ऐसे कई टीचर्स हैं, जिन्होंने पढ़ाने के नए तरीके खोजे। इन्होंने अपने आसपास के स्टूडेंट्स की मदद की और उन्हें हौसला दिलाया कि अगर पढ़ने का जज्बा है, तो फिर कोई रुकावट आड़े नहीं आ सकती। शिक्षक दिवस पर ऐसे ही चंद शिक्षक अपने बुलंद हौसले की कहानी बता रहे हैं-

ऐसे कई टीचर्स हैं, जिन्होंने पढ़ाने के नए तरीके खोजे। इन्होंने अपने आसपास के स्टूडेंट्स की मदद की और उन्हें हौसला दिलाया कि अगर पढ़ने का जज्बा है, तो फिर कोई रुकावट आड़े नहीं आ सकती। शिक्षक दिवस पर ऐसे ही चंद शिक्षक अपने बुलंद हौसले की कहानी बता रहे हैं-

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ऐसे कई टीचर्स हैं, जिन्होंने पढ़ाने के नए तरीके खोजे। इन्होंने अपने आसपास के स्टूडेंट्स की मदद की और उन्हें हौसला दिलाया कि अगर पढ़ने का जज्बा है, तो फिर कोई रुकावट आड़े नहीं आ सकती। शिक्षक दिवस पर ऐसे ही चंद शिक्षक अपने बुलंद हौसले की कहानी बता रहे हैं-

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आज के समय में शिक्षा की बात छिड़ते ही सबसे पहले लोगों की प्रतिक्रिया होती है- एजुकेशन का तो हाल ही बुरा हो चुका है। इतनी महंगी शिक्षा है कि आम मध्यवर्गीय परिवारों के लिए भी बच्चों को पढ़ाना मुश्किल है। यह बात काफी हद तक सही है। बात करें कोरोना दौर की, तो पिछले लगभग डेढ़ वर्ष में छात्रों, टीचर्स और अभिभावकों के सामने जितनी चुनौतियां आयीं, शायद ही इसकी कल्पना किसी ने की होगी। छात्रों ने स्कूल का मुंह नहीं देखा, बोर्ड के रिजल्ट्स भी बिना परीक्षा के आ गए। यह भी जरूरी नहीं कि हर छात्र के लिए इन नतीजों का अनुभव अच्छा ही रहा होगा। पूर्व में हुई परीक्षाओं के आधार पर किसी की योग्यता का सटीक आकलन नहीं हो सकता। लेकिन मौजूदा दौर चुनौतीभरा है। ना सिर्फ छात्रों के लिए, बल्कि टीचर्स के लिए भी। ऐसी परिस्थितियों में भी ऐसे कई टीचर्स हैं, जिन्होंने पढ़ाने के नए तरीके खोजे। इन्होंने अपने आसपास के स्टूडेंट्स की मदद की और उन्हें हौसला दिलाया कि अगर पढ़ने का जज्बा है, तो फिर कोई रुकावट आड़े नहीं आ सकती। शिक्षक दिवस पर ऐसे ही चंद शिक्षक अपने बुलंद हौसले की कहानी बता रहे हैं-

शिक्षा पहुंचे हर दर पर - डॉ. सपन कुमार, दुमका (झारखंड)

मैं पिछले साल बहुत चिंतित था कि छात्रों की पढ़ाई कैसे हो सकेगी। आदिवासी बच्चे पहले ही मुश्किल स्थिति में पढ़ पाते हैं, ऊपर से लॉकडाउन में स्थितियां बदतर होती गयीं। ये बच्चे अपने गांव में स्कूल जाने वाली पहली पीढ़ी के हैं। ना यहां स्मार्टफोन हैं और ना इंटरनेट कनेक्टिविटी। पढ़ाई कोई महत्वपूर्ण मुद्दा भी नहीं था इनके लिए। ऐसे में छात्रों की शिक्षा बाधित ना हो, इसके लिए मुझे बहुत कवायद करनी पड़ी। मैंने अपने विद्यालय के शिक्षकों और ग्रामीणों के साथ एक मीटिंग की, ताकि पढ़ने की कोई राह निकाली जा सके। 

मैं इस उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में 2015 में आया। मैं रोज 9 किलोमीटर दूर से स्कूल आता था। तब स्कूल की हालत जर्जर थी, लेकिन हमने इसे शानदार और हरा-भरा बना दिया। जैसे ही कोरोना के कारण पिछले वर्ष लॉकडाउन हुआ, मुझे लगा कि मेरी इतने वर्षों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। ये बच्चे पढ़ेंगे कैसे? तब हमने सामूहिक प्रयास किए। बच्चों ने ताड़ के पत्तों से बैठने के लिए चटाइयां बनायीं। खर-पतवार से झाड़ू बनाए। प्लास्टर ऑफ पेरिस से चॉक बनायी। फिर हमने हर बच्चे के लिए उसके घर के बाहर मिट्टी, गोबर और पुआल से ब्लैकबोर्ड तैयार किया। यानी उन्होंने अपने ही घर के बाहर बैठ कर शिक्षा हासिल की। वहां हमने बैठने के लिए भी प्लेटफॉर्म तैयार करवाया। साथ में सैनिटाइजर, मास्क, साबुन हर चीज मुहैया करायी। पढ़ाने के लिए हम पहले उनकी जानकारी का उपयोग करते हैं और फिर उस जानकारी में बाकी चीजें जोड़ते हैं। हमारे पास कक्षा तीन से आठवीं तक के विद्यार्थी पढ़ते हैं। लगभग 300 बच्चों पर हमने 4 सेंटर बनाए और 4 टीचर उन्हें पढ़ाने जाते थे। गांव के कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने बच्चों के लिए मास्क की व्यवस्था की। शिक्षा विभाग के कुछ वरिष्ठ सहकर्मियों ने सीमित संसाधनों के बीच बच्चों के लिए जरूरी चीजों की व्यवस्था करवाने में सहयोग दिया। दरअसल हमारे इलाके में लड़कियों की शादी बहुत कम उम्र में कर दी जाती है। इससे उन्हें कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं, कई लड़कियां उचित इलाज के अभाव में असमय मौत के मुंह में चली जाती हैं। यहां बाल श्रम भी बहुत होता है। ऐसे में केवल शिक्षा ही वह जरिया है, जिससे एक पीढ़ी की सोच को बदला जा सकता है। 

सबसे बड़ी बात यह है कि आदिवासी समाज ने पढ़ाई के महत्व को समझा, पेरेंट्स ने हमारी बात सुनी, समझी और अपने बच्चों को पढ़ाई से नहीं रोका। पहले जहां हमारे विद्यालय में केवल 250 बच्चे थे, लॉकडाउन में उनकी संख्या बढ़ गयी। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे ना सिर्फ बेहतर शिक्षा लेकर आगे बढ़ें, बल्कि अच्छे नागरिक भी बन सकें, उनमें नैतिक मूल्यों का भी विकास हो सके। ओपन स्कूल से उन्होंने बहुत कुछ सीखा-समझा और वे मेहनत कर रहे हैं। 

ना रहे किसी का ख्वाब अधूरा - अमित लाठिया, दिल्ली पुलिस 

वर्ष 2010 में दिल्ली पुलिस में मेरा चयन हुआ। मैं सोनीपत के एक गांव लाठ का रहने वाला हूं। मेरे पिता प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते थे। एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या ने उन्हें बिस्तर पर ला दिया और फिर हमारे परिवार के सामने कठिनाइयां आने लगीं। सर्वाइवल का सवाल था, तो मैंने चाय की दुकान पर काम किया, उससे अपनी कोचिंग की फीस भरी। बाद में मेरी स्थिति देख कर कोचिंग के शिक्षक ने फीस माफ कर दी। मैंने बहुत मेहनत की और चंडीगढ़ पुलिस में भर्ती हो गया। मेरे बड़े भाई दिल्ली में ही कबाड़ी का काम करते थे। एक बार ट्रैफिक पुलिस ने उन्हें रोका और उनसे उनकी दिनभर की कमाई 200 रुपए भी छीन लिए। भाई की स्थिति देख कर मैंने ठान लिया कि दिल्ली लौटूंगा। मैंने कोशिश की और फिर दिल्ली पुलिस में मेरा चयन हो गया। मैं जानता था कि पुलिस विभाग में अच्छे-बुरे सभी तरह के लोग मौजूद हैं और पूरे सिस्टम को बदलना किसी एक के बस की बात नहीं है। दूसरी ओर मन में एक बात यह भी रहती थी कि कुछ ऐसा करूं कि गरीब और अभावग्रस्त बच्चे भी पढ़ें और आगे बढ़ सकें। 

एक दिन मैं रिक्शा पर जा रहा था। रिक्शाचालक पर नजर पड़ी देखा, तो मैं आश्चर्य में पड़ गया, क्योंकि कुछ समय पहले तक उस लड़के यानी विनय को मैं रनिंग करते हुए देखता था। उसने 12वीं की थी, लेकिन घर की हालत के कारण उसे रिक्शा चलाना पड़ रहा था। मैंने उसकी जिंदगी को बदलने की ठानी। मुझे खुशी है कि इसमें सफल भी रहा। मैंने उसकी पढ़ाई, कोचिंग का खर्च उठाया, फिजिकल ट्रेनिंग दी, आज वह हरियाणा पुलिस में भर्ती हो गया है। 

पिछले 6-7 वर्षों में मेरे पास बहुत से बच्चे आए। एक समय था कि मेरे घरवाले नाराज हो गए कि मैं सीमित तनख्वाह को बच्चों पर खर्च कर देता हूं। बहस बढ़ी, तो उन्होंने कह दिया कि यह समाज कार्य मैं कहीं और जा कर करूं। मेरे पास उस समय 2-3 बच्चे ऐसे थे, जिनके मां-बाप भी नहीं थे। खैर मैं उन्हें साथ में दिल्ली ले कर आया। एक बड़ा कमरा किराए पर लिया। दिन में ड्यूटी करता और रात में उन्हें पढ़ाता। बच्चों के रहने, किराए के अलावा भी कई खर्च होते, तो मेरे पास भी बहुत पैसा नहीं बचता था। तब मैंने एक बच्चे को कोचिंग दिलवाने का फैसला किया, क्योंकि मैं एक का ही खर्चा उठा सकता था। मैंने उसे कहा कि जो कुछ भी कोचिंग में पढ़ाया जाए, उसे हूबहू कॉपी करके ले आए। मैं खाली समय में उन्हीं नोट्स को पढ़ता और फिर बाकी छात्रों को पढ़ाता। आसपास के ग्राउंड में उनकी फिजिकल प्रैक्टिस भी कराता। अब उनमें से कुछ बच्चे हरियाणा और दिल्ली पुलिस में आ गए हैं। इन बच्चों के घरवाले जब सोनीपत में मेरे माता-पिता से मिलने मिठाई ले कर पहुंचे, तो मेरे घरवालों को लगा कि मैं कुछ अच्छा कर रहा हूं। इस तरह 6 महीने बाद मैं वापस घर गया। मेरी शादी हुई, तो पत्नी को भी मैंने आगे पढ़ाने के बारे में सोचा। वे पीएचडी कर रही हैं और हरियाणा शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं। शादी के दिन हम पति-पत्नी और मेरे स्टूडेंट्स ने कैंसर पेशेंट्स के लिए कई यूनिट रक्तदान भी किया। मैंने शादी में एक आठवां फेरा भी लिया कि हम दोनों अपनी कमाई का 5 प्रतिशत हिस्सा ताउम्र बच्चों के लिए देंगे। हमने शादी के बाद अंगदान का निर्णय लिया और अस्पताल जा कर इसका फॉर्म भरा।

आज भी मेरे पास 25-30 बच्चे हैं। उनकी पढ़ाई और फिजिकल ट्रेनिंग मैं कराता हूं। सड़क पर दौड़ने से एक बार बड़ा हादसा हो गया और कुछ बच्चे एक्सीडेंट में मारे गए। फिर मैंने पास के एक खाली पड़े पार्क को आसपास के लोगों की मदद से रनिंग के लिए तैयार करवाया। आज बहुत से बच्चे वहीं प्रैक्टिस करते हैं। मैं अपने स्टूडेंट्स से बस एक वादा लेता हूं कि अगर वे भविष्य में कुछ बन पाए, तो कम से कम 2 बच्चों की जिंदगी संवारेंगे। 

हम चलते गए कारवां बढ़ता गया - पीयूष-राघवेंद्र, आईटी प्रोफेशनल्स, उत्तर प्रदेश

कानपुर के पीयूष और हापुड़ के राघवेंद्र इंद्रप्रस्थ कॉलेज से इंजीनियरिंग कर रहे थे। ये दोनों 2014-2018 वाले बैच में थे। थर्ड इयर में थे, तो कॉलेज में कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था। मजदूर दिनभर काम करते, पर उनके छोटे बच्चे यों ही इधर-उधर घूमते थे। हॉस्टल में रहनेवाले इन छात्रों ने सोचा, क्यों ना खाली समय में इन बच्चों को पढ़ाया जाए। उन बच्चों और उनके माता-पिता को मनाया और शाम को कॉलेज कैंपस में ही इन्हें पढ़ाना शुरू कर दिया। बताते हैं राघवेंद्र, जब हमने इन्हें पढ़ाना शुरू किया था, तो बहुत उम्मीद नहीं थी, लेकिन 6महीने के अंदर ही हमारे पास लगभग 60 बच्चे हो गए। समस्या सिर्फ पढ़ाई को ले कर ही नहीं थी, कॉपी-किताबें और स्टेशनरी खरीदने के लिए भी इनके पास पैसे नहीं थे। वह अगस्त का महीना था, तो हमने आसपास के लोगों, स्टूडेंट्स, मेट्रो स्टेशनों और आम लोगों को तिरंगा बेचा, ताकि हमारे पास पैसे आ जाएं और उससे हम बच्चों की जरूरतें पूरी कर सकें। हमारे टीचर्स और प्रशासन ने भी इस नेक काम में हमारी मदद की। धीरे-धीरे यह सिलसिला चल निकला। हम कॉलेज पूरा करने के बाद जॉब में आ गए और हमारे जूनियर्स बच्चों को पढ़ाने लगे। हम उन्हें मदद देते थे। ऑनलाइन भी बच्चों को कोचिंग देते। हमारे पास पहले लॉकडाउन के आसपास लगभग 300 बच्चे थे। लेकिन उस दौरान मजदूर वापस घरों को लौटे, तो हमारा यह कार्य बाधित हो गया। हम कोशिश करते हैं कि इन बच्चों में से हर साल कुछ का एडमिशन केंद्रीय विद्यालयों या बेहतर प्राइवेट स्कूलों में हो सके। 

पीयूष बताते हैं, मैंने कानपुर में छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करने के लिए ऑनलाइन कोचिंग भी दी। हम बच्चों को केवल पढ़ाते ही नहीं हैं, बल्कि उन्हें कंप्यूटर, डांस-म्यूजिक का प्रशिक्षण भी देते हैं। अब तो हम 12वीं तक के बच्चों को पढ़ा रहे हैं। वर्चुअल क्लास और स्मार्ट क्लास सेटअप भी तैयार कर रहे हैं। हमारे साथ हमारे बहुत से जूनियर छात्र इस काम में आगे आ रहे हैं। ऐसे बहुत से स्टूडेंट्स हैं, जिनकी पढ़ाई कोरोना दौर में छूट गयी। हम उन्हें कोचिंग के अलावा स्टडी मटीरियल भी दिलवाते हैं। कई ऐसे छात्र भी हैं, जिनके माता-पिता की कोरोना से मौत हो गयी और उनके परिवार में आय का कोई साधन नहीं है। हम भविष्य में ऐसे छात्रों के लिए काम करना चाहते हैं। 

अपनी संस्था रोप ऑफ होप और संस्कृति के तहत हम सबकी मदद कर रहे हैं। हर क्लास के बच्चों को हमने 4 ग्रुप्स में बांटा है। हम उनके बीच कंपीटिशन भी कराते हैं। हमारी मदद करने के लिए बहुत से इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स के अलावा डॉक्टर्स, वकील और अन्य प्रोफेशनल्स भी हैं, जिन्होंने कभी बचपन में खुद कठिनाइयों का सामना किया था। हमारी संस्था संस्कृति में अभी हमारे अन्य साथी विशाल पांडे, अभिषेक सिंह, शुभम दुबे, संजय ठाकुर, मो. अरीब, तृप्ति सोलंकी, प्रिवांशी वार्ष्णेय, शालिनी श्रीवास्तव और कार्तिकेय पांडेय भी बच्चों की शिक्षा के लिए कार्य कर रहे हैं।