क्यों भारतीय महिलाएं कैरिअर छोड़ने को मजबूर?
White House Press Secretary Karine Jean-Pierre's decision to step down highlights the global struggle of working mothers to balance career and family, especially in India where a majority of women leave jobs post-childbirth. This exodus impacts women's careers and financial independence, alongside a loss of talent for companies. The article advocates for creating supportive work environments that enable women to thrive professionally while embracing motherhood, addressing the unequal burden of unpaid care work and the need for better workplace policies.
White House Press Secretary Karine Jean-Pierre's decision to step down highlights the global struggle of working mothers to balance career and family, especially in India where a majority of women leave jobs post-childbirth. This exodus impacts women's careers and financial independence, alongside a loss of talent for companies. The article advocates for creating supportive work environments that enable women to thrive professionally while embracing motherhood, addressing the unequal burden of unpaid care work and the need for better workplace policies.
White House Press Secretary Karine Jean-Pierre's decision to step down highlights the global struggle of working mothers to balance career and family, especially in India where a majority of women leave jobs post-childbirth. This exodus impacts women's careers and financial independence, alongside a loss of talent for companies. The article advocates for creating supportive work environments that enable women to thrive professionally while embracing motherhood, addressing the unequal burden of unpaid care work and the need for better workplace policies.
अमेरिका में वाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीना लेविट ने इस महीने अपने पद से हटने का फैसला किया है। 28 साल की लेविट ने मई में अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया था और हाल ही में मैटरनिटी लीव से वापस काम पर लौटी थीं। लेकिन उन्होंने कहा कि वाइट हाउस प्रेस सचिव की नौकरी में जितना समय, ऊर्जा और ध्यान देना पड़ता है, उसके साथ वह अपने दो छोटे बच्चों की मां की भूमिका को उस तरह नहीं निभा पा रही थीं, जैसा वह चाहती थीं। वह अगस्त के अंत में पद छोड़ देंगी और बाहरी सलाहकार की भूमिका में रहेंगी।
लेविट का फैसला सिर्फ अमेरिका की राजनीति से जुड़ी खबर नहीं है। यह उस बड़े सवाल को सामने लाता है जिसका सामना दुनिया भर में लाखों महिलाएं कर रही हैं—क्या एक महिला के लिए सफल करियर और मातृत्व, दोनों को एक साथ निभाना वास्तव में इतना मुश्किल है?
यह सवाल भारत के लिए और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में महिलाएं पढ़-लिखकर नौकरी में आ तो रही हैं, लेकिन शादी, गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के बाद उनके करियर की रफ्तार अक्सर थम जाती है।
73% भारतीय महिलाएं बच्चा होने के बाद छोड़ देती हैं नौकरी
अशोका यूनिवर्सिटी से जुड़े एक अध्ययन में सामने आया था कि करीब 73 फीसदी भारतीय महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद नौकरी छोड़ देती हैं और वापस काम पर नहीं लौट पातीं। जो महिलाएं वापस लौटती भी हैं, उनमें से करीब 48 फीसदी चार महीने के भीतर दोबारा नौकरी छोड़ देती हैं।
इसका मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि एक महिला की नौकरी चली गई। इसके साथ उसकी आय, आर्थिक स्वतंत्रता, प्रमोशन के अवसर, अनुभव और भविष्य में नेतृत्व की संभावनाएं भी प्रभावित होती हैं। कंपनियों के लिए भी यह नुकसान है, क्योंकि जिस कर्मचारी को तैयार करने में वर्षों लगते हैं, वह अचानक बाहर हो जाती है।
भारत में महिलाओं के नौकरी छोड़ने की एक बड़ी वजह बच्चे और घर की जिम्मेदारी है। हाल में नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (एनसएओ) के सर्वे में सामने आया कि करीब 69% महिलाओं ने बच्चे पालने और घरेलू जिम्मेदारियों को नौकरी से बाहर रहने की मुख्य वजह बताया। पुरुषों में यह आंकड़ा सिर्फ 3.8 फीसदी बताया गया है। यानी समस्या केवल नौकरी मिलने की नहीं है। समस्या यह भी है कि नौकरी मिलने के बाद महिला उसे जारी कैसे रखे? बच्चे को कौन संभालेगा? डे-केयर कितना सुरक्षित और किफायती है? बच्चा बीमार हो जाए तो छुट्टी कौन लेगा? स्कूल की छुट्टियों में उसकी देखभाल कौन करेगा? और घर के बुजुर्गों की जिम्मेदारी किसकी होगी? इन सवालों के जवाब अक्सर महिला से ही अपेक्षित होते हैं।
बच्चा पैदा करने के प्रेशर में करियर दांव पर लगा रही महिलाएं
नोएडा के क्लाउड नाइन हॉस्पिटल की डॉक्टर डॉ. वर्षा अग्रवाल के मुताबिक, महिलाओं के करियर पर असर केवल बच्चे के जन्म के बाद नहीं पड़ता। शादी के बाद बच्चा पैदा करने का प्रेशर ही नौकरी पर असर डालने लगता है। प्रेगनेंसी में आने वाली परेशानियां, स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें और उसके बाद बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी—ये सभी मिलकर महिला के लिए करियर जारी रखना मुश्किल बना सकते हैं।
कई महिलाओं के लिए प्रेगनेंसी और डिलीवरी के दौरान बार-बार डॉक्टर के पास जाना, आराम की जरूरत और डिलीवरी के बाद शारीरिक रिकवरी के साथ नौकरी की जिम्मेदारियां निभाना आसान नहीं होता। इसके बाद नवजात बच्चे की लगातार देखभाल की जरूरत शुरू हो जाती है। यहीं से अक्सर महिला को अपने करियर और परिवार के बीच चुनाव जैसा महसूस होने लगता है।
भारतीय महिलाएं अकेली नहीं
यह केवल भारत की समस्या नहीं है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में महिलाओं की लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन दर करीब 48 फीसदी है, जबकि पुरुषों की करीब 73 फीसदी है। यानी कामकाजी दुनिया में महिलाओं और पुरुषों के बीच अब भी बड़ा अंतर है। हालांकि भारत का आंकड़ा वैश्विक आंकड़े से ज्यादा खराब है।
भारत में अनपेड केअर वर्क का बोझ महिलाओं पर खास तौर पर भारी है। घर का काम, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की जिम्मेदारी और परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें अक्सर ऐसी जिम्मेदारियां हैं जिनका कोई वेतन नहीं मिलता, लेकिन जिनके बिना घर चलना संभव नहीं है।
अमेरिकी महिला सांसद ने चुना कैरिअर - हो रही आलोचना
अमेरिका की सांसद सारा जैकब्स की कहानी इस बहस का एक अलग पहलू सामने लाती है। 36 साल की जैकब ने पिछले वर्ष एग फ्रीजिंग का विकल्प चुना ताकि भविष्य में मां बनने के लिए उनके पास अधिक समय और विकल्प हो, और वो बढ़ती उम्र की वजह से जल्दी मां बनने के प्रेशर से बाहर आ सकें। । जैकब्स को एग फ्रीजिंग की प्रक्रिया के दौरान हार्मोन के इंजेक्शन लेने पड़ते थे। वह अपने व्यस्त शेड्यूल के बीच इंजेक्शन लगाने के लिए समय निकालती थीं। तब उन्हें ये आलोचना झेलनी पड़ी कि करियर इतना अहम हो गया कि पारिवारिक ज़रुरतों को प्राथमिकता नहीं दी।
उम्र के साथ साथ महिलाओं के एग्स की क्वालिटी कम होने लगती है – ऐसे में एग फ्रीजिंग कराने के बाद महिलाएं बाद में उन्हीं एग्स से भविष्य में बच्चे पैदा करने का विकल्प चुन सकती हैं। लेकिन ये विकल्प इतना आसान नहीं है। यह महंगी प्रक्रिया है और इससे यह सवाल भी उठता है कि आखिर क्यों महिलाओं को अपनी बायोलॉजिकल क्लॉक और करियर के बीच तालमेल बैठाने के लिए ऐसे विकल्पों पर निर्भर होना पड़ता है।
शीर्ष नेतृत्व से गायब हैं महिलाएं
भारत में महिलाओं का कॉरपोरेट नेतृत्व तक पहुंचने का रास्ता ऊपर जाकर नहीं, बल्कि बीच में ही कमजोर पड़ जाता है। देश के कुल वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 26% है, लेकिन मिडिल मैनेजमेंट में यह घटकर लगभग 16% और सीईओ स्तर पर सिर्फ 8% रह जाती है।
ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं की कमी सिर्फ बड़े पदों पर नहीं है, बल्कि समस्या काफी पहले शुरू हो जाती है। आमतौर पर नौकरी के 5-10 साल बाद, जब कर्मचारी अपने व्यक्तिगत काम से आगे बढ़कर टीम संभालने और नेतृत्व की भूमिका में आने लगते हैं, उसी दौर में बड़ी संख्या में महिलाएं करियर की दौड़ से बाहर होने लगती हैं। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि "महिलाएं नौकरी क्यों छोड़ देती हैं?"
सवाल यह होना चाहिए—"हम ऐसा कामकाजी माहौल क्यों नहीं बना पा रहे, जिसमें एक महिला मां बनने के बाद भी अपना करियर जारी रख सके?"