महिलाओं में बढ़ रही हैं आंखों की समस्या: देरी से चलता है पता
महिलाओं में नेत्र संबंधी अध्ययनों के नतीजों का अगर विश्लेषण किया जाए तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आएंगी। इनमें सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि महिलाएं सालों तक आंखों की ऐसी दिक्कतों के साथ जीती रहती हैं, जिनका समय पर पता चल जाए तो उनका पूरी तरह से इलाज किया जा सकता है, लेकिन अफसोस इन समस्याओं
महिलाओं में नेत्र संबंधी अध्ययनों के नतीजों का अगर विश्लेषण किया जाए तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आएंगी। इनमें सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि महिलाएं सालों तक आंखों की ऐसी दिक्कतों के साथ जीती रहती हैं, जिनका समय पर पता चल जाए तो उनका पूरी तरह से इलाज किया जा सकता है, लेकिन अफसोस इन समस्याओं
महिलाओं में नेत्र संबंधी अध्ययनों के नतीजों का अगर विश्लेषण किया जाए तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आएंगी। इनमें सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि महिलाएं सालों तक आंखों की ऐसी दिक्कतों के साथ जीती रहती हैं, जिनका समय पर पता चल जाए तो उनका पूरी तरह से इलाज किया जा सकता है, लेकिन अफसोस इन समस्याओं
महिलाओं में नेत्र संबंधी अध्ययनों के नतीजों का अगर विश्लेषण किया जाए तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आएंगी। इनमें सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि महिलाएं सालों तक आंखों की ऐसी दिक्कतों के साथ जीती रहती हैं, जिनका समय पर पता चल जाए तो उनका पूरी तरह से इलाज किया जा सकता है, लेकिन अफसोस इन समस्याओं का पता तब चलता है, जब ये गंभीर हो कर लाइलाज हो जाती हैं। महिलाओं इन समस्याओं के लक्षणों को सालों तक नजरंदाज करती रहती हैं जैसे साधारण खुजली या आंखें लाल होने को ज्यादा स्क्रीन देखने या आंख रगड़ने का नतीजा मान कर हम अनदेखा कर देते हैं। परिणामस्वरूप, समय पर इलाज ना मिलने की वजह से समस्या बढ़ती जाती है। इस बारे में जानकारी दे रहे हैं एएसजी आई हॉस्पिटल के ग्रुप चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर डॉ. विकास जैन
इतना ही नहीं, आंकड़ों के अनुसार महिलाओं में पुरुषों की तुलना में गंभीर नेत्र रोग विकसित होने और आंखों की रोशनी जाने का जोखिम अधिक होता है। इसके मुख्य कारणों में महिलाओं की लंबी आयु, हार्मोनल परिवर्तन, और उम्र से जुड़ी बीमारियों जैसे मोतियाबिंद, ग्लूकोमा और ड्राई आई सिंड्रोम शामिल है। प्रेगनेंसी और मेनोपॉज के दौरान महिलाओं में हार्मोनल बदलाव अधिक होते हैं और वे संवेदनशील हो कर ज्यादा रोती हैं। इस दौरान आंखों में किरकिराहट और जलन महसूस होने पर यदि इसका इलाज न किया जाए तो यह कॉर्नियल स्कारिंग का कारण बन सकता है।
महिलाओं में विशेष रूप से 40 वर्ष की आयु के बाद हार्मोनल बदलावों के कारण ड्राई आई सिंड्रोम का खतरा अधिक होता है। उम्र बढ़ने के साथ कुदरती रूप से ग्लैंड डीजनरेशन यानी अश्रु ग्रंथियों का प्राकृतिक क्षय भी होता है, जो शारीरिक, हार्मोनल और इम्यूनोलॉजिकल कारकों से जुड़ा होता है।
भारत और अन्य विकासशील देशों में किए गए अध्ययनों से यह पता चलता है कि महिलाओं में प्रेसबायोपिया (उम्र से संबंधित पास की नजर में कमी आना) की दर और गंभीरता पुरुषों की तुलना में अधिक होती है, जिसमें प्रभावित होने की संभावना 40% से 46% तक अधिक होती है। भारत में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं रोजमर्रा के ऐसे कार्य करती हैं जिनमें लगातार पास की नजर की आवश्यकता होती है। ये कार्य अमूमन महिलाओं की कम उम्र से शुरू होते हैं और पुरुषों द्वारा किए जाने वाले कार्यों की तुलना में अधिक मेहनत वाले होते हैं।
भारत में कई महिलाएँ तब ही डॉक्टर के पास जाती हैं जब उनकी देखने की क्षमता कोनों से कम होने लगती है, तब तक दृष्टि का एक बड़ा हिस्सा खो चुका होता है। 60 वर्ष से अधिक आयु की महिलाएं, विशेषकर जिनके परिवार में ग्लूकोमा का इतिहास है, थायरॉयड की समस्या या गंभीर एनीमिया से पीड़ित महिलाएं, ग्लूकोमा के अधिक जोखिम में होती हैं। महिलाएं एंगल-क्लोज़र ग्लूकोमा (ACG) के प्रति पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती हैं। 60 वर्ष की आयु के बाद यह जोखिम काफी बढ़ जाता है, जिससे नियमित आंखों की जांच करवाना और भी आवश्यक हो जाता है।
हालांकि मोतियाबिंद मुख्य रूप से उम्र बढ़ने से जुड़ा होता है, लेकिन भारतीय नेत्र विशेषज्ञ महिलाओं में 45 की उम्र के बाद से ही मोतियाबिंद के मामलों में वृद्धि देख रहे हैं, जिसका कारण बिना UV सुरक्षा के तेज धूप में अधिक समय बिताना और पोषण की कमी है। इसे अर्ली-ऑनसेट कहा जाता है। इसके अन्य कारणों में बढ़ती उम्र, वातावरण में शुष्क हवा, कॉन्टैक्ट लेंस और ज्यादा स्क्रीन टाइम शामिल हैं।
जीवनशैली में बदलाव बेहद महत्वपूर्ण हैं : आंखों को ड्राईनेस से बचाना, पलकों की हाइजीन के लिए वॉर्म कंप्रेस, बार-बार पलकें झपकाना और स्क्रीन से नियमित ब्रेक लेना आपकी आंखों को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है। इसके अलावा अपनी डाइट में बदलाव करना भी आंखों की ज्योति बढ़ाने में मददगार है। जैसे मोरिंगा व पालक जैसी हरी सब्जियां खाना, जिनमें ल्यूटिन प्रचुर मात्रा में होता है, वहीं पीली और नारंगी सब्जियां जैसे गाजर और कद्दू रेटिना के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक बीटा-कैरोटीन प्रदान करती हैं। महिलाओं को कॉस्मेटिक हाइजीन का भी ध्यान रखना चाहिए जैसे अपना आई मेकअप प्रोडक्ट किसी के साथ शेअर ना करें, आंखों में किसी भी तरह का काजल लगाती हों, तो उसे सोने से पहले साफ करें और आंखों की नियमित जांच करवाएं, ताकि किसी भी समस्या का समय रहते पता चल सके।