आजादी के सात दशक बाद भी स्त्री सुरक्षा हमारे समाज के लिए एक चुनौती है। स्त्रियां घर-बाहर, कहीं भी खुद को महफूज नहीं मानतीं। वर्कप्लेस सेफ्टी के लिए 2013 में पॉश एक्ट बना। वर्कप्लेस में स्त्री सुरक्षा कैसे संभव है और सेक्सुअल हैरेसमेंट में जीरो टॉलरेंस पॉलिसी कैसे लागू की जाए, इसके लिए कुछ सुझाव।

आजादी के सात दशक बाद भी स्त्री सुरक्षा हमारे समाज के लिए एक चुनौती है। स्त्रियां घर-बाहर, कहीं भी खुद को महफूज नहीं मानतीं। वर्कप्लेस सेफ्टी के लिए 2013 में पॉश एक्ट बना। वर्कप्लेस में स्त्री सुरक्षा कैसे संभव है और सेक्सुअल हैरेसमेंट में जीरो टॉलरेंस पॉलिसी कैसे लागू की जाए, इसके लिए कुछ सुझाव।

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आजादी के सात दशक बाद भी स्त्री सुरक्षा हमारे समाज के लिए एक चुनौती है। स्त्रियां घर-बाहर, कहीं भी खुद को महफूज नहीं मानतीं। वर्कप्लेस सेफ्टी के लिए 2013 में पॉश एक्ट बना। वर्कप्लेस में स्त्री सुरक्षा कैसे संभव है और सेक्सुअल हैरेसमेंट में जीरो टॉलरेंस पॉलिसी कैसे लागू की जाए, इसके लिए कुछ सुझाव।

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आजादी के सात दशक बाद भी स्त्री सुरक्षा हमारे समाज के लिए एक चुनौती है। स्त्रियां घर-बाहर, कहीं भी खुद को महफूज नहीं मानतीं। वर्कप्लेस सेफ्टी के लिए 2013 में पॉश एक्ट बना। वर्कप्लेस में स्त्री सुरक्षा कैसे संभव है और सेक्सुअल हैरेसमेंट में जीरो टॉलरेंस पॉलिसी कैसे लागू की जाए, इसके लिए कुछ सुझाव।

क्या हैं विशाखा गाइडलाइन्स और पॉश

1997 में सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा गाइडलाइन्स बनायी थीं, जिनमें साफ तौर पर वर्कप्लेस हैरासमेंट को संबोधित किया गया, लेकिन इन्हें क्रियान्वित करने को ले कर दुविधाएं थीं। फिर प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरासमेंट (पॉश) एक्ट 2013 बना, जिसमें महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल को ले कर स्पष्ट गाइडलाइंस आयीं। महिलाएं समझ सकीं कि दफ्तरों में यौन उत्पीड़न की शिकायत उन्हें कैसे और कहां करनी है। एक्ट में स्पष्ट निर्देश थे कि हर कंपनी को वर्कप्लेस में इसे ले कर निरंतर जागरूकता सेशंस करने होंगे। कई कंपनियों ने 45 मिनट से 60 मिनट के ऑनलाइन मॉड्यूल बनाए, ताकि महिलाकर्मियों को इस एक्ट की सभी बातें अच्छी तरह समझ आ जाएं, लेकिन अभी भी ज्यादातर लोगों को यौन-उत्पीड़न, कंसेंट, इंपैक्ट और इंटेंट जैसी बातें नहीं समझ आतीं।

एचआर फर्म मार्चिंग शीप की फाउंडर-सीईओ सोनिका एरोन कहती हैं, ‘‘वर्कप्लेस सेफ्टी को ले कर जागरूकता की कमी तो है ही, कई महिलाकर्मियों को अपनी नौकरी या प्रतिष्ठा खोने का भय भी होता है, जिस कारण वे आवाज नहीं उठा पातीं। अभी भी कई संस्थानों में इंटरनल कमेटी का गठन नहीं किया गया है। कमेटी गठित हुई भी तो पर्याप्त ट्रेनिंग के अभाव में इनका संचालन सही से नहीं हो पाया।’’

दफ्तर कैसे बनें सुरक्षित

कानूनों का पालन जरूरी है, इसके लिए सही ट्रेनिंग जरूरी है। शिकायत पेटिका लगाने या कमेटी गठित करने के साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि शिकायतों का निवारण समय पर हो। वर्कप्लेस सेफ्टी के लिए सोनिका एरोन दे रही हैं कुछ टिप्स-

शिक्षा व जागरूकता : पॉश एक्ट के बारे में सही ट्रेनिंग हो, कंपनीज ट्रेनिंग सेशन व वर्कशॉप आयोजित करें, कर्मचारियों को पता हो कि वर्बल-फिजिकल-मेंटल हैरासमेंट की शिकायत कहां और कैसे की जा सकती है। जानकारी ताकत देती है। ट्रेनिंग व्यावहारिक और समझ में आने वाली हो।

महिला हक में हों नीतियां : सेक्सुअल हैरासमेंट के खिलाफ हर संस्थान को स्पष्ट नीतियां बनानी चाहिए। शिकायत कैसे और कहां हो, जांच की प्रक्रिया क्या हो, सही-गलत शिकायतों की परख कैसे हो, इसे ले कर हर चरण पर ठोस रणनीति, गाइडलाइंस और पारदर्शिता हो। शिकायतकर्ता को यह भरोसा हो कि उसे न्याय मिलेगा, उसकी प्रतिष्ठा को आंच नहीं पहुंचेगी और उसकी नौकरी सुरक्षित रहेगी, तभी वह अपने हक में आवाज उठा सकता है।

सपोर्ट सिस्टम : वर्कप्लेस में गठित आईसी को शिकायतकर्ता की गोपनीयता बरकरार रखते हुए शिकायत को संवेदनशील तरीके से सुनना चाहिए। आईसी मेंबर्स के नाम, फोटो और फोन नंबर्स दफ्तरों की मुख्य जगहों पर लगाए जाएं, ताकि पीड़ित को पता हो कि जरूरत पड़ने पर वह किससे संपर्क करे। पीड़ित को काउंसलिंग की सुविधा मिले, मेंटल ट्रॉमा से निकलने के लिए पूरा सपोर्ट मिले।

सही संस्कृति : जेंडर सेंसिटिविटी की ट्रेनिंग होनी चाहिए। लोगों को पता हो कि कैसी भाषा, विचार, शब्द या बॉडी लैंग्वेज दूसरे जेंडर को आहत कर सकते हैं। कर्मचारियों के सम्मान की सुरक्षा मैनेजमेंट की जिम्मेदारी है। जेंडर इक्वैलिटी होगी तो सभी अपनी बात आत्मविश्वास से रख सकेंगे, खुद को महत्वपूर्ण व सिक्योर महसूस करेंगे। लीडरशिप की इसमें अहम भूमिका है, क्योंकि वे जैसा उदाहरण प्रस्तुत करेंगे, वैसी ही कार्य संस्कृति विकसित होगी।

महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों के लिए भी अहम मुद्दा है वर्कप्लेस सेफ्टी

सहकर्मियों की भूमिका : कलीग के साथ गलत हो रहा है तो इसकी शिकायत सहकर्मी भी कर सकते हैं। पीड़ित को भरोसा हो कि उसके सहकर्मी उसकी पीड़ा में उसके साथ हैं। इसके लिए ट्रेनिंग देनी होगी।

लैंगिक भेदभाव मिटाएं : संस्थानों को जेंडर गैप कम करना होगा। रूढ़ धारणाओं को चुनौती देनी होगी, ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जिनमें महिलाओं को समान अवसर मिलें, उनके लिए वर्क-लाइफ बैलेंस आसान हो। समस्या की जड़ पर चोट करना ही उस का इलाज है। वर्कप्लेस सेफ्टी स्त्रियों के साथ ही कंपनी के हित में भी है। इससे उसकी उत्पादकता बढ़ती है। इस सफलता में हर जेंडर का समान योगदान होता है। सामूहिक प्रयासों, नीतियों और प्रतिबद्धता से हर संस्थान अपने माहौल को ऐसा बना सकता है, जहां स्त्रियां खुद को महफूज समझें।