सोशल मीडिया पर हर उम्र और हर जगह से लोग आजकल रील्स बना रहे हैं। बेशक इनकी दुनिया बड़ी होती जा रही है, लेकिन उम्र कम होती जा रही है। जी हां, अब इस फील्ड में बच्चों की भी भरमार हो रही है। ब्रांड्स अपने प्रमोशन के लिए बच्चों को टार्गेट कर रहे हैं। सोशल मीडिया साइट्स पर डाले गए इन वीडियोज पर लोग सिर्फ

सोशल मीडिया पर हर उम्र और हर जगह से लोग आजकल रील्स बना रहे हैं। बेशक इनकी दुनिया बड़ी होती जा रही है, लेकिन उम्र कम होती जा रही है। जी हां, अब इस फील्ड में बच्चों की भी भरमार हो रही है। ब्रांड्स अपने प्रमोशन के लिए बच्चों को टार्गेट कर रहे हैं। सोशल मीडिया साइट्स पर डाले गए इन वीडियोज पर लोग सिर्फ

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सोशल मीडिया पर हर उम्र और हर जगह से लोग आजकल रील्स बना रहे हैं। बेशक इनकी दुनिया बड़ी होती जा रही है, लेकिन उम्र कम होती जा रही है। जी हां, अब इस फील्ड में बच्चों की भी भरमार हो रही है। ब्रांड्स अपने प्रमोशन के लिए बच्चों को टार्गेट कर रहे हैं। सोशल मीडिया साइट्स पर डाले गए इन वीडियोज पर लोग सिर्फ

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सोशल मीडिया पर हर उम्र और हर जगह से लोग आजकल रील्स बना रहे हैं। बेशक इनकी दुनिया बड़ी होती जा रही है, लेकिन उम्र कम होती जा रही है। जी हां, अब इस फील्ड में बच्चों की भी भरमार हो रही है। ब्रांड्स अपने प्रमोशन के लिए बच्चों को टार्गेट कर रहे हैं। सोशल मीडिया साइट्स पर डाले गए इन वीडियोज पर लोग सिर्फ हाऊ क्यूट और सो स्वीट ही नहीं लिख रहे हैं, बल्कि कई भद्दे और अश्लील कमेंट्स करके बच्चों की खूब ट्रोलिंग भी कर रहे हैं। पेरेंट्स खुद भी बच्चों को इसकी तरफ धकेल रहे हैं, जो चिंताजनक है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों को इसकी इजाजत मिलनी चाहिए या नहीं। इस बारे में नवी मुंबई के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हॉस्पिटल में साइकियट्री में कंसल्टेंट डॉ. पार्थ नागड़ा का कहना है, ‘‘जैसे हर चीज से कुछ अच्छी और बुरी बातें जुड़ी होती हैं, वैसे ही इस से भी हैं। बच्चे जब सोशल मीडिया पर कंटेंट बनाते हैं तो उन्हें बहुत से फायदे मिलते हैं, जैसे क्रिएटिविटी बढ़ना, कॉन्फिडेंस बढ़ना, सोशल स्किल्स डेवलप होना, लर्निंग माइंडसेट डेवलप होना आदि। लेकिन अगर बुरे असर की बात करें तो वे भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात तो यह है कि बहुत छोटी उम्र के बच्चे सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं। दूसरा जब बच्चे कंटेंट क्रिएटर बन जाते हैं तो उन पर बहुत सारा प्रेशर हो जाता है। इन बच्चाें में स्ट्रेस बर्नआउट जैसे लक्षण भी दिखायी देने लगते हैं। परफॉर्म करने का प्रेशर लाइक्स और फॉलोअर्स बढ़ने का दबाव इन सबसे बच्चों को दोचार होना पड़ता है। इन सब चीजों से बच्चों का व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है।’’

चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑर्गेनाइजेशन थॉर्न द्वारा किए गए एक सर्वे में लगभग 40 प्रतिशत बच्चों ने स्वीकारा कि सोशल साइट इंस्टाग्राम पर उनका अकाउंट है। इन बच्चों की उम्र 13 वर्ष से कम थी। इस सर्वे में कई और बातें सामने आयीं, जैसे किडफ्लुएंसर्स की लाइफ की ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जरूरत से ज्यादा पब्लिसिटी होती है तो उनकी प्राइवेसी खत्म होती है और बच्चे ऑब्जेक्ट बन जाते हैं।

पेरेंट्स की है गलती

ऐसे में सवाल उठता है कि जब इस इंफ्लुएंसर कल्चर का बच्चों पर इतना नेगेटिव प्रभाव पड़ रहा है तो पेरेंट्स इस बात को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं। दरअसल, इसमें सबसे बड़ी गलती पेरेंट्स की ही है। अपने बच्चे का टैलेंट दुनिया को दिखाने की चाह, मेरा बच्चा सबसे अलग और आगे है, यह दिखावा करने की आदत और इन सबसे बढ़ कर पैसा कमाने की चाहत। बच्चों की रील्स लोगों में काफी पसंद की जाती है। कई बड़ी टॉय कंपनियां अनबॉक्सिंग वीडियोज के लिए बच्चों को मोटी रकम देती हैं। इसके अलावा भी बहुत से वीडियोज काफी ट्रेंड कर जाते हैं, जिनकी वजह से इन बच्चों के फॉलोअर्स की संख्या बढ़ जाती है। फॉलोअर्स और लाइक की संख्या बढ़ने का मतलब है बढि़या कमाई। एक और अध्ययन के मुताबिक आज के समय में इंफ्लुएंसर्स 20 हजार महीने से ले कर 2 लाख रुपए तक हर महीने औसतन कमा रहे हैं। बच्चों की कमाई पर माता-पिता की ही होगी।

रियल वर्ल्ड से दूरी

बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनकी अप्रोच पर भी इस कल्चर का बहुत बुरा असर पड़ता है। जब बच्चों के किसी वीडियो पर भद्दे कमेंट्स होते हैं तो बच्चे भी इन्हें पढ़ते हैं। उन्हें ट्रोलिंग से डील करना नहीं आता।

पेरेंट्स को बच्चों को सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने की इजाजत ही नहीं देनी चाहिए

साइकोथेरैपिस्ट और लाइफ कोच डॉ. चांदनी तुगनैत का कहना है, ‘‘रील्स और सोशल मीडिया की दुनिया बहुत ज्यादा फेक है। इंफ्लुएंसर बनने की प्रक्रिया में बच्चों को निरंतर कैमरे के सामने रहना पड़ता है। इससे उनका बचपन कृत्रिम हो जाता है। यह स्थिति बच्चों में तनाव, चिंता और अवसाद जैसी मानसिक स्थितियों को जन्म दे सकती है। साथ ही बच्चों में वास्तविक और ऑनलाइन जीवन के बीच का अंतर समझने की क्षमता कम हो जाती है।’’ वे बड़ों की तरह फिल्टर लगा कर वीडियो बनाते हैं, रील बनाते समय बच्चे तैयार होते हैं, मेकअप करते हैं, ताकि वे स्क्रीन पर अच्छे दिख सकें। इन सब चीजों से बच्चों में नेगेटिव बॉडी इमेज बननी शुरू होती है। वे लाइक्स और कमेंट्स के आधार पर अपनी पहचान बनाने लगते हैं, जो उनके भविष्य के लिए हानिकारक हो सकता है। यही नहीं, ऐसा करके पेेरेंट्स बच्चों को अर्ली एडल्टहुड की तरफ धकेलते हैं। जरा सोचिए, अगर 5-6 साल तक के बच्चे अपने लुक्स और फिगर को ले कर सजग होना शुरू कर देंगे तो आगे चल कर वे हर समय परफेक्ट बॉडी और लुक्स की तलाश में रहेंगे। वे अपनी शारीरिक कमियों को स्वीकार ही नहीं कर पाएंगे, जिसके बहुत बुरे अंजाम उन्हें झेलने पड़ सकते हैं।

सोशल सर्कल से परहेज

इस बात को ले कर दुनिया भर में कई अध्ययन हो चुके हैं, जिनमें एक्सपर्ट्स ने साफ-साफ इस बात पर चिंता जतायी है कि स्क्रीन टाइम बढ़ने के चलते अब हम लोगों से मिलने-जुलने और बात करने से कतराने लगे हैं। यही समस्या बच्चों को भी झेलनी पड़ रही है। बच्चों को घर से बाहर जा कर दोस्तों के साथ खेलने की इजाजत देने के बजाय जब उनके हाथ में मोबाइल पकड़ा दिया जाता है तो उनमें सोशल स्किल्स विकसित नहीं हो पाते। एक-दूसरे की आंखों में आंखे डाल कर बात करना, बॉडी लैंग्वेज को समझना, अपने झगड़े सुलझाना व्यक्तित्व विकास के महत्वपूर्ण चरण माने जाते हैं। इन सबसे बच्चों में कम्यूनिकेशन, एडजस्टमेंट और नेगोशिएशन स्किल्स डेवलप होते हैं। ये सारी चीजें धीरे-धीरे बच्चों में नदारद होती जाएंगी।

तो क्या करें पेरेंट्स

अव्वल तो पेरेंट्स को बच्चों को सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने की इजाजत ही नहीं देनी चाहिए और अगर देनी भी हो तो 13-14 साल की उम्र के बाद ही सोशल मीडिया पर एक्टिव होने दें। डॉ. पार्थ नागड़ा का इस बारे में कहना है, ‘‘पेरेंट्स बच्चों को कई तरह से मॉनिटर कर सकते हैं, जैसे सेम यूजरनेम और पासवर्ड का इस्तेमाल करके दूसरे डिवाइस से बच्चों के अकाउंट को मॉनिटर करना, अपनी निगरानी में कंटेंट बनवाना आदि। बच्चों को प्रेरित करें कि अगर वे कंटेंट बनाना ही चाहते हैं तो ट्रेंडिंग डांस, फूहड़ जोक्स के बजाय इन्फार्मेटिव और एजुकेशनल कंटेंट बनाएं। यहां चिंता की बात यह है कि हम यह नहीं जानते कि इस इंफ्लुएंसर कल्चर की लाइफ कितनी है। ऐसे में जो बच्चे इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं, वे अपनी पढ़ाई से समझौता कर रहे हैं और अपनी लाइफ के लिए कोई कैरिअर गोल्स भी सेट नहीं कर पाते। इनके कोई रोल मॉडल्स भी नहीं बन पाते, जिनकी लाइफ से ये प्रेरणा ले सकें। भारत में जब टिकटॉक और पबजी जैसे एप्स बैन हुए तो ऐसे मरीजों की संख्या बहुत देखी गयी, जिनमें विदड्रॉअल सिम्पटम्स थे। इन लोगों में जबर्दस्त मोबाइल एडिक्शन था। कुछ स्टूडेंट्स तो ऐसे भी थे, जिन्होंने हायर स्टडीज के लिए ड्रॉप ईयर लिया था, लेकिन वे ज्यादा समय ऐसे एप्स पर बिताते थे।’’

पेरेंट्स को अपने बच्चों को सोशल मीडिया की आदत डालने से पहले खुद से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि क्या उनके बच्चों के लिए वाकई यह जरूरी है, लेकिन बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए।