवनीश को सही-सलामत ले आ सकूं, मेरे लिए उसकी हेल्थ और सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता थी। मैं उसे पीठ पर ले कर 5-6 किलोमीटर चलने की प्रैक्टिस करके गया था। माउंट एवरेस्ट पर अगले दो दिन के मौसम की जानकारी लेने के बाद ही हम चलना शुरू करते थे, क्योंकि वहां के मौसम का कोई भरोसा नहीं होता। आखिरकार हमने एवरेस्ट बेस कैंप से 5500 मीटर की ऊंचाई पर काला पत्थर पहाड़ में प्यारी सी धूप, लेकिन -10 डिग्री टेंपरेचर के बीच तिरंगा लहराया। इसके आगे मौसम ने साथ नहीं दिया।’’ आदित्य कहते हैं कि अवनीश दुनिया का पहला स्पेशल नीड्स वाला बच्चा है, जिसने यह फतह हासिल की है। इसके लिए मैंने लगभग एक साल पहले से ही बेटे की ट्रेनिंग शुरू करवा दी थी। मैं उसे कश्मीर और लेह-लद्दाख तक ले गया। बहुत ऊंचाई पर जा कर तो सामान्य लोगों को भी प्रॉब्लम्स हो जाती है। मैंने कुछ महीने पहले से ही अवनीश का डाइट प्लान भी चेंज किया, उसे घंटों एक्सरसाइज करवायी। उसका स्पेशल इंश्योरेंस करवाया।