अकसर मॉर्निंग वॉक में वे मुझे दिखते हैं। उनके पास 3-4 तरह के ड्रोन हैं, जिन्हें उड़ते देख उनके चेहरे पर बच्चों सी खुशी झलकती है। हमारी जान-पहचान उनके इसी अजीबोगरीब शौक के जरिए हुई। ड्रोन के बाद इन दिनों वे पेंटिंग्स में रमे हुए हैं। दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले ये बुजुर्ग उन सभी के लिए प्रेरणास्रोत

अकसर मॉर्निंग वॉक में वे मुझे दिखते हैं। उनके पास 3-4 तरह के ड्रोन हैं, जिन्हें उड़ते देख उनके चेहरे पर बच्चों सी खुशी झलकती है। हमारी जान-पहचान उनके इसी अजीबोगरीब शौक के जरिए हुई। ड्रोन के बाद इन दिनों वे पेंटिंग्स में रमे हुए हैं। दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले ये बुजुर्ग उन सभी के लिए प्रेरणास्रोत

You’ve reached a Premium Story.

Get full access Today

  • 5k+ Premium Stories
  • 500+ Columnists
  • 100% Ad-Free Experience
  • ExclusiveWebinars

अकसर मॉर्निंग वॉक में वे मुझे दिखते हैं। उनके पास 3-4 तरह के ड्रोन हैं, जिन्हें उड़ते देख उनके चेहरे पर बच्चों सी खुशी झलकती है। हमारी जान-पहचान उनके इसी अजीबोगरीब शौक के जरिए हुई। ड्रोन के बाद इन दिनों वे पेंटिंग्स में रमे हुए हैं। दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले ये बुजुर्ग उन सभी के लिए प्रेरणास्रोत

You’ve reached a Premium Story.

Get full access Today

  • 5k+ Premium Stories
  • 500+ Columnists
  • 100% Ad-Free Experience
  • ExclusiveWebinars

अकसर मॉर्निंग वॉक में वे मुझे दिखते हैं। उनके पास 3-4 तरह के ड्रोन हैं, जिन्हें उड़ते देख उनके चेहरे पर बच्चों सी खुशी झलकती है। हमारी जान-पहचान उनके इसी अजीबोगरीब शौक के जरिए हुई। ड्रोन के बाद इन दिनों वे पेंटिंग्स में रमे हुए हैं। दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले ये बुजुर्ग उन सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं, जिनकी शिकायत होती है कि बच्चे उन्हें वक्त नहीं देते या रिटायरमेंट के बाद तो वक्त कटता ही नहीं है। 70-75 वर्षीय ये बुजुर्ग और उनकी पत्नी अलसुबह मॉर्निंग वॉक करते दिखते हैं। पत्नी कैंसर सर्वाइवर हैं, कीमो चल रही है, लेकिन सिर पर स्कार्फ बांधे वे हमेशा मुस्कराती और सबसे बातें करती दिखती हैं।

शौक बड़े कमाल की चीज है। यह ऊर्जावान बनाए रखती है। पेनडेमिक दौर को याद करें। कितने लोगों ने नयी रुचियां तलाशीं और शौक को आगे बढ़ाया ! महिलाओं ने कुकिंग-डांसिंग-पेंटिंग में जितने प्रयोग किए, सोशल मीडिया उसका गवाह है। पेनडेमिक में जब मिलना-जुलना, बाहर निकलना प्रतिबंधित हो गया था, शौक व रुचियों ने ही लोगों को स्वस्थ-आशावादी बनाए रखा। शोध बताते हैं कि रोज कुछ वक्त हॉबीज को दिया जाए तो इससे मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है। एक थकान भरे दिन के बाद 10-15 मिनट भी अपने शौक को दे सकें तो जीवन में उदास होने की नौबत कम आएगी। पहले जब मोबाइल फोन, टीवी या ओटीटी प्लेटफॉर्म नहीं थे तो लोग रुचियों में खुद को खपा कर व्यस्त रहते थे। हमने मजेदार और अजीब शौक के बारे में भी खूब सुना है। जैसे, किसी को डाक टिकट जमा करने का शौक था तो कोई दुनिया भर के सिक्के जुटाता था, कोई फूल-पत्तियों का संग्रह करता तो किसी को पेपर कटिंग से चीजें बनाने में आनंद मिलता। आज भी कई महिलाओं को निटिंग, क्रोशिया, कुकिंग, डांस या पेंटिंग जैसी गतिविधियों में दिली सुकून मिलता है। 

मेंटल हेल्थ के लिए जरूरी 

श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टिट्यूट दिल्ली की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. अर्चना शर्मा कहती हैं, ‘‘मानसिक सेहत ठीक हो तो जीवन की चुनौतियों का सामना आत्मविश्वास और भावनात्मक संतुलन के साथ किया जा सकता है। व्यस्तता व भागदौड़ भरी जीवनशैली में तनाव, चिंता व मानसिक थकान आम समस्या है। ऐसे में अगर कोई हॉबी है तो मेंटल हेल्थ अच्छी रह सकती है।’’

हॉबी क्या है 

डॉ. अर्चना कहती हैं कि जो काम प्रेरित करे, खुश रखे, संतोष प्रदान करे, वह हॉबी है। किसी को म्यूजिक भाता है, किसी को डांस, पेंटिंग, रीडिंग, बागवानी, खेलकूद, फोटोग्राफी, योग, मेडिटेशन। डेडलाइंस और परफॉर्मेंस वाले प्रोफेशनल संसार में हॉबी के लिए वक्त निकालना या नयी हॉबी शुरू करना बहुत जरूरी है। जब हम किसी शौक में वक्त व ऊर्जा लगाते हैं तो उसे अच्छी तरह सीखने की प्रेरणा मिलती है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। मसलन हम कोई नया इंस्ट्रूमेंट बजाना सीखें, नयी भाषा सीखें, नया आर्ट फॉर्म आजमाएं तो इन्हें सीखने का क्रम अंदर से उत्साहित रखता है और अगर इसमें महारत मिल गयी तो अपनी क्षमताओं पर गर्व करने का मौका भी मिलता है। 

शौक हमें रचनात्मक बनाते हैं। कुछ भी नया रचते हैं तो दिमाग नए-नए बिंदुओं पर सोचने को बाध्य होता है। इससे ना केवल मानसिक खुराक मिलती है, बल्कि नयी दृष्टि से समस्याओं का समाधान करने की ताकत भी प्राप्त होती है। 

मस्तिष्क सक्रिय रहता है। बहुत से लोग न्यूजपेपर में सुडूको सॉल्व करते हैं, पहेलियां बुझाते हैं, शतरंज खेलते हैं, कोई गणित के मुश्किल सवाल हल करने की चुनौती लेता है तो कोई वर्ग पहेली हल करता है। ऐसी चुनौतियां मस्तिष्क को सक्रिय बनाए रखती हैं। 

शौक हमें टाइम मैनेजमेंट भी सिखाते हैं। जब हम रूटीन कार्यों के बीच अपने शौक के लिए वक्त निकालते हैं तो अनुशासन में बंध कर कार्य करना होता है। इससे हमें वक्त की कीमत पता चलती है।

हॉबी कैसे विकसित करें 

अपनी पसंद-नापसंद को समझने की कोशिश करें। फुरसत के वक्त में आपको क्या करना भाता है, कौन सी एक्टिविटी से मन खुश, प्रेरित या तनावमुक्त होता है, उसे धीरे-धीरे रूटीन का हिस्सा बनाएं। हॉबी क्लास में एडमिशन ले सकते हैं, ग्रुप एक्टिविटी से जुडें़, घर में ना रहना चाहें तो सोशल कार्यों से जुड़ें। छोटे-छोटे लक्ष्य बनाएं और उन्हें पूरा करने की कोशिश करें। कोई नयी चीज सीखने की कोशिश कर रहे हैं तो धैर्य रखें, सीखने की प्रक्रिया का आनंद लें, परफेक्शन के फेर में ना पड़ें। शौक जीवन के हर अच्छे-बुरे पल में संभालेंगे। जरूरी सिर्फ यह है कि शौक पैदा करें और खुशियों का आगाज करें !